Nagaur Seat: नागौर, जहां से पंचायती राज लागू हुआ, क्या फिर बनेगा मिर्धा परिवार का गढ़?
Nagaur Seat:आपातकाल हटाने के बाद हुए 1977 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को जनता की भारी नाराजगी का सामना करना पड़ा था। पूरे उत्तर भारत से कांग्रेस का सफाया हो गया था और विपक्षी नेता जेल में बंद होने के बावजूद भारी मतों से विजयी हुए थे। लेकिन जनता की व्यापक नाराजगी के उस माहौल में भी किसान नेता नाथूराम मिर्धा ने नागौर की सीट कांग्रेस की झोली में डाल दी थी।
इससे पूरे देश में यह संदेश गया कि इंदिरा गांधी को भी उनकी सीट पर हराया जा सकता है लेकिन नागौर की सीट पर नाथूराम मिर्धा को हराना मुश्किल है। कई बार कांग्रेस से, तो कई बार कांग्रेस से अलग होकर भी नाथूराम मिर्धा लोकसभा चुनाव जीतते रहे। हालांकि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति के माहौल में हुए 1984 के लोकसभा चुनाव में नाथूराम मिर्धा अपने ही भतीजे, और कांग्रेस के उम्मीदवार रामनिवास मिर्धा, के सामने लोकदल के उम्मीदवार के रूप में खड़े हो गए और उन्हें 48 हजार मतों से हार का सामना करना पड़ा।

नागौर जिले की एक और खास बात है। 2 अक्टूबर 1959 को देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राजस्थान के नागौर जिले से ही पंचायती राज व्यवस्था लागू की थी, ताकि देश की सबसे छोटी इकाई गाँव को आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक तौर पर मजबूत किया जा सके। तब से नागौर का राजनीतिक परिदृश्य ग्रामीण और कृषि केंद्रित ही रहा है।
इस बार लोकसभा चुनावों में नागौर संसदीय सीट पर बड़ी रोचक स्थिति है। गत चुनाव में जिस प्रत्याशी ने कांग्रेस से चुनाव लड़ा वह इस बार भाजपा के टिकट पर मैदान में है, और जिसने भाजपा के समर्थन से चुनाव लड़ा, वह इस बार कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी है। वर्तमान में भाजपा से ज्योति मिर्धा और कांग्रेस समर्थित इंडिया गठबंधन से आरएलपी के हनुमान बेनीवाल चुनावी मैदान में है और दोनों एक दूसरे पर जमकर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं।
नागौर में मिर्धा परिवार का दबदबा, 18 में से 9 बार जीते
मारवाड़ में आजादी के बाद से ही क्षेत्र की राजनीति कुछ परिवारों के इर्द-गिर्द रहती आई है। चाहे वह शेरगढ़ से खेत सिंह राठौड़ हो, लूणी से रामसिंह बिश्नोई, भोपालगढ़ से परसराम मदेरणा व ओसियां का भाटी परिवार। इसी कड़ी में नागौर का मिर्धा परिवार भी आता है। नागौर संसदीय क्षेत्र में अब तक हुए चुनावों में मिर्धा परिवार का दबदबा रहा है।
गत अठारह चुनावों में सबसे ज्यादा नौ बार मिर्धा परिवार के सदस्यों ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री नाथूराम मिर्धा ने सर्वाधिक छह बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। नागौर संसदीय क्षेत्र में अब तक हुए चुनाव में सर्वाधिक ग्यारह बार कांग्रेस ने जीत हासिल की है। जबकि भाजपा ने तीन बार, स्वतंत्र पार्टी ने दो बार, जनता दल और रालोपा ने एक-एक बार चुनाव जीता है।
