Navratri 2022: क्यों मां दुर्गा की प्रतिमा के लिए जरूरी है बदनाम घरों के आंगन की मिट्टी?
नई दिल्ली, 28 सितंबर। शारदीय नवरात्र सोमवार से प्रारंभ हो चुके हैं। इन नौ दिनों में मां के नौ रूपों की पूजा की जाती है। मां का हर रूप शक्ति का पर्याय है लेकिन मां की पूजा का वर्णन तब तक अधूरा है जब तक बंगाल की दुर्गापूजा का जिक्र ना हो। यहां की पूजा तो विश्वप्रसिद्ध है। लोग दूर-दूर से यहां की पूजा में सम्मलित होने के लिए आते हैं।

बदनाम घरों के आंगन की मिट्टी...
शारदीय नवरात्रि में कई जगहों पर मां की मूर्तियां सजाई जाती हैं, लोग इसके लिए साल भर से तैयारी करते हैं। माना जाता है कि मां दुर्गा की प्रतिमा तब तक अधूरी है, जब तक उसमें बदनाम घरों के आंगन की मिट्टी ना मिले और इसी वजह से प्रतिमा बनाने के लिए मूर्तिकार रेड लाईट एरिया यानी कि कोठों पर भी जाते हैं। इस प्रथा को मशहूर फिल्म मेकर संजय लीला भंसाली ने अपनी सुपरहिट फिल्म 'देवदास' में बखूबी दिखाया भी था।

सवाल उठता है कि क्या ऐसा सही में होता है?
लेकिन अब सवाल उठता है कि क्या ऐसा सही में होता है? आखिर जिस जगह की महिलाओं को शुद्ध या इज्जत की नजरों से नहीं देखा जाता है तो उनके घर की मिट्टी से मां की मूर्ति कैसे और क्यों बनाई जाती है? क्या है इसके पीछे का कारण?

एक वैश्या मां दुर्गा की बहुत बड़ी भक्त थी..
तो इसके पीछे एक रोचक कहानी है, कहा जाता है कि आदिकाल में एक वैश्या मां दुर्गा की बहुत बड़ी भक्त थी। वो दिन-रात मां की पूजा में लीन रहा करती थी। लोग उसे उपेक्षा और नफरत की दृष्टि से देखा करते थे, कुछ लोग उसे मंदिर में भी आने से रोकते थे।

मां दुर्गा ने दिया था बड़ा वरदान
लेकिन वो अपने सारे कष्टों को भूलकर मां की पूजा करती रहती थी, मां दुर्गा उसकी पूजा से बहुत खुश हुईं और उन्होंने उसे वरदान दिया कि 'आज के बाद समाज का हर व्यक्ति तुम्हें सम्मान की नजर से देखेगा और इसलिए उन्होंने आशीष दिया कि मेरी पूजा तब तक अधूरी है, जब तक मेरी मूर्ति में किसी तवायफ के घर के आंगन की माटी नहीं मिलेगी।' और तब से ही ये प्रथा बन गई।

'चोक्खू दान'
आपको बता दें कि बंगाल में नवरात्रि के एक हफ्ते पहले मां की मूर्ति तैयार हो जाती है और नवरात्र के पहले दिन उन्हें पंडाल में लाया जाता है लेकिन उनकी आंखों को महालया के दिन खोलते हैं, माना जाता है कि इस दिन ही मां पृथ्वी पर अवतरित होती हैं. इसे 'चोक्खू दान' कहा जाता है।

'सिंदूर खेला'
वैसे तो मां की पूजा पूरे नौ दिन पूरी भक्ति के साथ होती है लेकिन जिस दिन मां का विसर्जन होता है उससे पहले 'सिंदूर खेला' होता है, जो कि अपने आप में काफी विशिष्ठ और खास होता है। इस दिन महिलाएं खास तरह की सफेद-लाल साड़ी पहनकर पंडाल में पहुंचती हैं और सिंदूर और अबीर से खेलती हैं और उलू ध्वनी के साथ मां को विदा करती हैं। इस प्रथा को देखने के लिए लोग दूर-दूर से कोलाकाता के पंडालों में पहुंचते हैं।












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