देश के नेता अब नहीं करते कॉफी पे चर्चा
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) देश में कॉफी हाऊस कल्चर पर बात हो और राजधानी के कनाट प्लेस स्थित इंडियन कॉफी हाऊस की चर्चा न हो, ये कैसे मुमकिन है। बेशक, ये देश के उन कॉफी हाऊस में से एक हैं, जिधर कभी बड़े नेता, लेखक पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता वगैरह बैठते थे।
गर्मागर्म चाय और कॉफी को पीते हुए देश-दुनिया की बातें होती थीं। एक दौर में दिल्ली के इस इंडियन कॉफी हाऊस में पूर्व प्रधानमंत्री चद्रशेखर, आई.के.गुजराल, समाजवादी आंदोलन के पुरोधा राममनोहर लोहिया जी से लेकर साहित्य की दुनिया के बड़े नाम जैसे अवारा मसीहा वाले विष्णु प्रभाकर, द्रोणवीर कोहली, भीष्म साहनी वगैरह बैठते थे। भीष्म साहनी महान फिल्म अभिनेता बलराज साहनी के छोटे भाई थे।
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अखंड चर्चा
तमाम समसामयिक विषयों पर बात होती थी। अलग-अलग टेबलों पर बैठकर गप हो रही होती थी। हर वक्त चर्चा। अखंड चर्चा के दौर चलते थे। हालत ये होती थी कि इंडियन कॉफी हाऊस में काम करने वाले भी इन चर्चाओं का हिस्सा बन जाते थे।
1950 से चल रहा है
इंडियन कॉफी हाऊस की स्थापना 1950 के आसपास हुई थी। यहां पर सब कुछ काफी सस्ता मिलता था। दिल्ली सरकार इसे चलाती थी। कई बार बंद होने की नौबत आई तो अखबारों में विरोध में लेख छपने लगे तो सरकार को इसे फिऱ से फंड देकर बचाना पड़ा।
वक्त बदला और नेताओं के पास पैसा आ गया तो उन्होंने तो इंडियन कॉफी हाऊस से दूरियां बना लीं। पर लेखक और पत्रकार इधर आते रहे। वरिष्ठ पत्रकार डी.पी. सिंह ने कहा कि उन्होंने इधर आई.के.गुजराल को लगातार आते देखा। वे जब मंत्री भी थे तब भी इधर आ जाया करते थे। चंदशेखर भी काफी समय तक इधर आते रहे।
गजब का अनुभव
इस इंडियन कॉफी हाऊस की फिजाओं में सुकून है, आनंद है। दिल्ली के क्नाट प्लेस स्थित हनुमान मंदिर में मोहन सिंह प्लेस में बने इंडियन कॉफी हाऊस में आकर आपको अब गुजरे दौर के कुछ बेहद जाने-पहचाने शख्स और चेहरे दिख जाते हैं। इंडियन कॉफी हाऊस में आना अपने आप में एक अनुभव होता है।













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