Resort Politics: क्या है रिसॉर्ट पॉलिटिक्स, यह कब और क्यों शुरू हुई?
Resort Politics: झारखंड की राजनीति के लिए आज का दिन बेहद अहम है। हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले चंपाई सोरेन ने अपना बहुमत हासिल कर लिया है। लेकिन, इससे पहले विधायक दल में टूट के डर से उनके समर्थक सभी विधायकों को हैदराबाद भेज दिया गया था।
कांग्रेस को भी अपने एमएलए के एकजुट रहने का भरोसा नहीं था, इसलिए उन्हें भी आंध्रप्रदेश के एक रिसॉर्ट में भेज दिया गया था। पिछले कुछ सालों से यह रिसार्ट पॉलिटिक्स बहुत खेली जा रही है। क्यों विभिन्न पार्टियों को इसकी जरूरत पड़ रही है और किसने कब इसका उपयोग किया, इस पर एक नजर डालते हैं।

ताजा घटनाक्रम झारखंड में
2 फरवरी को झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में चंपई सोरेन ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और इसके कुछ ही घंटों के बाद कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा के 38 विधायकों ने हैदराबाद के लिए उड़ान भर ली। इन सभी विधायकों को हैदराबाद में एक ही रिसॉर्ट में रखा गया।
बिहार में भी नीतीश कुमार को 12 फरवरी को विधानसभा में बहुमत साबित करना है, लेकिन इस शक्ति परीक्षण से पहले बिहार कांग्रेस के विधायक भी हैदराबाद के लिए रवाना हो गये हैं। देखा यह गया है कि जब भी सत्ता के लिए राजनीतिक उठा-पटक होती है सबसे पहले काँग्रेस अपने विधायकों को किसी रिसॉर्ट में बंद कर देती है। बिहार, झारखंड से पहले राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में भी कांग्रेस ऐसा कर चुकी है।
दरअसल 'रिसॉर्ट पॉलिटिक्स' किसी भी राजनीतिक पार्टी द्वारा उठाया गया हताशा भरा कदम है। आमतौर पर विधायकों, संसद सदस्यों को पार्टी के वफादार सदस्य के नेतृत्व में एक विशेष स्थान पर इकट्ठा किया जाता है। इसमें यह सुनिश्चित किया जाता है कि उनमें से किसी से भी अन्य राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि संपर्क न कर सकें ताकि उनके पाला बदलने का अवसर बिल्कुल खत्म हो जाए। अक्सर रिसॉर्ट पॉलिटिक्स किसी पार्टी द्वारा उस वक्त खेला जाता है जब उन्हें डर होता है कि उसके सदस्य पार्टी का साथ छोड़ विरोधी खेमे में शामिल हो जाएंगे।
भारत में 'रिसॉर्ट पॉलिटिक्स' का इतिहास
हरियाणा: 1982
भारत के इतिहास में सबसे पहले रिसॉर्ट पॉलिटिक्स की घटना की शुरुआत हरियाणा से हुई। बात है साल 1982 की, जब 90 सीटों वाले हरियाणा विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था। तब लोकदल के देवीलाल ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर 48 विधायकों के एक समूह के साथ नई दिल्ली के एक होटल में डेरा डाल दिया। इसी बीच कई विधायक होटल से भाग निकले और केवल 36 सीटों वाली कांग्रेस ने हरियाणा में सरकार बना ली और कांग्रेस के भजन लाल मुख्यमंत्री बन गए।
कर्नाटक: 1983 और 2019
जब 'रिसॉर्ट पॉलिटिक्स' की बात आती है तो कर्नाटक हमेशा आगे रहा है। 1983 में कर्नाटक में जनता पार्टी का नेतृत्व करने वाले मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े को अपनी सरकार को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथों भंग होने से बचाना था। तब विधानसभा विश्वास मत के दौरान, लगभग 80 विधायकों को 'कांग्रेसियों' से बचाने के लिए बेंगलुरु के बाहरी इलाके में एक लक्जरी रिसॉर्ट में रखा गया था। अंततः हेगड़े ने विधानसभा में पार्टी का बहुमत साबित कर दिया।
इसी तरह साल 2019 में फिर से ऐसी ही स्थिति देखी गई। 13 कांग्रेस और 3 जद (एस) विधायकों के इस्तीफे के बाद कर्नाटक की राजनीति गरमा गई। इस संकट के बाद भाजपा, कांग्रेस और जद (एस) ने अपने-अपने विधायकों को रिसॉर्ट्स में स्थानांतरित कर दिया। आखिरकार बीजेपी विपक्ष पर भारी पड़ी और राज्य में सरकार बनाई।
आंध्र प्रदेश: 1984 और 1995
अभिनेता से नेता बने एनटी रामाराव (एनटीआर) ने साल 1983 में विधानसभा चुनाव जीता था। तब पीएम रहीं इंदिरा गांधी ने टीडीपी सरकार को राज्यपाल के जरिए हटा दिया था और उन्होंने दलबदलू नेता एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री बना दिया। उस समय एनटी रामाराव अमेरिका में इलाज करवा रहे थे। जब वो वापस आए तो व्हीलचेयर पर बैठे हुए ही राष्ट्रपति भवन पहुंचे और 181 विधायकों को इकट्ठा कर परेड करा दी। इसके बाद एनटीआर दो महीने की संक्षिप्त अवधि में सत्ता में लौट आए।
इसी तरह साल 1995 में जब एनटीआर के दामाद एन चंद्रबाबू नायडू ने एनटीआर को मात देने के लिए अपने वफादार विधायकों को हैदराबाद के वायसराय होटल में शिफ्ट कर दिया। इसके बाद आंध्र प्रदेश में एन चंद्रबाबू नाडयू ने बहुमत साबित कर जीत हासिल की।
