पक्षी प्रेमियों के लिए 'मक्का' है छत्तीसगढ़ का गिधवा

रायपुर। छत्तीसगढ़ की रायपुर से लगभग 70 किलोमीटर दूर बेमेतरा जिले का गिधवा गांव इन दिनों पक्षी प्रेमियों की पसंदीदा जगह बन गई है। यहां दूर-दूर से लोग स्थानीय और विदेशी पक्षियों को देखने पहुंच रहे हैं। गांव में पक्षियों के आने से बहार आ गई है। शासन ने इस क्षेत्र को पक्षी विहार के रूप में चिह्न्ति किया है।

Birds

प्रस्तावित पक्षी विहार के बारे में पक्षी विशेषज्ञ अनुभव शर्मा का कहना है कि इस पक्षी विहार को संवारने के लिए हर संभव प्रयास जल्द से जल्द किया जाना चाहिए, अन्यथा पक्षियों को मनमाफिक वातावरण नहीं मिला तो यह इलाके से अपना मुंह भी मोड़ सकते हैं।

जो पक्षी इन दिनों बड़ी संख्या में नजर आ रहे हैं, उनमें प्रमुख हैं स्पुन बील, व्हाइट आइबिस, ब्लैक क्राउंड हेरेन, ग्रे-हेरेन, कामर्ोेंट, ग्रेट-इरेट, लेजर विसलिंग, ब्लैक आइबिस, कॉटन टी, कामन टी, पिंटेल, स्नाइक, किंगफिशर व कोक डक। सूबे का प्रस्तावित पक्षी-विहार गिधवा, इन दिनों पक्षी प्रेमियों और फोटो पत्रकारों के लिए मक्का बन गया है। फोटो पत्रकार शिरीष दामरे ने यहां की सैकड़ों तस्वीरें अपने कैमरे में कैद किए हैं।

रायपुर-बिलासपुर मुख्य मार्ग पर नांदघाट से करीब 8 किलोमीटर दूर स्थित है ग्राम गिधवा। गांव की सड़क किनारे 8 हेक्टेयर के तालाब व आसपास के क्षेत्र को इन दिनों तरह-तरह के प्रवासी पक्षियों ने अपना ठिकाना बनाया है। यह पहली बार नहीं है, जब यहां इतने पक्षी नजर आ रहे हों। ग्रामीणों की माने तो यहां लगभग 2 साल से मेहमान पक्षियों के पहुंचने का सिलसिला जारी है। तालाब के करीब 5, हेक्टेयर पर जलाशय भी है। तालाब के पानी उनके लिए अनुकूल है।

मछलियां बनती हैं भोजन

पक्षियों को यहां काई, मछली आदि भोजन आसानी से प्राप्त हो जाता है। यह तालाब कमल के फूलों से सजा हुआ है। इसके बाद भी पक्षियों के लिए तैरने के लिए पर्याप्त जगह है। इसके अलावा टीले पर अक्सर पक्षी धूप में अपने पंखों को सुखाते नजर आते हैं। तालाब में तैरते तो कभी टीले में बैठे पक्षियों की उछलकूद लोगों को काफी आकर्षित कर रही है। प्रतिदिन यहां पक्षी प्रेमियों का जमावड़ा लगा रहता है। सुबह से शाम तक पक्षियों का दीदार कर उनकी तस्वीरें लेने में पक्षी प्रेमियों को अलग आनंद मिलता है।

गिधवा गांव के इस क्षेत्र में किसी मेले से कम रौनक नहीं है। पिछले साल सरकार ने इस क्षेत्र को पक्षी विहार के रूप में विकसित करने की योजना भी बनाई थी। गिधवा के अलावा प्रदेश के दो और स्थानों को पक्षी विहार बनाने के लिए प्रस्तावित किया गया। उस समय पक्षी विहार के लिए तेजी से हलचल मची। उसे देखते हुए यह माना जा रहा था कि प्रदेशवासियों को पक्षी विहार का तोहफा जल्द ही मिलेगा। अब सरकार इसमें देरी कर रही है। ऐसा न हो कि लगातार देरी से पक्षी इस क्षेत्र से मुंह मोड़ लें।

इस संबंध में पक्षी विशेषज्ञ प्राण चड्डा ने भी कुछ सुझाव दिए हैं। उनके मुताबिक, बफर जोन घोषित करने के लिए अधिसूचना जारी की जाए। पक्षी विहार बनाने से पहले ऐसे विशेषज्ञों की राय ली जाए, जो मौके का मुआयना कर चुके हैं। बंदूक मालिकों की नामजात थाने में दर्ज कराई जाए। एक-एक हार्स पावर के तीन पंप लगाए जाए, ताकि अप्रैल-मई में तालाब न सूख पाए।

उनका सुझाव यह भी है कि तालाब के मेड़ में फलदार की जगह बबूल के पेड़ लगाए जाएं। इस क्षेत्र में आगे निर्मित होने वाले मकानों की छत हरे रंग की हो। मेड़ को चौड़ा बनाया जाए, ताकि सैलानी इसका उपयोग कर साइकिल व रिक्शे से घूम सकें। इससे उन्हें फोटोग्राफी करने में भी आसानी होगी। इसे राजस्थान के भरतपुर बर्ड सेंचुरी की तर्ज पर विकसित किया जाए।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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