Pakistan: जुल्फिकार फिर हुए “जिंदा”
Pakistan: पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को मरे हुए लगभग 44 साल हो गए, पर अचानक वह चर्चाओं में फिर से जिंदा हो गए हैं।
पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने 6 फरवरी को यह निर्णय सुनाया है कि 1979 में भुट्टों को मौत की सजा सुनने वाली पाकिस्तान की अदालतों ने उनके प्रति निष्पक्ष सुनवाई और उचित प्रक्रिया नहीं अपनाई। पहले लाहौर हाई कोर्ट और फिर पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने जुल्फिकार अली भुट्टो के केस की सुनवाई की थी।

पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश (सीजेपी) काजी फ़ैज़ ईसा की अध्यक्षता में, नौ-न्यायाधीशों की एक पीठ ने लंबे समय से लंबित प्रेसीडेंशियल रेफरेंस पर अपनी राय दी है। पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की ओर से अप्रैल 2011 में यह रेफरेंस दायर किया गया था। जरदारी फिर से राष्ट्रपति चुनाव की रेस में हैं और इस बात की पूरी संभावना है कि वह पाकिस्तान के अगले सदर भी बन जाएं।
सीजेपी ईसा ने पीठ की राय पढ़ते हुए कहा- "लाहौर उच्च न्यायालय द्वारा मुकदमे की कार्यवाही और पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपील की कार्यवाही निष्पक्ष सुनवाई के मौलिक अधिकार और अनुच्छेदों में निहित उचित प्रक्रिया की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती है।"
उन्होंने यह भी कहा कि हमारे न्यायिक इतिहास में कुछ ऐसे मामले हुए हैं, जिनसे यह आम धारणा बन गई है कि डर या पक्षपात के कारण कानून के अनुसार न्याय देने के कर्तव्य का पालन नहीं किया जाता। जस्टिस ईसा ने कहा- "जब तक हम अपनी पिछली गलतियों को स्वीकार नहीं करते, तब तक हम खुद को सुधार नहीं सकते और सही दिशा में प्रगति नहीं कर सकते।"
जनरल जिया ने तख्ता पलट कर भुट्टो को किया था अपदस्थ
सैन्य तानाशाह जनरल जियाउल हक के शासन में जुल्फिकार अली भुट्टो पर मुकदमे चले थे और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी। दिवंगत भुट्टो के नाती और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो-जरदारी ने सुप्रीम कोर्ट की इस राय को ऐतिहासिक बताया।
उन्होंने कहा कि 44 साल बाद, सुप्रीम कोर्ट की इस राय से पाकिस्तान की न्यायिक व्यवस्था को सही रास्ते पर लाने की अब उम्मीद की जा सकती है। भुट्टो को फांसी देने के गलत फैसले के दाग ने पाकिस्तान के लोगों का अदालत से भरोसा खत्म कर दिया था। यह धारणा बन गई थी कि जब एक प्रधानमंत्री को न्याय नहीं मिला, तो आम लोगों को न्याय कहां मिलेगा।
कैसे हुई थी भुट्टो को फांसी
4 अप्रैल, 1979 को प्रातः ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को रावलपिंडी जिला जेल में फांसी दे दी गई थी। उनकी मौत की खबर पर पाकिस्तान के सैन्य शासक जनरल मुहम्मद जिया उल-हक ने खुशी जताई थी। भुट्टो की मृत्यु से कुछ घंटे पहले उनकी बेटी बेनज़ीर ने उनसे मुलाकात की थी।
जुल्फिकार अली भुट्टो को 1971 में पाकिस्तान के विभाजन और भारत से युद्ध हारने का दोषी माना जाने लगा। हालांकि भुट्टो अगस्त 1973 में पाकिस्तान के फिर प्रधान मंत्री चुने गए थे, लेकिन उनका यह कार्यकाल काफी अशांत रहा और अंततः भुट्टो को सत्ता से बेदखल कर सेना प्रमुख जनरल जिया-उल हक ने जुलाई 1977 सत्ता पर कब्जा कर लिया।
उसके दो महीने बाद ही भुट्टो को एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की हत्या के पीछे मास्टरमाइंड होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। उनपर चलाया गया मुकदमा उस समय भी काफी विवादास्पद रहा। परंतु उन्हें दोषी करार दिया गया और मार्च 1978 में मौत की सजा सुना दी गई।
भुट्टो के परिवार और उनके करीबी लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की, जिसपर सात सदस्यीय पीठ ने सुनवाई की। फरवरी 1979 में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 4-3 के मत से अपील खारिज कर दी और दो महीने बाद रावलपिंडी में भुट्टो को फांसी दे दी गई। तभी से कानूनी विशेषज्ञ लाहौर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर सवाल उठा रहे थे। मार्शल लॉ के दबाव में सुनाए गए फैसले पर तमाम प्रक्रियात्मक खामियाँ बाद में उजागर भी हुईं। भुट्टो को मौत की सजा को पाकिस्तान के न्यायिक इतिहास में एक बड़ा धब्बा बताया गया।
सुप्रीम कोर्ट की राय इस समय क्यों
जून 2011 में तत्कालीन राष्ट्रपति और भुट्टो के दामाद आसिफ अली जरदारी ने सुप्रीम कोर्ट में रेफरेंस दायर किया था। तब से इस मामले की केवल छह सुनवाई हुई। 2102 में सुप्रीम कोर्ट की बेंच बदलने के बाद इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इसकी सुनवाई बंद हो गई।
अब जो राजनीतिक परिस्थितियां बनी हैं उसमें पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी एक प्रमुख ताकत बन कर उभरी है। मौजूदा सरकार कितने दिन चलेगी इसका उत्तर सिर्फ पीपीपी के पास ही है। पीपीपी शाहबाज शरीफ की सरकार को बाहर से समर्थन दे रही है। इसके अलावा जरदारी दुबारा राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं।
इसलिए पाकिस्तान के मीडिया में इस बात की चर्चा हो रही है कि शीर्ष न्यायाधीशों का पीपीपी के सुप्रीमो के प्रति व्यक्तिगत झुकाव है और वे इस राय को अतीत के पापों को दूर करने के रूप में पेश कर रहे हैं। पीपीपी पहले ही भुट्टो की फांसी को न्यायिक हत्या करार दे चुकी है। वैसे मुख्य न्यायाधीश काजी फैज ईसा पहले भी कई मौकों पर 1979 के फैसले की निंदा कर चुके हैं।
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