भारत करेगा SCO Summit की अध्यक्षता, जानिए इसका इतिहास और उद्देश्य

इस साल शंघाई सहयोग संगठन के सम्मेलन की अध्यक्षता भारत कर रहा है। इस सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन समेत दुनिया के तमाम बड़े नेता शामिल होंगे।

SCO Summit 2023: India will chair SCO Summit know its history and purpose

SCO Summit: शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के सदस्य देशों के रक्षा मंत्रियों की 28 अप्रैल को दिल्ली में बैठक हुई। इसमें क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा, आतंकवाद पर अंकुश और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया गया। भारत 3-4 जुलाई को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले एससीओ शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। जिसमें रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूक्रेन युद्ध के बाद पहली बार भारत की यात्रा कर सकते है। 4-5 मई को गोवा में एससीओ विदेश मंत्रियों की भी बैठक होनी है।

वैसे अंतरराष्ट्रीय नजरिए से 2023 का साल भारत के लिए बेहद खास है। इस वक्त भारत दुनिया के सबसे ताकतवर आर्थिक समूह G20 की अगुवाई करने के साथ ही शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की भी अध्यक्षता कर रहा है। इस बार भारत ने सिक्योर-एससीओ का नारा दिया है।

शंघाई सहयोग संगठन के अध्यक्ष के तौर पर भारत इसके सभी सदस्य देशों के साथ बेहतर तालमेल और सबको साथ लेकर चलने की नीति पर आगे बढ़ रहा है। क्या आपको पता है कि यह एससीओ समिट क्या है? कैसे यह संगठन बना और इस संगठन का उद्देश्य क्या था? कौन-कौन से देश इसके सदस्य हैं और भारत की इस संगठन में क्या भूमिका है? कैसे भारत इसका स्थायी सदस्य बना?

1996 में हुई एससीओ की शुरुआत

शंघाई सहयोग संगठन की शुरुआत साल 1996 में शंघाई-5 के नाम से की गई थी। इसकी स्थापना पांच देशों के साथ चीन के शहर शंघाई में की गई थी। इसलिए इसका नाम 'शंघाई फाइव' रखा गया था। उस वक्त इसके सदस्य चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गीस्तान और तजाकिस्तान थे। एससीओ का मकसद नस्लीय और धार्मिक चरमपंथ का सामना करना था और इसी के साथ बिजनेस और निवेश को बढ़ाना भी इसका उद्देश्य था।

वहीं साल 2001 में उज्जेबकिस्तान के संगठन में प्रवेश के बाद उसी साल शंघाई में हुए शिखर सम्मेलन में इस संगठन का नाम बदलकर शंघाई सहयोग संगठन कर दिया गया। इस तरह से इस संगठन का स्थापना दिवस 15 जून 2001 को माना गया।

एससीओ के गठन के बाद बदला उद्देश्य?

हालांकि, 1996 में जब शंघाई इनीशिएटिव के तौर पर इसकी शुरुआत हुई थी। तब सिर्फ यह ही उद्देश्य था कि मध्य एशिया के आजाद हुए नये देशों के साथ लगती रूस और चीन की सीमाओं पर कैसे तनाव रोका जाये और कैसे सीमाओं को सुधार सहित उनका निर्धारण किया जाये? वैसे ये मकसद सिर्फ तीन सालों में ही हासिल कर लिया गया। इसकी वजह से ही इसे काफी प्रभावी संगठन माना गया।

साल 2001 में जब उज्बेकिस्तान को जोड़ा गया और नाम में बदलाव हुआ, तब नए संगठन के उद्देश्य भी बदले गये। अब इस संगठन का मकसद ऊर्जा पूर्ति से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना और आतंकवाद से लड़ना बन गया। ये दो मुद्दे आज तक महत्त्वपूर्ण बने हुए हैं।

बता दें कि इसे यूरेशियन पॉलिटिकल इकॉनमी और मिलिट्री ऑर्गेनाइजेशन भी समझा जाता है, क्योंकि इसमें यूरोप और एशिया दोनों ही तरफ के देश शामिल हैं। यही नहीं, एससीओ को एक तरह से अमेरिका के संगठन नाटो के दबाव को कम करने वाला संगठन भी माना जाता है।

दुनिया का बेहद ताकतवर मंच है एससीओ?

