भारत की 7 में से 1 दवा रिजेक्टेड माल का हिस्सा
सिर में दर्द होता है, तो झट से पेन किलर खा लेते हैं। पेट में दर्द हुआ, तो दवा के डिब्बे से पेट दर्द की दवा तब आपके लिये रामबाण बन जाती है और जब पेचिस आती है, तो डॉक्टर के पास जाने से पहले आप लोमोफेम या डिपेंडॉल खा लेते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं भारत में बिकने वाली प्रत्येक 7 में से 1 दवा मानक से नीचे हैं। ये वो दवाएं हैं, जिन्हें अमेरिका, कोरिया, जापान, चीन जैसे देशों ने बैन कर दिया है या फिर रिजेक्ट कर दिया है, लेकिन भारत में आसानी से उपलब्ध हैं। और तो और डॉक्टर मरीजों को ऐसी दवाएं देते भी हैं।
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पिछले पांच सालों में किये गये अध्ययन के अनुसार जो दवाएं बाजार में बेची जा रही हैं, उनमें से अधिकांश बीमारियों को दूर करने के बजाये, बढ़ाती हैं। कैसे बढ़ाती हैं, यह आप पढ़ सकते हैं और भी हैं, रोचक तथ्य जो आप पढ़ सकते हैं यहां पर-
- भारत के लोग प्रति वर्ष 383 दवाएं खा जाते हैं। आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त दवा कंपनियां प्रतिवर्ष 289 बिलियन दवाएं बनाती हैं। बाकी की बची 95 बिलियन दवाएं कहां बनती हैं, किसी को नहीं मालूम। य वो दवाएं हैं, जो नकली हैं और जहर के रूप में फैल चुकी हैं।
- भारत सरकार के पास दवा बनाने वाली कंपनियों का संपूर्ण संगठित डाटा उपलब्ध नहीं है, जो यह बता सके कि कितनी कंपनियों के पास लाइसेंस हैं, कितनों के लाइसेंस कब तक वैलिड हैं, कौन सी कंपनी सालाना कितनी दवाओं का उत्पादन कर रही है।
- भारत सरकार के पास इस बात का भी संगठित रिकॉर्ड नहीं है कि आपके पड़ोस में फार्मेसी की दुकान के मालिक के पास लाइसेंस है भी या नहीं। और उपभोक्ता कभी मेडिकल शॉप वाले से पूछते भी नहीं हैं कि उनके पास लाइसेंस है या नहीं।
- फरवरी 2016 में दवा खरीदते वक्त लोग केवल एक्सपाइरी डेट देखते हैं। यह नहीं देखते कि कितने दिन पहले से यह दवा सही स्टोरेज सुविधा के अभाव को झेल चुकी है। तापमान में थोड़ा सा भी परिवर्तन दवा के अंदर रसायनिक परिवर्तन कर सकता है। उदाहरण- फरवरी 2016 में दवा खरीदते वक्त आपने देखा कि दवा की एक्सपाइरी डेट दिसंबर 2017 है और आप झट से उसे खरीद लेते हैं। लेकिन आपने नहीं देखा कि मैन्युफैक्चरिंग डेट जनवरी 2015 थी। यानि पिछले एक साल से ज्यादा समय तक यह दवा अलग-अलग तापमान में रही, अलग-अलग जगहों पर रखी रही। उसमें रसायनिक परिवर्तन तो लाजमी हैं।

नकली दवाएं
एसोचैम की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में बिकने वाली दवाओं में से 25 प्रतिशत दवाएं नकली हैं। उस भारत में जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा दवा का बाजार है।

58.2% स्वास्थ्य पर खर्च
भारत में रहने वाले लोग औसतन अपनी जेब का 58.2% धन स्वास्थ्य पर खर्च करे हैं। स्वास्थ्य पर खर्च होने वाले पैसे का 70% से 77% पैसा केवल दवाओं पर जाता है।

4.5% दवाएं मानक से नीचे
सीडीएससीओ के ताजा सर्वे के अनुसार भारत में 4.5% दवाएं मानक से नीचे हैं। ये वो दवाएं हैं, जिनका निर्माण बड़ी-बड़ी कंपनियां कर रही हैं।

सबसे ज्यादा रिस्क एंटीबयोटिक दवाओं में है
भारत में मिलने वाली एंटीबयोटिक दवाओं में सबसे ज्यादा रिस्क है। क्योंकि जीवाणुओं को मारने वाली ये दवाएं मरीज की प्रतिरक्षण प्रणाली को कमजोर बना देती हैं और ज्यादा एंटीबयोटिक लेने वाला मरीज जल्दी-जल्दी बीमार पड़ता है।

किलर बनी पेन किलर
डिक्लोफेनक सोडियम एक सॉल्ट है जो लगभग सभी पेन किलर दवाओं यानि दर्द निवारक दवाओं में होता है। दिसंबर 2015 की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार देश के 32 सैम्पल टेस्ट किये गये, जिसके बाद पाया गया कि ये सभी स्टैंडर्ड क्वालिटी की नहीं हैं। वहीं फास्ट पेनकिलर अमोक्सीसिलिन ट्राईहाइड्रेट के 46 सैम्पल मानक पर खरे नहीं उतरे।

दर्द निवारक मरहम
जेपी यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ फर्मेसी के प्रोफेसर अहमद नवाज खान के अनुसार 15.62 प्रतिशत दर्द निवारक मरहम, जिनमें डिक्लोफेनक सोडियम होता है और 13 प्रतिशत अमोक्सीसिलीन ट्राई हाइड्रेट मानक से नीचे के हैं।

50 फीसदी दवा
महंगी दवाओं में देखें तो भारत में बिकने वाली अधिकांश महंगी दवाओं में जो केमिकल रैपर पर लिखा होता है, उसकी मात्रा 50 से 60 प्रतिशत से नीचे होती है। जबकि मानक के अनुसार लिखा हुआ सॉल्ट 90 से 100 प्रतिशत तक होना चाहिये।












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