प्रशांत महासागर में की जाएगी एलियन के क्रैश विमान की तलाश, UFO खोजने के लिए हार्वर्ड वैज्ञानिक का अभियान
प्रोफेसर लोएब कह चुके हैं, कि हमें एलियंस के साथ कॉन्टैक्ट करना चाहिए, क्योंकि जिस दिन हम तकनीकी तौर पर पूर्ण रूप से विकसित हो जाएंगे, उस दिन पृथ्वी नष्ट होने के लिए तैयार हो जाएगी।

Alien spacecraft in Pacific Ocean: हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने एलियंस के विमान, जिसे यूएफओ कहा जाता है, उसकी तलाश के लिए प्रशांत महासागर में अभियान चलाने की बात कही है। हॉर्वर्ड यूनिवर्सीटी के प्रोफेसर ने प्रशांत महासागर से उस एलियन टेक्नोलॉजी को बाहर निकालने का तरीका भी बताया है, जो किसी साइंस फिक्शन फिल्म की तरह ही लगता है। उन्होंने चुंबक के जरिए यूएफओ को प्रशांत महासागर से निकालने की बात कही है। हार्वर्ड के प्रोफेसर एवी लोएब ने प्रसिद्ध रूप से घोषित किया है, कि 2017 इंटरस्टेलर उल्कापिंड, जिसे ओउमुआमुआ नाम दिया गया था, वो अनुमानित तौर पर करीब 3,000 फीट लंबा था, वो प्रशांत महासागर में गिरा था और हो सकता है, कि उसे किसी अलौकिक सभ्यता ने धरती पर भेजा हो। लिहाजा, उसकी जांच करना जरूरी है।

कुछ महीनों में शुरू होगी खोज
एलियंस के ऊपर विश्वास करने वाले हार्वर्ड के प्रोफेसर एवी लोएब ने लिखा है, कि "कुछ महीनों के भीतर, मैं पहले इंटरस्टेलर उल्का के टुकड़े इकट्ठा करने के लिए एक अभियान का नेतृत्व करूंगा। यह उल्का सौर मंडल के बाहर मनुष्यों द्वारा खोजी गई पृथ्वी के नजदीक की पहली वस्तु है, जो प्रशांत महासागर में गिरी थी।" वह बताते हैं, कि ओउमुआमुआ की खोज के लगभग चार साल पहले, एक अन्य संदिग्ध इंटरस्टेलर वस्तु पृथ्वी के वायुमंडल में दुर्घटनाग्रस्त हो गई और धरती पर गिर गई थी। प्रोफेसर एवि ने लिखा है, कि "डेटा से पता चलता है, कि पृथ्वी के सबसे नीचले वातावरण में आने के बाद भी वो ध्वस्त नहीं हुआ था, जहां इसके ऊपर काफी ज्यादा वातावरण का दाब था, लिहाजा ये काफी रहस्यमयी वस्तु है। क्योंकि धरती के वातावरण में आने के बाद कोई भी वस्तु जल जाती है। लिहाजा, वो जो भी वस्तु है, वो अत्यधिक कठोर हो सकता है, शायद वो धरती पर मौजूद लोहे से काफी ज्यादा शक्तिशाली हो। लिहाजा, सवाल ये है, कि क्या वो वस्तु किसी अज्ञात स्रोत से भेजा गया था और क्या उस वस्तु को बनाया गया था?" उन्होंने कहा, कि "शायद यह स्टेनलेस स्टील से बना हो सकता है, या फिर और किसी अन्य सभ्यता की तरफ से भेजा गया एक अंतरिक्ष यान हो सकता है।"

