Raghuram Rajan: क्या रघुराम राजन अब राज्य सभा में जाकर राजनीति में हाथ आजमाएंगे?
Raghuram Rajan: राज्यसभा का चुनाव 27 फरवरी को होना है। खबर है कि आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन महाराष्ट्र विकास आघाडी (एमवीए) के उम्मीदवार होंगे। इस खबर का आधार है रघुराम राजन की शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे से मुलाकात। यह मुलाकात 31 जनवरी को मुंबई मे हुईं थी।
उसके बाद आदित्य ठाकरे ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट की, जिसमें कहा गया है कि - "हमारे घर, मातोश्री में रघुराम राजन जी की मेजबानी खुशी की बात है। हमारी अर्थव्यवस्था में विभिन्न भूमिकाओं में उनका पहले से ही व्यापक योगदान है। हमारा दृढ़ विश्वास है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य की दृष्टि वाले ऐसे व्यक्तियों का नेतृत्व मिलना चाहिए।"

एमवीए में कांग्रेस, एनसीपी (शरद पवार गुट) और शिवसेना (यूबीटी) शामिल हैं। महाराष्ट्र से छह राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होने हैं। इस बात की तेज चर्चा है कि रघुराम राजन को कांग्रेस उम्मीदवार या एमवीए के संयुक्त उम्मीदवार के रूप में उम्मीदवार बनाया जा सकता है।
महाराष्ट्र विधान सभा में कांग्रेस के पास 45 विधायक हैं और राज्य सभा का चुनाव जीतने के लिए 42 विधायकों का समर्थन चाहिए। इसलिए यदि रघुराम राजन को उम्मीदवार बनाया जाता है, तो उनके जीतने की पूरी संभावना है। एक नजर डालते हैं रघुराम राजन के व्यक्तित्व पर।
रघुराम राजन 2013 से 2016 तक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर रहे हैं। अपने तीन साल के कार्यकाल में उन्होंने अपनी मनमर्जी चलाई और 2014 में मोदी सरकार आने के बाद रिजर्व बैंक की नीतियों को लेकर सरकार के साथ कई बार उनकी असहमति रही।
रिजर्व बैंक गवर्नर बनने से पहले वह मनमोहन सिंह सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार भी रह चुके थे। सितंबर 2013 में उन्होंने डी. सुब्बाराव से आरबीआई की कमान ली और बैंकिंग और मुद्रा बाजार को अपनी सोच के अनुसार चलाया। अक्सर उनके फैसलों को लेकर खूब विवाद हुआ।
राजन के समर्थक उन्हें भारत की अर्थव्यवस्था को बचाने का श्रेय देते हैं तो उनके आलोचक उन्हें भारत के उद्योग जगत को डुबाने और बाजार से मांग गायब करने के लिए जिम्मेदार बताते हैं। भाजपा नेता सुब्रहमण्यन स्वामी ने उनके बारे में एक बार कहा था - "राजन ऐसा डॉक्टर है, जो बुखार का बेहतर इलाज मरीज को मार देना मानता है।"
हालांकि कांग्रेस पार्टी में रघुराम राजन के कई बड़े समर्थक हैं। मोदी सरकार के आलोचक राजन की प्रशंसा करते रहते हैं। राहुल गांधी भी कई मौकों पर उनसे सलाह ले चुके हैं। पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम उन्हें अर्थव्यवस्था को समझने वाले बेहतरीन दिमाग वाले शख्स मानते हैं।
एक दक्षिण भारतीय परिवार में जन्में, दिल्ली के डीपीएस आरकेपुरम से स्कूली शिक्षा प्राप्त करने वाले राजन आईआईटी दिल्ली से प्रौद्यगिकी में स्नातक और उसके बाद आईआईएम अहमदाबाद से मैनेजमेंट की डिग्री लेकर विदेश चले गये थे। राजन आईएमएफ के चीफ इकोनॉमिस्ट के पद पर भी काम कर चुके हैं।
भारत में मनमोहन सिंह ने उन्हें अपना मुख्य आर्थिक सलाहकार बनाया और फिर वह आरबीआई के गवर्नर बना दिए गए। राजन के पास अमरीका का ग्रीन कार्ड भी है। इस कारण उनके विरोधी उन्हें अमरीका परस्त होना बताते हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी भी राजन को विदेशी सोच वाला व्यक्ति बता चुके हैं।
रघुराम राजन के समर्थकों का कहना है कि जिस समय उन्होंने आरबीआई की कमान संभाली थी, देश के सामने कई चुनौतियां खड़ी थीं। महंगाई तेजी से बढ़ रही थी और रुपये में भारी गिरावट देखी जा रही थी। विकास दर भी घट कर पांच फीसदी के पास आ गई थी। विदेशों में भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिर से डांवाडोल करार दिया गया था। लेकिन राजन ने अपने नेतृत्वकौशल और अर्थव्यवस्था की बेहतरीन समझ से स्थिति को काफी हद तक संभाल दिया। उन्होंने व्यापार घाटे को कम किया, मुद्रा स्फीति को काफी हद तक काबू में रखा और रुपये को कुछ हद तक स्थिर रखने में भी कामयाबी हासिल की।
राजन अपने काम में हस्तक्षेप बर्दाश्त नही करते इस कारण उन्हें निरंकुश भी माना जाता है। मोदी सरकार के साथ उनकी शुरुआत से ही नहीं बनी। उन्होंने बैंकों पर जबर्दस्त दबाव बनाना शुरू किया। आरबीआई के खजाने से सस्ते पैसे देने के बजाय उन्होंने बैंकों को मुद्रास्फीति से संबंद्ध बांड जारी कर पैसा जुटाने का रास्ता बताया। कॉरपोरेट क्रेडिट यानी कर्जों पर पूरी तरह अंकुश लगा दिया। नतीजा यह हुआ कि बैंकों को महंगे ऑप्शन पर जाने को मजबूर होना पड़ा। कॉरपोरेट जगत की बैंलेस शीट पूरी तरह बिगड़ कर रह गई और बाजार से मांग गायब हो गई, जिससे औद्योगिक उत्पादन दर में नकारात्मक वृद्धि आ गई।
रघुराम राजन की सोच थी कि मुद्रा नीति कठोर ही रहनी चाहिए। मार्केट में एक अनुशासन बना रहना चाहिए। बैंक जब तक अपने एनपीए को कम कर स्टेबल नहीं हो जाते तब तक एग्रेसिव क्रेडिट पॉलिसी नहीं अपनानी चाहिए। राजन कई बार वह अपनी सीमा से आगे जाकर भी सरकार के कुछ फैसलों की आलोचना करने लगे। उन्होंने पीएम मोदी के मेक इन इंडिया प्रोग्राम का भी मजाक उड़ाया। उन्होंने मेक इन इंडिया के बजाय मेक फॉर इंडिया का नारा दिया।












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