नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी टॉप सीक्रेट फाइल में छुपा है कौन सा राज?
नई दिल्ली। जापान के रेंकोजी मंदिर में सुभाष चंद्र बोस की अस्थियां हैं। यह बात खुद पंडित जवाहरलाल नेहरू 1951 में कह गये हैं। ताज्जुब है कि आज तक उन अस्थियों को लाने की कोशिश नहीं हुई! सुभाष चंद्र बोस की मौत हुई या नहीं, इसके लिए चार-चार बार कमेटियों का गठन हुआ।
लेकिन अगर एक बार भी उन अस्थियों की डीएनए जांच करा ली गयी होती, तो 18 अगस्त 1945 को ताइवान में हुई विमान दुर्घटना में सुभाष चंद्र बोस मारे गये थे- यह बात साबित हो गयी होती। लोगों की जिज्ञासा आज भी यह जानने की बनी हुई है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतिम गति को किस रूप में, कब और कहां प्राप्त हुए
परिस्थितियों ने नहीं दिया नेताजी का साथ
भारत को आज़ादी 1947 में मिली और सुभाष चंद्र बोस उससे पहले ही सिंगापुर में भारत की निर्वासित सरकार बना चुके थे। चीन समेत 20 देशों ने उनकी सरकार को मान्यता भी दे दी थी। अंग्रेजी सरकार के खिलाफ धुरी राष्ट्रों से समर्थन हासिल कर नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेजों की नींद हराम कर दी थी।

नेताजी और उनके साथियों को नहीं मिला वांछित सम्मान
उस कथित और कुख्यात विमान दुर्घटना के दो साल बाद भारत आज़ाद हुआ। आज़ादी के बाद भी सुभाष चंद्र बोस से जुड़े स्वतंत्रता सेनानियों को वो सम्मान नहीं मिला, जिनके वे हकदार थे। वीरगति को प्राप्त आज़ाद हिन्द फौज के जांबाजों के प्रति नेहरू सरकार का रवैया उदासीनता का रहा। बाद में हुए खुलासों से पता चलता है कि बोस परिवार की जासूसी भी करायी गयी। खुद जवाहरलाल नेहरू की चिट्ठी भी सामने आ चुकी है जिसमें बोस परिवार के सदस्यों के जापान जाने के दौरान उनकी गतिविधियों को जानने की उनकी जिज्ञासा सामने आती है। नेहरू के टाइपिस्ट के हवाले से सुब्रह्मण्यम स्वामी ने दावा किया था कि सुभाष चंद्र बोस को सोवियत संघ में निर्वासित होकर बंदी का जीवन बिताना पड़ा था। हालांकि सुब्रहमण्यम स्वामी इस दावे से भी आगे जाकर दावा करते हैं कि स्टालिन ने उनकी हत्या करा दी।

नेताजी की विमान दुर्घटना में मौत की अमेरिका ने नहीं की पुष्टि
1978 में अमेरिकी विदेश विभाग ने भारत सरकार को यह जानकारी दी थी कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सुभाष चंद्र बोस विमान दुर्घटना में मारे गये थे, इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं। ताज्जुब इस बात का है कि इस तथ्य को दस्तावेज डिक्लासीफाइड किए जाने से पहले तक मुखर्जी कमीशन से भी छिपाए रखा गया। यह सूचना मोरारजी देसाई सरकार के समय भारत से साझा की गयी थी और खुद प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने संसद में नये तथ्यों का जिक्र करते हुए दावा किया था कि सुभाष चंद्र बोस विमान दुर्घटना में मारे गये थे, इसके प्रमाण नहीं है। मुखर्जी आयोग ने बार-बार उन तथ्यों को सामने लाने की सरकार से मांग की जिस आधार पर पीएम मोरारजी ने उक्त बातें कही थीं, लेकिन उन्हें यह तथ्य उपलब्ध नहीं कराए गये।

