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तेजी से बढ़ रहे हैं Online Frauds, जानें साइबर क्रिमिनल कैसे चुराते हैं आपका डेटा

डिजिटल दुनिया में ऑनलाइन फ्रॉड यानी धोखाधड़ी के शिकार हो चुके लोगों की संख्या बढ़ रही है। ज्यादातर मामलों में यूजर्स अपनी असावधानी से इसके शिकार बनते है।

Online Frauds know how cyber criminals steal personal data from digital scam

Online Frauds: डिजिटल दुनिया में अपनी ऑनलाइन पहचान और निजी जानकारियां छिपाना बेहद मुश्किल हो गया है। साइबर अपराधी किसी न किसी तरीके से आपको ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार बना सकते हैं। भारतीय यूजर्स इन अपराधियों के लिए सॉफ्ट टारगेट हैं। हाल ही में लोकल सर्किल रिसर्च एजेंसी की एक रिपोर्ट सामने आई है, जिसके मुताबिक हर साल कम-से-कम 39 प्रतिशत भारतीयों के साथ ऑनलाइन धोखाधड़ी होती है। इन वित्तीय धोखाधड़ी की वजह से उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ता है। सरकार और संबंधित एजेंसियां उन्हें जागरूक कर रही हैं, लेकिन साइबर अपराधी भी नये-नये तरीकों से उन्हें शिकार बना लेते हैं।

स्मार्टफोन बना मुसीबत?

स्मार्टफोन यूजर्स हमेशा इन साइबर अपराधियों के निशाने पर रहते हैं। हालांकि, मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने वाली कंपनियां एंड्रॉयड और एप्पल स्मार्टफोन के लिए लगातार सिक्योरिटी अपडेट जारी करते हैं, जो यूजर को साइबर हमलों से बचाते हैं। एप्पल के डिवाइसेज एंड्रॉइड स्मार्टफोन के मुकाबले ज्यादा सिक्योर माने जाते हैं, लेकिन साइबर अपराधी इनमें भी सेंध लगाने से बाज नहीं आते हैं। हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें आईफोन के बड़े सिक्योरिटी रिस्क के बारे में आगाह किया गया था।

रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, साइबर अपराधियों ने एप्पल डिवाइसेज के लिए एक नया मेलवेयर (खतरनाक वायरस) तैयार किया है, जो सिस्टम में जाकर यूजर की निजी जानकारियां चुरा लेता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि साइबर अपराधी इस खतरनाक वायरस को लोकप्रिय इंस्टैंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर खुले आम बेच रहे हैं। टेलीग्राम के एक चैनल पर बेचे जाने वाले इस वायरस का नाम AMOS है। यह वायरस यूजर के सिस्टम से पासवर्ड, वॉलेट, जन्मतिथि, पता, ऑटो-फिल जानकारियां आदि आसानी से चुरा सकता है और यूजर को कानों-कान खबर भी नहीं लगेगी।

खुलेआम हो रही बिक्री

साइबर रिसर्च फर्म CRIL (Cyber Research and Intelligence Labs) ने इस खतरनाक वायरस का पता लगाया है। साइबर रिसर्चर्स ने बताया कि हैकर्स न सिर्फ इस वायरस को खुलेआम बेच रहे हैं, बल्कि समय-समय पर इसे अपग्रेड भी कर रहे हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाया जा सके। टेलीग्राम चैनल पर AMOS वायरस को 1000 डॉलर यानी लगभग ₹82,000 की कीमत में बेचा जा रहा है। हैकर्स द्वारा बनाया गया यह AMOS वायरस सिस्टम में .dmg फाइल को इंस्टॉल कर देता है और जानकारियां चुराने लगता है।

चुराते हैं निजी जानकारियां

साइबर अपराधियों ने इस वायरस के लेटेस्ट वर्जन को 25 अप्रैल को टेलीग्राम चैनल पर अपलोड किया है। चैनल पर इस वायरस के फीचर्स को हाईलाइट करके प्रमोट किया जा रहा है। साइबर विशेषज्ञों की मानें तो यह वायरस लैपटॉप, कम्प्यूटर या स्मार्टफोन से की-चेन, पासवर्ड, कम्प्लीट सिस्टम इंफॉर्मेशन, डॉक्यूमेंट फोल्डर्स, फाइल्स और पासवर्ड आदि की जानकारियां इकट्ठा करता रहता है। इसके अलावा यह वेब ब्राउजर से ऑटो-फिल, पासवर्ड, कूकीज, वॉलेट और क्रेडिट कार्ड आदि की जानकारी भी चुरा सकता है।