1952 के पहले चुनाव में स्वतंत्र पार्टी के जीडी सोमानी, 1957 में कांग्रेस से मथुरादास माथुर, 1962 में कांग्रेस से एसके डे, 1967 में स्वतंत्र पार्टी से एनके सोमानी, 1971 व 1977 में कांग्रेस और 1980 में कांग्रेस यू से नाथूराम मिर्धा ने प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद 1984 में कांग्रेस के रामनिवास मिर्धा, 1989 व 1991 में जनता दल से नाथूराम मिर्धा, 1996 में कांग्रेस से नाथूराम मिर्धा चुने गए।
उनके निधन के बाद 1997 में हुए उपचुनाव में उनके पुत्र भानू प्रकाश मिर्धा ने भाजपा प्रत्याशी के रुप में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। यह मिर्धा परिवार की आठवीं जीत थी। 1998 और 1999 में कांग्रेस के रामरघुनाथ चौधरी ने जीत दर्ज की। 2004 में भाजपा के भंवर सिंह डांगावास, 2009 के कांग्रेस से ज्योति मिर्धा, 2014 में भाजपा के सीआर चौधरी तथा 2019 में भाजपा के समर्थन से आरएलपी के हनुमान बेनीवाल ने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।
पहले चार लोकसभा चुनावों में गैर जाट उम्मीदवारों को लोकसभा में भेजने वाले नागौर के मतदाताओं ने 1971 से लगातार जाट प्रत्याशियों को ही चुनाव जिताया है। पिछले कई चुनावों से दोनों प्रमुख पार्टियों या गठबंधनों के उम्मीदवार जाट ही होते हैं।
मुकाबला मिर्धा और बेनीवाल के बीच
राजस्थान के प्रथम चरण में 19 अप्रैल को होने वाले चुनाव में मिर्धा परिवार की सदस्य और नाथूराम मिर्धा की पोती और पूर्व कांग्रेस सांसद ज्योति मिर्धा इस बार भाजपा से चुनाव लड़ रही हैं। हालांकि ज्योति मिर्धा पिछले तीन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के टिकट पर मैदान में थी, जिनमें एक बार वह जीती और अगले दो चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
इस बार उनका मुकाबला पिछले लोकसभा चुनाव में उन्हें शिकस्त देने वाले राष्ट्रीय लोकतांत्रितक पार्टी (रालोपा) के संयोजक हनुमान बेनीवाल से है। कांग्रेस ने बेनीवाल के लिए यह सीट छोड़ दी है। इन दोनों के अलावा बहुजन समाज पार्टी के गजेन्द्र सिंह राठौड़, राष्ट्रीय जनशक्ति पार्टी (सेक्युलर) के हनुमान सिंह कालवी और अभिनव राजस्थान पार्टी के अशोक चौधरी के साथ ही चार निर्दलीयों सहित नौ उम्मीदवार मैदान में हैं। लेकिन मुख्य मुकाबला ज्योति मिर्धा और हनुमान बेनीवाल के बीच ही होता नजर आ रहा है।
नागौर लोकसभा की आठ विधानसभाओं में से चार पर कांग्रेस, दो पर भाजपा, एक पर निर्दलीय और एक पर आरएलपी का कब्जा है। जिसमें लाडनूं से कांग्रेस के मुकेश भाकर, डीडवाना से निर्दलीय यूनुस खान (भाजपा बागी), जायल (एससी) से कांग्रेस की मंजू बाघमार, नागौर से कांग्रेस के हरेंद्र मिर्धा, खिंवसर से आरएलपी के हनुमान बेनीवाल, मकराना से कांग्रेस के जाकिर हुसैन, परबतसर विधानसभा से कांग्रेस के रामनिवास गवरिया व नावां से भाजपा के विजय सिंह विधायक हैं। इस सीट का परिणाम तो 4 जून को आएगा, मगर यह परिणाम बेनीवाल की पार्टी और जाट समाज की राजनीति के भविष्य की दिशा भी तय करेंगे।
Jalore Seat: जालोर सीट पर अशोक गहलोत के पुत्र वैभव का राजनैतिक भविष्य दांव पर
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