Adhik Maas or Mal Maas: अधिक मास के स्वामी हैं भगवान श्रीहरि, दान-पुण्य का मिलता है दस गुना फल

Adhik Maas or Mal Maas: हर तीन साल में एक बार एक अतिरिक्त माह का प्राकट्य होता है, जिसे अधिकमास, मलमास, पुरुषोत्तम मास, मलिम्लुच, संसर्प, अंहस्पति या अंहसस्पति जैसे नामों से जाना जाता हैं। हिंदू धर्म में इस माह का विशेष महत्व है। क्योंकि इसके स्वामी स्वयं भगवान श्रीहरि है। संपूर्ण भारत की धर्मपरायण जनता इस पूरे मास में पूजा-पाठ, भगवतभक्ति, व्रत-उपवास, जप और योग आदि धार्मिक कार्यों में संलग्न रहती है। ऐसा कहा जाता है कि अधिकमास में धार्मिक कार्यों का किसी भी अन्य माह में की गयी पूजा-पाठ से दस गुना अधिक फल मिलता है। यही वजह है कि श्रद्धालु श्रद्धा और शक्ति के साथ इस मास में भगवान को प्रसन्न कर अपना इहलोक तथा परलोक सुधारने में जुटते है। इस साल अधिक मास सावन माह में जुड़ा है। इस कारण सावन दो महीने का होगा। अधिकमास की शुरुआत 18 जुलाई से होगी और 16 अगस्त को यह समाप्त होगा।

19 साल बाद बना सावन में अधिक मास का संयोग

इस वर्ष श्रावण (सावन) अधिक मास का संयोग 19 वर्ष बाद फिर से बना है। इसके चलते चातुर्मास पांच माह का होगा। विक्रम संवत 2080 यानी वर्ष 2023 में 19 वर्ष के बाद श्रावण अधिकमास होगा। पूर्व में वर्ष 2004 में सावन दो माह का था। इस बार 4 जुलाई से सावन की शुरूआत होगी और 31 अगस्त को श्रावण के दो मास पूरे होंगे। अधिक‌ मास 18 जुलाई से 16 अगस्त तक रहेगा। इस दौरान शुभ और मांगलिक कार्यों पर पूरी तरह से रोक रहेगी।

sawan 2023 Adhik Maas or Mal Maas importance of worship of lord vishnu

तीन साल में अतिरिक्त 33 दिनों से बना अधिकमास

पंचांग या हिंदू कैलेंडर सूर्य और चंद्र वर्ष की गणना से चलता है। अधिक मास चंद्र साल का अतिरिक्त भाग है, जो कि 32 माह, 16 दिन और 8 घंटे के अंतर से बनता है। सूर्य और चंद्र वर्ष के बीच इसी अंतर को पाटने या संतुलन बनाने के लिए अधिक मास लगता है।

भारतीय गणना पद्धति के अनुसार सूर्य वर्ष में 365 दिन और चंद्र वर्ष में 354 दिन होते हैं। इस तरह से एक साल में चंद्र और सूर्य वर्ष में 11 दिनों का अंतर होता है और तीन साल में यह अंतर 33 दिनों का हो जाता है। यही 33 दिन तीन साल बाद एक अतिरिक्त माह बन जाते हैं। जिसे अधिक मास का नाम दिया गया है। ऐसा करने से व्रत-त्योहारों की तिथि अनुकूल रहती है और साथ ही अधिकमास के कारण काल गणना को उचित रूप से बनाए रखने में मदद मिलती है‌।

मलिन (मल) मास क्यों कहते हैं?

अधिक मास के दौरान सभी पवित्र कर्म वर्जित होते है। माना जाता है कि अतिरिक्त मास होने के कारण यह मास मलिन होता है। इसलिए इस दौरान हिंदू धर्म के विशिष्ट व्यक्तिगत संस्कार जैसे नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह और सामान्य धार्मिक संस्कार जैसे गृहप्रवेश, नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदी आदि आमतौर पर नहीं किए जाते। इसके अलावा अधिक मास में सूर्य की सक्रांति (सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) न होने से भी इसे मल मास (मलिन मास) कहा गया है।

पुरुषोत्तम मास क्यों कहा गया?

