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Pranab Mukherjee: क्लर्क से राष्ट्रपति पद तक पहुंचे थे प्रणव मुखर्जी, लेकिन PM बनने का सपना रहा अधूरा

आजादी से पहले वर्ष 1935 में बंगाल के एक छोटे से गांव में जन्मा बालक अपनी योग्यता के बलबूते पर न केवल बंगाल से दिल्ली पहुंचा बल्कि सियासत के गलियारों में उसने वह सर्वोच्च स्थान हासिल किया, जिसकी सभी कामना करते हैं।

हालांकि उसका सपना प्रधानमंत्री बनने का था, लेकिन उन्होंने तीनों सेनाओं के सेनापति व राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया। जी हां हम बात कर रहे हैं कांग्रेस के संकट मोचक के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणव मुखर्जी की। आज 31 अगस्त को उनकी पुण्यतिथि है। आईए जानते हैं कैसे प्रणव दा एक छोटे से गांव से देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचे।

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गांव में जन्मे, पढ़ाई के लिए कोलकाता आए

प्रणब मुखर्जी का जन्म 11 दिसंबर 1935 में बंगाल के वीरभूम जिले के मिराती गांव में बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता कामदा किंकर मुखर्जी स्वतंत्रता सेनानी थे और 1952-64 तक बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे। इनकी माता राजलक्ष्मी मुखर्जी गृहणी एवं स्वतंत्रता सेनानी थी। घर में राजनैतिक माहौल होने की वजह से बचपन से ही प्रणब मुखर्जी का मन राजनीति में लगने लगा। उन्होंने शुरूआती पढ़ाई अपने गृहनगर के स्थानीय स्कूल में ही पूरी की, लेकिन आगे की पढ़ाई उन्होंने सूरी विद्यासागर कॉलेज से राजनीति शास्त्र एवं इतिहास में स्नातक करते हुए पूरी की थी। बाद में वे कानून की पढाई के लिए कोलकाता आए और यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया।

क्लर्क, प्रोफेसर, पत्रकार और फिर राजनीति की सीढ़ी

अपने करियर की शुरुआत प्रणब मुखर्जी ने पोस्ट एंड टेलीग्राफ़ ऑफिस से की, जहां वे एक क्लर्क थे। सन 1963 में विद्यानगर कॉलेज में वे राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर बन गए और साथ ही साथ देशेर डाक में पत्रकार के रूप में कार्य करने लगे। उन्होंने राजनैतिक सफ़र की शुरुआत 1969 में की। तब वे कांग्रेस से राज्यसभा के सदस्य बन गए। वे चार बार इस पद के लिए चयनित हुए और थोड़े समय में ही इंदिरा गांधी के चहेते बन गए। वर्ष 1973 में इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान वे औद्योगिक विकास मंत्रालय में उप-मंत्री बने।

1975-77 में आपातकाल के दौरान प्रणब मुखर्जी पर बहुत से आरोप भी लगे लेकिन इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के बाद उन्हें क्लीन चिट मिली। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान सन 1982 से 1984 तक प्रणव दा को देश का वित्त मंत्री बनाया गया‌। इंदिरा की मौत के पश्चात राजीव गाँधी से उनके संबंध ठीक नहीं रहे और मतभेद के चलते प्रणब दा ने अपनी अलग "राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस" पार्टी गठित कर दी। वर्ष 1989 में राजीव गाँधी के साथ सुलह होने के बाद वे एक बार फिर कांग्रेस से जुड़ गए। ऐसा कहा जाता है कि इंदिरा गाँधी की मौत के बाद प्रणब खुद को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में देखते थे, लेकिन उनकी मौत के बाद राजीव गाँधी के आ जाने से उनका सपना पूरा नहीं हो पाया।

सोनिया को कांग्रेस प्रमुख बनाने का श्रेय प्रणव को

राजीव गांधी की मौत के बाद जब सोनिया गाँधी ने राजनीति में आने का निर्णय लिया तो प्रणब मुखर्जी उनके सलाहकार के रूप में सामने आए और उन्हें बताया कि कैसे उनकी सास इंदिरा काम किया करती थी। सोनिया को कांग्रेस प्रमुख बनाने में प्रणब की बड़ी भूमिका रही। राजनीति के सारे दांवपेच सोनिया को प्रणब ने ही सिखाये। प्रणब के परामर्श के बिना सोनिया कुछ नहीं करती थी।
सन 2004 में प्रणब ने जंगीपुर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल कर लोकसभा सदस्य बने। इनके साथ ही कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में केन्द्र में यूपीए सरकार बनी। इस दौरान उन्होंने रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, वित्त मंत्री और लोकसभा में पार्टी के नेता के रूप में सराहनीय काम किया। उन्होंने कांग्रेस की डूबती नैया को कई बार किनारे लगाया।

प्रधानमंत्री बनना चाहते थे, अपनी किताब में किया खुलासा

अपनी जीवनयात्रा पर लिखी पुस्तक "द कोलिशन इयर्स" में स्वयं प्रणब मुखर्जी ने इस बात का खुलासा किया था कि वो प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। किताब में मुखर्जी ने माना कि मई 2004 में जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया था तब उन्होंने उम्मीद की थी कि वह पद उन्हें मिलेगा। लेकिन सोनिया ने मनमोहन सिंह का नाम आगे कर दिया और उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया। हालांकि उन्होंने वित्त मंत्रालय में अपने अधीन काम कर चुके मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में शामिल होने से मना कर दिया था लेकिन सोनिया के अनुरोध के बाद वे मान गए।

2012 में चुने गए भारत के 13वें राष्ट्रपति, 30 दया याचिकाएं खारिज की

सन 2012 में प्रणब मुखर्जी पीए संगमा को भारी मतों से हराकर राष्ट्रपति पद पर आसीन हुए। वे पहले बंगाली थे, जो इस पद पर पहुंचे। इस दौरान उन्होंने दया याचिकाओं पर सख्त रुख अपनाया। उनके सम्मुख 34 दया याचिकाएं आईं और इनमें से 30 को उन्होंने खारिज कर दिया। इनमें 2008 मुंबई हमलों के दोषी अजमल कसाब और 2001 में संसद हमलों के मुख्य आरोपी अफजल गुरू और याकूब मेमन की याचिकाएं भी शामिल थीं। जनता के राष्ट्रपति के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले मुखर्जी को राष्ट्रपति भवन को जनता के निकट ले जाने का श्रेय भी दिया जाता है। उन्होंने राष्ट्रपति भवन के द्वार आम जनता के लिए खोले और एक संग्रहालय भी बनवाया।

आरएसएस के कार्यक्रम में भी शिरकत की

26 जनवरी 2019 में केंद्र की एनडीए सरकार ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया। इससे पूर्व जून 2018 में वो राष्ट्रीय सवयंसेवक संघ के बुलावे पर उसके मुख्यालय नागपुर भी गए। उन्होंने आरएसएस के संस्थापक केशव हेडगवार की तारीफ़ करते हुए कहा कि देश की राजनीति में नफ़रत और असहनशीलता के लिए कोई जगह नहीं है। जहाँ बीजेपी ने उनकी तारीफ़ की, वहीं कांग्रेस को उनका ये कदम नागवार गुज़रा। 31 अगस्त 2020 को बीमारी के चलते 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

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