उल्कापिंड इंटरस्टेलर मूल का है?
रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ डेटा जो मिले हैं, उससे पता चलता है, कि प्रशांत महासागर में जो उल्कापिंड गिरा था, वो वस्तु इंटरस्टेलर मूल का है, लेकिन फिलहाल इसकी पुष्टि करना संभव नहीं है, जबतक की उस वस्तु का परीक्षण प्रयोगशाला में नहीं किया जाए। प्रोफेसर लोएब ने कहा कि, 'सरकारी सेंसर से जो जानकारियां मिली हैं, उसका इस्तेमाल फिलहाल राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए किया जा रहा है, जो हमारे मिसाइल रक्षा प्रणाली का हिस्सा है।' प्रोफेसर लोएब और उनके छात्रों ने कई उल्कापिंडों का अध्ययन किया है और ये जानने की कोशिश की है, कि क्या उनका संबंध किसी और ग्रह पर रहने वाले किसी जीव से हो सकता है? प्रोफेसर और उनकी टीम इस बात का पता लगा रही है, कि क्या सौर मंडल के बाहर से कोई उल्कापिंड पृथ्वी पर आ सकता है?
क्या बाहरी ग्रह से भेजा गया था वो वस्तु
प्रोफेसर लोएब ने समझाते हुए कहा कि, "मुझे कैटलॉग मिला है, कि सरकार ने उल्कापिंडों के बारे में जानकारियां जुटाई है, जो सरकारी सेंसर द्वारा पता लगाया गया है, जो हमारी मिसाइल चेतावनी प्रणाली का हिस्सा है। मैंने अपने छात्र से यह जांचने के लिए कहा, कि क्या कोई उल्का, जिसकी रफ्तार काफी ज्यादा है, वो क्या सौर मंडल के बाहर से पृथ्वी पर आ सकता है? प्रोफेसर लोएब के एक छात्र अमीर सिराज लगातार इस दिशा में काम कर रहे हैं और प्रोफेसर लोएब और छात्र सिराज ने उल्का पिंड की रफ्तार और उससे जले कुछ वस्तुओं की जांच करने के बाद पाया है कि जो उल्कापिंड प्रशांत महासागर में गिरा है, वो जिस भी चीज से बना है, वो यकीनन लोहे से भी ज्यादा सख्त होना चाहिए। वैज्ञानिक लोएब ने कहा कि, "और इसलिए इसकी संरचना के मामले में यह एक बाहरी ग्रह से आया लगता है। यह सौर मंडल के बाहर अपनी गति के मामले में भी एक बाहरी ग्रह का लगता था।

क्या गुप्त रखी गई हैं जानकारियां?
वैज्ञानिक लोएब के मुताबिक, राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के कारण सरकार ने इस उल्कापिंड को लेकर ज्यादातर जानकारियों को गुप्त रखा है और बहुत सीमत जानकारी ही साझा की गई है, मगर उसके बाद भी उन्होंने कुछ ज़बरदस्त खोज की थी। उन्होंने अपने छात्र के साथ लिखे एक पेपर में इन बातों का जिक्र किया है, जो उन्हें सच लगता है। प्रोफेसर लोएब ने इन जानकारियों के बारे में तीन साल पहले ही अपने रिसर्च पेपर में लिखा था और अभी कुछ नये खुलासे भी उस उल्कापिंड को लेकर हुए हैं, जो प्रोफेसर के रिसर्च से काफी मिलता है। प्रोफेसर लोएब के रिसर्च पेपर के तीन सालों के बाद अमेरिकी रक्षा विभाग के यूएस स्पेस कमांड सेंटर की तरफ से एक पत्र जारी किया गया था, जिसमें कहा गया था, कि अभी तक जो भी जानकारी मिली है, उससे स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है, कि 99.99 प्रतिशत संभावना है, कि ये उल्कापिंड पृथ्वी के बाहर के सौर मंडल से आया है। जिसका मतलब ये हुआ, कि प्रोफेसर लोएब के दावे सच साबित हुए हैं।
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समुद्र से निकाला जाएगा उल्कापिंड
अपने रिसर्च के सच साबित होने के बाद अब प्रोफेसर लोएब प्रशांत महासागर की अनंत गहराई से उस उल्कापिंड को बाहर निकालना चाहते हैं, जिससे अमूल्य जानकारियां हमारे हाथ लग सकती हैं। हालांकि, प्रशांत महासागर में साल 2017 में क्रैश हो चुके किसी उल्कापिंड को खोजने का काम असंभव सरीखा है, लेकिन प्रोफेसर लोएब का मानना है, कि ये उल्कापिंड समुद्र के तल में पेनीज के आकार के हो सकते हैं और उसे चुंबक के सहारे निकाला जा सकता है। प्रोफेसर लोएब अब इस योजना पर काम कर रहे हैं, कि जहाज के जरिए किसी विशाल चुंबक को प्रशांत महासागर में गिराया जाएगा और फिर उस उल्कापिंड को बाहर खींचा जाएगा। प्रोफेसर लोएब को भरोसा है, कि वे जो खोज रहे हैं उसे वापस पा लेंगे। उन्होंने कहा कि, "यह एक मछली पकड़ने का अभियान जैसा है, और हम जो कर सकते हैं वह मूल रूप से इस उल्का के प्रक्षेपवक्र को ले सकता है और इसे समुद्र की सतह तक फैला सकता है।"
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