शंघाई सहयोग संगठन क्षेत्रफल और जनसंख्या के नजरिए से दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन है। यह संगठन यूरेशिया यानी एशिया और यूरोप के करीब 60 प्रतिशत हिस्से को कवर करता है। एससीओ के सदस्य देशों का वैश्विक जीडीपी में करीब 30 प्रतिशत का योगदान है। साथ ही दुनिया की 40 प्रतिशत जनसंख्या एससीओ देशों में ही रहती है। इनमें से 80 करोड़ लोग युवा हैं।

भारत कैसे बना इस संगठन का सदस्य?

दरअसल साल 2005 में भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों को इस संगठन में ऑब्जर्वर के तौर पर शामिल किया गया था। इसके बाद 24 जून 2016 को भारत और पाकिस्तान ने ताशकंद में दायित्वों के ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये थे। जिससे एससीओ में पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल होने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हुई थी। उसके बाद 9 जून 2017 को भारत और पाकिस्तान को शंघाई सहयोग संगठन का पूर्ण सदस्य बनाया गया। भारत और पाकिस्तान के जुड़ते ही ये संगठन दुनिया के सबसे बड़े संगठनों में से एक बन गया था।

इस संगठन में कितने सदस्य हैं?

फिलहाल इस संगठन में 8 सदस्य हैं। चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, भारत और पाकिस्तान। इसके अलावा इस संगठन में 4 ऑब्जर्वर देश अफगानिस्तान, बेलारूस, मंगोलिया और ईरान हैं। हालांकि, ईरान को सदस्य बनाने की प्रक्रिया 2021 में ही शुरू कर दी गई थी। इनके अलावा फिलहाल एससीओ समिट में 6 डायलॉग पार्टनर्स भी हैं। इसमें श्रीलंका, तुर्की, कंबोडिया, अजरबैजान, नेपाल और आर्मीनिया शामिल हैं। इस समिट की जो टॉप काउंसिल होती हैं उसमें मेंबर देशों के राष्ट्रपति शामिल होते हैं। वहीं इस संगठन का हेडक्वार्टर चीन के बीजिंग में स्थित है।

एससीओ से भारत को क्या फायदा?

शंघाई सहयोग संगठन में चीन, रूस के बाद भारत तीसरा सबसे बड़ा देश है। भारत का कद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ा है। वहीं एससीओ को इस समय दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन माना जाता है। भारतीय हितों की जो चुनौतियां हैं, चाहे वो आतंकवाद हों, ऊर्जा की आपूर्ति या प्रवासियों का मुद्दा। ये मुद्दे भारत और एससीओ दोनों के लिए अहम हैं।

भारत की इस संगठन से मुख्य रुचि सुरक्षा और आतंकवाद को लेकर है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान तो आतंकवाद से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं और इनकी वजह से सेंट्रल एशिया के देशों में भी इस्लामिक कट्टरवाद मौजूद है। इन सबका असर भारत पर पड़ता रहता है। एससीओ समिट भारत के लिए आतंकवाद पर हमला बोलने और इसके समाधान को ढूंढने का सबसे अच्छा मंच है।

सेंट्रल एशिया में प्राकृतिक संसाधनों जैसे तेल और गैस का भंडार है। कजाकिस्तान में तेल का भंडार है और उससे सटे देशों में प्राकृतिक गैस की प्रचुर मात्रा है। यह प्राकृतिक संसाधन भारत की उर्जा सुरक्षा के नजर से मायने रखती है क्योंकि वर्तमान में भारत की संस्था ओएनजीसी कजाकिस्तान में तेज की खोज का काम करती है। वहीं भारत तापीय गैस परियोजना पर भी काम कर रहा है। जिसमें एससीओ की मदद मिल सकती है।

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      वहीं सेंट्रल एशिया का यह क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से विकासशील है। इस क्षेत्र में भारत के लिए व्यापार और निवेश की संभावनाएं मौजूद हैं। खास बात ये है कि सेंट्रल एशिया के पांच देश जो इस संगठन के सदस्य हैं, उनके साथ भारत ने घनिष्ठ संबंध बनाए रखे हैं।

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