अधिक मास के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु माने जाते है। पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है। इसीलिए अधिक मास को पुरूषोत्तम मास के नाम से भी पुकारा जाता है। इस विषय में एक कथा पुराणों में पढ़ने को मिलती है। जिसमें बताया गया है कि भारतीय मनीषियों ने अपनी गणना पद्धति से हर चंद्र मास के लिए एक देवता निर्धारित किये। चूंकि अधिक मास सूर्य और चंद्र मास के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रकट हुआ, तो इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनने के लिए कोई भी देवता तैयार नहीं हुए। ऐसे में ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वह ही इस मास का भार अपने ऊपर लें। भगवान विष्णु ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और इस तरह यह मल मास के साथ पुरुषोत्तम मास भी बन गया।

आपको बता दें कि भगवान विष्णु ने अधिक मास में ही नरसिंह अवतार यानि आधा पुरुष और आधे शेर के रूप में प्रकट होकर, शाम के समय, देहरी के नीचे अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का सीना चीर कर उसे मृत्यु लोक में भेज दिया था।

भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग

हिंदू धर्म के अनुसार प्रत्येक जीव पंचमहाभूतों से मिलकर बना है। इन पंचमहाभूतों में जल, अग्नि, आकाश, वायु और पृथ्वी सम्मिलित हैं। अपनी प्रकृति के अनुरूप ही ये पांचों तत्व प्रत्येक जीव की प्रकृति न्यूनाधिक रूप से निश्चित करते है। अधिकमास में समस्त धार्मिक कृत्यों, चिंतन- मनन, ध्यान, योग आदि के माध्यम से साधक अपने शरीर में समाहित इन पांचों तत्वों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।

इस पूरे मास में धार्मिक और आध्यात्मिक प्रयासों से प्रत्येक व्यक्ति अपनी भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति और निर्मलता के लिए उद्यत होता है। इस तरह अधिक मास के दौरान किए गए प्रयासों से व्यक्ति हर तीन साल में स्वयं को बाहर से स्वच्छ कर परम निर्मलता को प्राप्त कर नयी ऊर्जा से भर जाता है। इस दौरान किए गए प्रयासों से समस्त कुंडली दोषों का भी निराकरण हो जाता है।

विष्णु सहस्त्रनाम व भागवत पाठ

यह महीना दान- पुण्य और धर्म- कर्म के कार्यों के लिए बेहद शुभफलदायी है। इसलिए इस महीने भागवत का पाठ करना चाहिए। साथ ही विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ, राम कथा और गीता का पाठ करना भी मंगलकारी है। भगवान कृष्ण और नृसिंह भगवान की कथा का भी श्रवण करना चाहिए।

शास्त्रों के अनुसार मलमास में दीपदान करने का विशेष महत्व है। इस माह मंदिर में ध्वजा चढ़ाने व वृक्षारोपण भी बहुत शुभ होता है। मलमास में चावल, जौ, तिल, केला, दूध, दही, जीरा, सेंधा नमक, ककड़ी, गेहूं, बथुआ, मटर, पान सुपारी, कटहल, मेथी आदि चीजों का सेवन करना चाहिए। साथ ही इस महीने में ब्राह्मण, गरीब व जरूरतमंद को भोजन तथा दान करना चाहिए।

इसमें शालिग्राम भगवान की उपासना से भी विशेष लाभ मिलता है। इसलिए हर दिन शालिग्राम भगवान के समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करें। मान्यता है कि ऐसा करने से साधक को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। अधिक मास में श्रीमद्भागवत गीता के 14वें अध्याय का नियमित रूप से पाठ करें। ऐसा करने से कार्यक्षेत्र में उत्पन्न हो रही परेशानियां दूर हो जाती है। ब्रह्म मुहूर्त में पूजा-पाठ का विशेष महत्व है। साथ ही इस मास में प्रातः स्नान-ध्यान के बाद गायत्री मंत्र का जाप करें। ऐसा करने से सभी प्रकार के संकटों का नाश होता है।

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