Morarji Desai: प्रधानमंत्री बनना चाहते थे मोरारजी देसाई, इंदिरा गांधी से हुआ था कई बार टकराव
आज ही के दिन साल 1977 में पहली बार किसी गैर-कांग्रेस पार्टी की केंद्र में सरकार बहुमत के साथ बनी थी। सरकार के मुखिया थे मोरारजी देसाई, जो खुद एक पुराने कांग्रेसी थे।

Morarji Desai: 24 मार्च 1977 को देश में पहली बार गैर-कांग्रेस दलों की सरकार बनी थी। जिसके मुखिया यानी प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई बने। बता दें कि मोरारजी देसाई लंबे वक्त तक कांग्रेस के साथ रहे लेकिन जब इंदिरा गांधी से कुर्सी को लेकर उनका टकराव हुआ तो उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया। फिर उन्होंने जनता पार्टी का हाथ थामा और जो पद कांग्रेस में नहीं मिला वह उन्हें जनता पार्टी में मिल गया।
अब सवाल यह है कि आखिर मोरारजी देसाई जैसे पुराने खांटी कांग्रेसी को क्यों जनता पार्टी का दामन थामना पड़ा? कैसा था उनका इंदिरा गांधी के साथ रिश्ता? पंडित नेहरू क्यों उन्हें सबसे सख्त और खरा आदमी कहते थे। दरअसल, पीएम नेहरू के सचिव एम.ओ. मथाई के अनुसार पीएम नेहरू ने एकबार उनसे कहा था कि भारतीय राजनीति में जिन दो सबसे खरे लोगों से उनका वास्ता पड़ा, वो एक पुरुषोत्तमदास टंडन थे और दूसरे मोरारजी देसाई थे।
साल 1977 से 1979 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे मोरारजी देसाई के बारे में मशहूर था कि वह सख्त किस्म के गांधीवादी और हद तक ईमानदार थे। एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें दक्षिणपंथी यानी राइटिस्ट कहा जाने लगा तो उन्होंने इसका जवाब दिया कि "हां, मैं राइटिस्ट हूं क्योंकि आई बिलीव इन डुइंग थिंग्स राइट।"
नेहरू की अंत्येष्टि और मोरारजी का सपना टूटा!
इस किस्से की शुरुआत होती है साल 1964 से। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद प्रधानमंत्री का पद खाली हो गया था। तब मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार थे। इसलिए नेहरू की अंत्येष्टि के दिन ही उनके समर्थक कहने लगे थे कि प्रधानमंत्री पद उनकी जेब में है। मोरारजी देसाई की प्रधानमंत्री बनने की इस खुलेआम चाहत ने माहौल को उनके खिलाफ कर दिया और कांग्रेस के नेताओं ने मोरारजी की जगह लालबहादुर शास्त्री को भारत का अगला प्रधानमंत्री चुना।
इंदिरा गांधी और मोरारजी आ गये आमने-सामने
11 जनवरी 1966 को प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का निधन हो गया और एक बार फिर प्रधानमंत्री पद खाली हो गया। उस दौरान इंदिरा गांधी के पास सूचना व प्रसारण मंत्री का कार्यभार था। एक बार फिर से मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे लेकिन तब उन्हें इंदिरा गांधी का सामना करना पड़ा। मोरारजी देसाई खुलेआम कांग्रेस कार्यकर्ताओं के सामने इंदिरा गांधी को 'गूंगी गुड़िया' कहा करते थे।
तमाम गतिरोधों के बावजूद इंदिरा गांधी को कांग्रेस नेताओं का समर्थन मिला और एकबार फिर से मोरारजी का सपना टूट गया। हालांकि, इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनीं तो मोरारजी देसाई को उप-प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गयी। जल्द ही दोनों के बीच मतभेद सामने आने शुरू हो गये क्योंकि मोरारजी इस बात को लेकर कुंठित रहा करते थे कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता होने पर भी उनके बजाय अनुभवहीन इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया।
इंदिरा और मोरारजी देसाई कब-कब हुआ टकराव
साल 1967 में राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भी दोनों के बीच जबरदस्त टकराव देखने को मिला। इस मौके पर भी इंदिरा गांधी इक्कीस साबित हुई और अपने पसंदीदा उम्मीदवार जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति बनवाने में कामयाब रहीं। इसके बाद बैंकों के राष्ट्रीयकरण और राजाओं के प्रिवी पर्स खत्म करने के फैसले पर मोरारजी, इंदिरा के खिलाफ हो गये। इन मामलों में भी मोरारजी देसाई को हार का सामना करना पड़ा।
इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई के बार-बार अडंगा लगाने से परेशान हो चुकी थी। इसलिए 16 जुलाई 1969 को उन्होंने मोरारजी देसाई को वित्त मंत्री पद से हटा दिया। इसके बाद खुद मोरारजी देसाई ने पीएम इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर कहा कि वह अब उप-प्रधानमंत्री के पद पर भी नहीं रहना चाहेंगे।
दो भागों में बंट गई कांग्रेस
नवंबर 1969 आते-आते कांग्रेस पार्टी में गुटबाजी हावी हो गयी और आखिरकार यह दो भागों में बंट गयी। एक दल बना इंदिरा गांधी की अगुवाई वाला कांग्रेस-(I) और दूसरा कांग्रेस-(O) जिसमें मोरारजी देसाई शामिल थे। इसके बाद धीरे-धीरे करके कांग्रेस से उनका मोहभंग होता चला गया और कुछ सालों बाद मोरारजी देसाई ने कांग्रेस का दामन छोड़ दिया।
कोर्ट के चक्कर काटे इंदिरा गांधी ने
साल 1971 में भारत-पाक युद्ध में मिली जीत और बांग्लादेश के उदय ने इंदिरा गांधी की 'आयरन लेडी' की छवि और मजबूत कर दी थी। इसी साल लोकसभा चुनाव में रायबरेली से इंदिरा गांधी को समाजवादी नेता राजनारायण ने टक्कर दी। हालांकि, राजनारायण चुनाव हार गये। कुछ समय बाद राजनारायण ने चुनाव धांधली के सात आरोप लगाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका कर दी।
इस मामले में इंदिरा गांधी को खुद कोर्ट में हाजिर होना पड़ा। उन्हें सफाई देनी पड़ी और लगभग छह घंटों तक उनसे पूछताछ हुई। साल 1975 में इस मामले में फैसला आया और इंदिरा गांधी को दोषी करार दिया गया। कोर्ट ने फैसले में उनकी सदस्यता रद्द करने के साथ-साथ उनके चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी। तब अपनी कुर्सी को बचाने के लिए इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया।
आपातकाल के बाद बनी पहली गैर-कांग्रेसी सरकार
आपातकाल हटने के बाद मार्च 1977 में देश में फिर से लोकसभा के चुनाव हुए। इस चुनाव में जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला। मगर यहां भी प्रधानमंत्री पद के दो अन्य दावेदार - चौधरी चरण सिंह और जगजीवन राम मौजूद थे। इस बार जयप्रकाश नारायण ने किंग मेकर की भूमिका निभाई और मोरारजी देसाई का खुलकर समर्थन किया। आखिरकार एक लम्बे संघर्ष के बाद 24 मार्च 1977 को पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी और मोरारजी देसाई भारत के चौथे प्रधानमंत्री बने।
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