Protests in Israel: झुक ही गए नेतन्याहू, जानें क्यों हुआ इजराइल में आंदोलन
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा न्यायपालिका में सुधारों के प्रस्ताव लाने के कारण बीते तीन महीनों से इजराइल में प्रदर्शन हो रहे थे।

Protests in Israel: इजराइल में इन दिनों उथलपुथल मची हुई है। न्यायपालिका में सुधार की नेतन्याहू सरकार की कोशिशों के खिलाफ लाखों लोग तेल अवीव की सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रहे हैं। तकरीबन 3 महीनों से आम जनता प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा ले रही है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू के कथित न्यायिक सुधार इजराइल के लोकतंत्र के लिए खतरा है।
वहीं, राष्ट्रपति हर्जोंग ने भी प्रस्तावित कानून को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया है। उन्होंने कहा, यह कौन सा सुधार है जिसके चलते लाखों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए हैं। इस बीच बीती रात यानि 27 मार्च को नेतन्याहू ने विवादस्पद न्यायिक कानून सुधारों पर अस्थाई रूप से रोक लगाने का ऐलान किया है।
बता दें कि नेतन्याहू के खिलाफ यह प्रदर्शन पूरे देश में हो रहे हैं। इनमें शामिल लोगों का कहना है कि सरकार प्रस्तावित बदलावों को रद्द करें और प्रधानमंत्री नेतन्याहू इस्तीफा दें। वहीं इन प्रदर्शनों की अगुवाई नेतन्याहू के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी कर रहे हैं।
नेतन्याहू के किस फैसले से लोग हैं नाराज?
दरअसल प्रधानमंत्री नेतन्याहू के विरोधियों का कहना है न्यायपालिका से जुड़े नियमों में बदलाव से पीएम को एक सुरक्षा कवच मिल जाएगा। नेतन्याहू फिलहाल भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए हैं। उनके खिलाफ एक मुकदमा चल रहा है। आलोचकों का कहना है कि प्रधानमंत्री खुद को बचाने लिए ही न्यायपालिका में बदलाव करना चाह रहे हैं।
जबकि सरकार जो योजना बना रही है उसके मुताबिक
● कानूनों की समीक्षा और उन्हें खारिज करने की सुप्रीम कोर्ट की ताकत घट जाएगी। संसद में बहुमत के जरिये कोर्ट के फैसलों को भी बदला जा सकेगा।
● वहीं सुप्रीम कोर्ट समेत सभी अदालतों में जजों की नियुक्ति में भी सरकार का फैसला ही निर्णायक होगा। नए बदलावों से जजों को नियुक्ति करने वाली कमेटी में सरकार का प्रतिनिधित्व होगा।
● मंत्रियों के लिए उनके कानूनी सलाहकारों (अटॉर्नी जनरल के निर्देश पर) की सलाह मानना जरूरी नहीं रह जाएगा। फिलहाल कानून के मुताबिक उन्हें ये सलाह माननी पड़ती है।
● सरकार ने जो बदलाव प्रस्तावित किए हैं, उनमें से एक कानून बन चुका है। इसके तहत अटॉर्नी जनरल के उस अधिकार को निरस्त कर दिया गया है जिसके तहत वो सत्तारुढ़ प्रधानमंत्री को अयोग्य साबित कर सकता था। मतलब ये कि अब प्रधानमंत्री को शारीरिक या मानसिक अस्वस्थता के अलावा और किसी कारण से नहीं हटाया जा सकता है, जब तक कि उसे कैबिनेट का समर्थन है।
क्या हैं नेतन्याहू पर आरोप?
बेंजामिन नेतन्याहू पर रिश्वत लेने, फ्रॉड और विश्वासघात के कई केस चल रहे हैं। नेतन्याहू भले ही इन आरोपों का खंडन करते आए हैं, लेकिन जून 2021 में उन्हें इसी वजह से अपना पद छोड़ना पड़ गया था। हालांकि, नवंबर 2022 में हुए चुनावों में नेतन्याहू ने सत्ता में फिर से वापसी की। प्रदर्शनकारियों को आशंका थी कि एक बार न्यायपालिका में यह सुधार लागू हो जाएंगे तो इजराइल की संसद के पास साधारण बहुमत से सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को रद्द करने की शक्ति मिल जाएगी। वहीं इन शक्तियों का प्रयोग सरकार संसद के माध्यम से बेंजामिन नेतन्याहू को उन तमाम आरोपों और मुकदमों से बचाने के लिए कर सकती है, जो उनके ऊपर सत्ता में लगातार 12 साल रहने के दौरान लगे थे।
इजराइल का संविधान कैसा है?