गुजरात: 1995
गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल को उन्हीं के पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता शंकर सिंह वाघेला ने चुनौती दी, जिनके पक्ष में 47 विधायक थे। रिपोर्ट के मुताबिक वाघेला को तब मध्य प्रदेश के कांग्रेस नेता व तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का पूरा सपोर्ट था। उनकी मदद से वाघेला गुजरात से विधायकों को मध्य प्रदेश के खजुराहो के एक हाई-एंड होटल में लेकर गए थे। हालांकि, तब भाजपा ने बड़ा गेम किया। पार्टी के मुखिया अटल बिहारी वाजपेयी ने तब शंकर सिंह वाघेला और केशुभाई की लड़ाई के बीच सुरेश मेहता को मुख्यमंत्री बना दिया और सभी विधायकों को पार्टी में मिलाए रखा।
उत्तर प्रदेश: 1998
तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी द्वारा कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को भंग कर कांग्रेस नेता जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया था। इसके बाद भाजपा ने बहुमत साबित करने का मौका मांगा तब राज्यपाल ने समय नहीं दिया। इस पर भाजपा इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंची।
हाईकोर्ट ने राज्यपाल के फैसले को गलत बताया और कल्याण सिंह सरकार को बहाल करने के आदेश दे दिए। साथ ही हाईकोर्ट ने भाजपा यानि कल्याण सिंह सरकार को तीन दिन के भीतर विधानसभा बहुमत साबित करने को कहा। इस दौरान कांग्रेस ने अपने सभी सदस्यों को एक रिसॉर्ट में रखवा दिया और 26 फरवरी, 1995 को शक्ति परीक्षण हुआ तब कल्याण सिंह को 225 मत और जगदंबिका पाल को 196 विधायकों का समर्थन मिला।
बिहार: 2000
कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के खिलाफ विश्वास मत के बाद नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जदयू को बिहार में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया था। इसके बाद भाजपा, कांग्रेस, जदयू ने अपने-अपने विधायकों को पटना के एक होटल में भेज दिया। वहीं मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के सात दिन बाद ही नीतीश कुमार विश्वास मत साबित करने में विफल हो गए।
महाराष्ट्र: 2002 और 2022
साल 2002 में भाजपा-शिवसेना गठबंधन द्वारा अपने सदस्यों की खरीद-फरोख्त से बचाने के लिए, तत्कालीन एनसीपी प्रमुख और राज्य के सीएम विलासराव पाटिल ने 71 विधायकों को मैसूरु के रिसॉर्ट में भेज दिया था। इसी तरह के हालात महाराष्ट्र में 2022 में देखने को मिला। जब शिवसेना के दो फाड़ हुए 'एकनाथ शिंदे ग्रुप' और 'उद्धव ठाकरे ग्रुप'। ये 'रिसॉर्ट पॉलिटिक्स' काफी ज्यादा सुर्खियों में रही। शिवसेना के विद्रोह में शिंदे लगभग 45 विधायकों के साथ गुवाहाटी के रिसॉर्ट में चले गए, जिससे राज्य में एमवीए गठबंधन कमजोर हो गया। इसके बाद एकनाथ शिंदे बागी विधायकों की बदौलत महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने।
उत्तराखंड: 2016
27 भाजपा विधायकों के साथ नौ कांग्रेस विधायकों ने तत्कालीन राज्यपाल केके पॉल से मुलाकात की और उत्तराखंड में मुख्यमंत्री हरीश रावत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को बर्खास्त करने की मांग की। इसके बाद बीजेपी ने अपने 27 विधायकों को दो समूहों में होटल जयपुर ग्रीन्स और जयपुर के एक फार्महाउस में भेज दिया था। वहीं अगले साल 2017 में कांग्रेस विधानसभा चुनाव ही हार गई।
तमिलनाडु: 2017
ओ पन्नीरसेल्वम के तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद, शशिकला ने एआईएडीएमके पार्टी को अपने हाथों में ले लिया। वहीं बागी गुट के डर से शशिकला ने अपने वफादार विधायकों को चेन्नई के पास गोल्डन बे रिजॉर्ट में भेज दिया। हालांकि, बाद में एडप्पादी पलानीस्वामी को मुख्यमंत्री के रूप में चुना गया, जिन्होंने बाद में फ्लोर पर बहुमत भी साबित कर दिखाया।
राजस्थान: 2022
साल 2022 में राजस्थान में राज्यसभा चुनाव के दिन क्रॉस वोटिंग न हो और विधायकों की खरीद फरोख्त न हो, इसके लिए कांग्रेस ने तो अपने विधायकों को रिजॉर्ट और होटल में भेज दिया था। तब चार राज्यों में 10 जून को 16 सीटों के लिए राज्यसभा चुनाव होने वाला था। इनमें राजस्थान की चार सीटें भी शामिल थीं।
कुछ इसी तरह 2018 से 2023 के बीच राजस्थान में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर अशोक गहलोत और सचिन पायलट आपस में ही 'रिसॉर्ट पॉलिटिक्स' खेलते रहे। जुलाई 2020 में सचिन पायलट ने भी बगावती तेवर दिखाते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए अपने समर्थित विधायकों के साथ राजस्थान से बाहर मानेसर के एक होटल में जाकर ठहर गए।












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