टेलीग्राम के अलावा साइबर क्रिमिनल्स यूजर्स की निजी जानकारियों को डार्क वेब पर बेचते हैं। डार्क वेब पर हर साल लाखों भारतीय यूजर्स के निजी डेटा बेचे जाते हैं, जिसे साइबर अपराधी हथियार बनाकर वित्तीय धोखाधड़ी या फ्रॉड को अंजाम देते हैं। यूजर्स के डिजिटल फुटप्रिंट के आधार पर उन्हें टारगेट किया जाता है। यूजर की छोटी से छोटी गलती भी लाखों का चूना लगा सकती है।

कम्युनिकेशन प्लेटफॉर्म के जरिए अपराध को अंजाम

साइबर अपराधी यूजर्स की निजी जानकारियां चुराने के लिए आम तौर पर कॉल्स और SMS के अलावा ई-मेल, इंस्टैंट मैसेजिंग जैसे कम्युनिकेशन माध्यम का इस्तेमाल करते हैं। यूजर्स को प्रमोशनल मैसेज और कॉल्स के जरिए झांसे में फंसाया जाता है। इसके बाद साइबर क्राइम को अंजाम दिया जाता है। इसके अलावा यूजर को गूगल या अन्य सर्च इंजन पर किए गए वेब सर्च के आधार पर टारगेट किया जाता है। यूजर गलती से कभी-कभी कोई गलत लिंक ओपन कर लेते हैं, जिसके जरिए यूजर के डिवाइस में वायरस पहुंच जाते हैं।

एक बार किसी डिवाइस में वायरस पहुंच जाता है, तो वो डेटा माइनिंग यानी निजी डेटा की चोरी करना शुरू कर देता है। डेटा चोरी करके उसे डिवाइस से रिमोट सर्वर के जरिए हैकर्स के पास भेजा जाता है। हैकर्स बाद में इन डेटा को डार्क वेब पर बेच देते हैं। यह तरीका लगातार चलता रहता है और आम यूजर्स को इसकी भनक तक नहीं लगती है।

भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) ने कुछ महीने पहले टेलीकॉम कंपनियों एयरटेल, वोडाफोन-आइडिया और रिलायंस जियो को फर्जी कॉल्स और मैसेज पर रोल लगाने के लिए AI बेस्ड फिल्टर लगाने का निर्देश किया है। कुछ टेलीकॉम कंपनियों ने इसकी टेस्टिंग भी शुरू कर दी है। प्राधिकरण का कहा है कि फर्जी कॉल्स और मैसेज के जरिए हर महीने करीब 1,000 से लेकर 1,500 करोड़ की धोखाधड़ी की जा रही है।

साइबर अपराध से बचने के तरीके

ज्यादातर साइबर अपराध के मामलों में यूजर्स की कॉमन गलती होती है। साइबर अपराधी यूजर्स को अपने झांसे में आसानी से फंसा लेते हैं और अपराध को अंजाम देते हैं। ज्यादातर यूजर्स के साथ फ्री प्रोडक्ट, पैकेज, प्रमोशन आदि का लालच देकर धोखाधड़ी की जाती है। फ्री के लालच में यूजर्स अपनी निजी जानकारियां यहां तक की वन टाइम पासवर्ड (OTP) और निजी डॉक्यूमेंट्स भी शेयर कर देते हैं।

● इस तरह के अपराध से बचने के लिए अपने स्मार्टफोन, लैपटॉप आदि को समय-समय पर अपडेट करते रहना चाहिए। ऐसा करने से डिवाइस से होने वाली डेटा चोरी को रोकने में मदद मिलती है।

● अपनी निजी जानकारियां जैसे कि बैंकिंग डिटेल्स, जन्म-तिथि, पासवर्ड आदि किसी के साथ शेयर नहीं करना चाहिए।

● किसी भी अंजान नंबर से आने वाले कॉल्स और मैसेज को इग्नोर करना चाहिए और ई-मेल या अन्य ऑनलाइन मैसेजिंग प्लेटफॉर्म से मिलने वाले लिंक पर क्लिक नहीं करना चाहिए।

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    ● भारतीय रिजर्व बैंक की गाइडलाइंस के मुताबिक, कभी भी अपने डॉक्यूमेंट्स किसी एजेंट के साथ शेयर नहीं करना चाहिए। इसके लिए OTP बेस्ड वेरिफिकेशन प्रक्रिया को पूरी करनी चाहिए।

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