और महात्मा गांधी को नहीं मिला नोबेल पुरस्कार...

नई दिल्ली। नोबेल पुरस्कार को दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में माना जाता है। इसका मिलना किसी के भी लिए बेहद प्रतिष्ठा की बात है और एक खास बात ये भी है कि इसे देकर वापस नहीं लिया जा सकता।

mahatma gandhi

क्योंकि नोबेल को वापस नहीं लिया जा सकता इसलिए इसको देने से पहले कमैटी गहन विचार-विमर्श करती है। जिससे पुरस्कार देने में कोई चूक ना हो जाए।

इस पुरस्कार के संस्थापक दुनिया के महानतम वैज्ञानिकों में शुमार अल्फर्ड नोबेल चाहते थे कि ये पुरस्कार उन्हीं को मिले जिन्होंने मानवता के लिए बड़ा काम किया हो।

अल्फर्ड भले ही इसको मानवता के लिए काम करने वालों के देना चाहते थे लेकिन ऐसा भी हुआ जब इस पुरस्कार को देने में चूक हुई। महात्मा गांधी को ये पुरस्कार ना देना चूक थी तो कुछ वैज्ञानिकों को इसका मिलना।

1.युद्ध में इस्तेमाल हुई नोबल विजेता की तकनीक

1918 में फ्रिट्ज हाबर को नाइट्रोजन और हाइड्रोडन से अमोनिया बनाने की खोज के लिए अवार्ड मिला। इसके इस्तेमाल से खेती करने वालों को दुनियाभर में फायदा मिला।

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नोबेल कमेटी ने ये नजरअंदाज कर दिया कि हाबर ने पहले विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी को उकसाने वाली भूमिका निभाई और 1915 में बेल्जियम पर किए गए क्लोरीन गैस हमले में उनकी अहम भूमिका थी।

2.जिसके लिए पुरस्कार मिला, वो खोज ही गलत साबित हुई

डेनमार्क के वैज्ञानिक जोहानस फिबिगर को 1926 में अवार्ड से नावाजा गया, उन्होंने चूहों को होने वाले कैंसर की वजह की खोज की। उन्होंने बताया कि कॉकरोट का लार्वा खाने की वजह से चूहों में कैंसर होता है और इसके लिए नोबेल मिला।

बाद में सामने आया कि चूहों में कैंसर की वजह विटामिन ए की कमी है ना कि जोहानस की बताई वजह।

3.पर्यावरण के लिए घातक साबित हुई डीडीटी

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1948 में स्विटजरलैंड के वैज्ञानिक पॉल मूलर को मेडिसन के क्षेत्र में काम करने के लिए नोबेल से नवाजा गया। उन्होंने डीडीटी के इस्तेमाल के जरिए बीमारियां फैलाने वाले मच्छर और मक्खियों को मारने की विधि इजाद की।

उन्होंने डीडीटी के जरिए खेती को भी कई नुकसान से बचाने का तरीका बताया।

1960 में पर्यावरणविदों ने पाया कि डीडीटी से पर्यावरण में जहर घुल रहा है और वन्य जीवों को भी भारी नुकसान हो रहा है। अमेरिका में डीडीटी 1972 में और 2001 में पूरे विश्व में प्रतिबंधित कर दी गई।

4.इलाज ने ले ली मरीजों की जान

पुर्तगाल के वैज्ञानिक एंटोनियो ईगास को 1949 में लॉबोटॉमी विधि ईजाद करने के लिए नोबेल मिला। ये एक ऐसी विधि थी जिसके जरिए दिमागी मरीजों का इलाज किया जाता था।

40 के दशक में ये विधि डॉक्टरों के बीच खासी मशहूर रही। ये विधि जिन मरीजों पर आजमाई गई, उनमें इसके खौफनाक साइडइफेक्ट्स देखने को मिले। जिन मरीजों पर ये इस्तेमाल किया गया, वो पागल होने लगे और बहुत की मौत भी हो गई।

गांधी को मिले सिर्फ पांच नोमिनेशन, पुरस्कार नहीं

ये तो नोबेल कमेटी के वो मामले हैं, जिनमें ईनाम गलत हाथों में गया लेकिन एक फैसला इसके उल्ट भी है। यानि के ईनाम उसको नहीं मिला जिसे मिलना चाहिए था। ये थे महात्मा गांधी।

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शांति के लिए नोबेल का ऐलान करने वाली कमेटी अमूमन अपनी गलती को कबूलती नहीं है लेकिन कमेटी ने माना कि महात्मा गांधी को शांति के लिए नोबेल ना देना एक चूक है।

अहिंसक आंदोलनों के अगुआ के तौर पर दुनिया में एक अहम जगह वाले महात्मा गांधी का नाम नोबेल के लिए पांच बार नोमिनेट हुआ लेकिन उन्हे ईनाम मिल नहीं।

नोबेल कमेटी ने गांधी जी को 1989 में याद किया। गांधी जी की मौत के 41 साल बाद नोबेल कमैटी के चैयरमैन ने दलाई लामा को शांति का नोबेल देते हुए इस महान नेता को श्रद्धांजलि दी।

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