असल में इजराइल में कोई लिखित संविधान नहीं हैं। वहां 14 बेसिक लॉ होते है जोकि हर बनने वाले कानून का आधार होते हैं। अगर पीएम नेतन्याहू की सरकार इनमें बदलाव करने में सक्षम-सफल हो जाती है तो आगे वह कोई भी बदलाव आसानी से कर सकती है।
अभी इजराइल के बेसिक लॉ ने सुप्रीम कोर्ट को यह शक्ति दी है कि वह संसद में लाए किसी भी कानून की समीक्षा कर सकती है और उसकी वैधता की जांच भी कर सकती है। यहीं पर नेतन्याहू सरकार इजराइल के मूल कानूनों में बदलाव लाकर सुप्रीम कोर्ट से यह शक्ति छीनना चाह रही है। क्योंकि अभी कोर्ट के पास जो शक्ति है कि उसके निर्णय सर्वोपरि होते हैं और इन पर आपत्ति नहीं की जा सकती है।
प्रधानमंत्री बनते ही प्रस्ताव लेकर आये
न्यायिक सुधारों की बात बेंजामिन नेतन्याहू वैसे तो अपने चुनाव प्रचार में भी करते रहे थे। इसके बाद जब वह नवंबर 2022 में सत्ता में आये तो सबसे पहले उन्होंने जनवरी में इन प्रस्तावों को पटल पर रखा। प्रस्ताव पेश करते ही इसका विरोध शुरू हो गया था। बीते तीन महीनों से पूरे देश में अलग-अलग कई प्रदर्शन हुए और अब अराजकता की स्थिति बनने लगी थी।
इसी बीच बीते 25 मार्च नेतन्याहू ने अपने ही रक्षा मंत्री योआव गैलेंट को सरकार से निकाल दिया, क्योंकि उन्होंने उन न्यायिक सुधारों को रोकने का सरकार से आह्वान किया था। रक्षा मंत्री को हटाने पर मामला और भड़क गया।
मजदूर संगठनों ने कर दी 'ऐतिहासिक' हड़ताल
इसके बाद 26-27 मार्च 2023 को देश के कई संगठन सड़कों पर उतर आए। इजराइल के सबसे बड़े श्रमिक संघ 'हिस्ताद्रुत' के प्रमुख अर्नोन बार-डेविड ने सरकार के खिलाफ 'ऐतिहासिक' हड़ताल की घोषणा की। वहीं तेल अवीव में इजराइल के मुख्य हवाई अड्डे बेन गुरियन एअरपोर्ट ने 'ऐतिहासिक श्रम हड़ताल' की घोषणा के बाद वहां से विमानों की उड़ान पर रोक लगा दी। उच्च और माध्यमिक स्कूल छात्रों का प्रतिनिधित्व कर रही 'नेशनल स्टूडेंट एंड यूथ काउंसिल' ने 27 मार्च की सुबह से देशव्यापी हड़ताल की घोषणा कर दी। सबसे बड़ी बात ये है कि सरकार की इस विवादित योजना के खिलाफ विदेश में विभिन्न इजराइली मिशन में तैनात राजनयिकों ने भी हड़ताल शुरू कर दी थी।
...आखिरकार झूक गये नेतन्याहू
तकरीबन तीन महीनों से व्यापक विरोध-प्रदर्शनों के बीच इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सोमवार की रात ऐलान किया कि वह विवादस्पद बन चुके इन न्यायिक कानून सुधारों पर अस्थाई रूप से रोक लगा रहे हैं। साथ ही उन्होंने जनता से जिम्मेदाराना व्यवहार करने और हिंसा से दूर रहने की अपील की है। नेतन्याहू के इस ऐलान को लोकतंत्र की जीत के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं तेल अवीव की सड़कों आज (28 मार्च) को धीरे-धीरे शांति लौटने लगी है।
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