रूस में सरोजिनी नायडू का भतीजा थे नेताजी के दुभाषिए!
मुखर्जी आयोग के सामने जो बड़ा तथ्य सामने आया था, वह था सोवियत संघ में बतौर पत्रकार 1955-1991 तक सेवा दे चुके नरेंद्र नाथ सिन्दकर का हलफ़नामा। इसके मुताबिक सरोजिनी नायडू के भाई वीरेन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय के बेटे निखिल चट्टोपाध्याय से उनकी मुलाकात हुई थी। जब 1941 में पुलिस को चकमा देकर सुभाष भागे थे तब बर्लिन में निखिल सुभाष चंद्र बोस के लिए दुभाषिए का काम कर चुके थे। जब मॉस्को में जर्मन राजनयिक से सुभाष मिले थे तो उनके साथ निखिल के अलावा विताली मोरोज़ भी थीं। हलफ़नामे में सिन्दकर ने लिखा है कि एक नितान्त वैयक्तिक मुलाकात में निखिल दा ने उन्हें यह बताया था कि नेहरू की वजह से ही सुभाष चंद्र बोस निर्वासित होना पड़ा था। सुभाष को डर था कि नेहरू उन्हें युद्ध अपराधी घोषित करवा देंगे।

मेनन और नेहरू के कहने पर रूस ने छिपायी बात!
हलफ़नामे में पत्रकार सिन्दकर ने दावा किया है कि मंचूरिया होते हुए बोस जब रूस पहुंचे, तो सोवियत नेतृत्व ने ब्रिटेन में भारतीय राजदूत कृष्णा मेनन से रूसी दूतावास के जरिए सम्पर्क किया। मेनन ने पेरिस में रूसी विदेश मंत्री मोल्तोव से मुलाकात की जिस बारे में मीडिया में खबर भी प्रकाशित हुई थी। तब मेनन ने बातचीत का ब्योरा सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया था। उस समय 1946 में भारत के अंतरिम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे। हलफनामे में दावा किया गया है कि मेनन ने नेहरू की आवाज़ बुलन्द की और सोवियत सरकार को नेताजी के जिन्दा होने की सूचना में सार्वजनिक नहीं करने के लिए राजी किया। नेहरू के सोवियत समर्थक होने का तर्क उन्होंने भुनाया।

विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी नेताजी की मौत- मुखर्जी आयोग
मुखर्जी आयोग के लिए यह हलफ़नामा बड़ी उपलब्धि थी। हर तरह की छानबीन के बाद मुखर्जी आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी।

आखिर कौन-सा राज खोलना नहीं चाहते राजनाथ!
केन्द्र में उस बीजेपी की सरकार है जो हमेशा से सुभाष चंद्र बोस से जुड़े तथ्यों को सार्वजनिक करने की मांग करती रही थी। लेकिन, ताज्जुब ये है कि नेताजी से जुड़े चार टॉप सीक्रेट फाइल अब भी केंद्र सरकार सार्वजनिक नहीं कर रही है। यह तर्क दे रही है कि इससे कई देशों से संबंध खराब हो जाएंगे। खुद गृहमंत्री के तौर पर राजनाथ सिंह ऐसा कह रहे हैं!

टॉप सीक्रेट फाइलों में छिपा है असली सीक्रेट !
नेताजी के बारे में एक से बढ़कर एक कहानियां सामने आती रही हैं। पठान का वेष धारण कर अफगानिस्तान पहुंचना, इतालवी कारोबारी बनकर रूस की यात्रा, हिन्द महासागर के बीचो बीच जर्मन पनडुब्बी से जापानी पनडुब्बी में आ जाना जैसे किस्से मशहूर हैं। अगर यह सब सच है तो विमान दुर्घटना में उनके मरने की बात गलत है। फिर तो यह भी मानना पड़ेगा कि 1985 में जिस गुमनामी बाबा की मौत बनारस में हुई थी, वे सुभाष चंद्र बोस ही थे। काश! सरकार उन तथ्यों को भी सार्वजनिक कर पाती जिन्हें टॉप सीक्रेट कहा जा रहा है।
बर्मा में संघर्ष करते हुए अंग्रेजों को परास्त कर दिया था। इतना ही नहीं, उन्होंने 'दिल्ली चलो' का नारा भी दिया था। मगर, द्वितीय विश्वयुद्ध में धुरी राष्ट्रों की पराजय ने मानो नेताजी के संघर्ष पर भी ग्रहण लगा दिया। बर्मा में हार मिली और 18 अगस्त 1945 को हवाई दुर्घटना में उनकी मौत की कहानी सामने आयी।
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