Bhaugishail Jodhpur: मारवाड़ का महाकुंभ है भौगिशैल परिक्रमा, चार धाम यात्रा समान मिलता है पुण्य
हिंदू धर्म में किसी भी धार्मिक स्थल की परिक्रमा करने का अपना एक अलग विधान है। ऐसा माना जाता है कि इस प्रकार की परिक्रमा से सभी पाप और कष्ट दूर होते हैं और प्रभु का विशेष आशीर्वाद मिलता है।
अयोध्या की 24 कोसी, बृज के मथुरा-गोवर्धन की 21 और 84 कोस की तर्ज पर मारवाड़ के जोधपुर में भी भौगिशैल परिक्रमा का आयोजन किया जाता है। हर तीन साल बाद पुरुषोत्तम मास में होने वाली सात दिवसीय भौगिशैल परिक्रमा यात्रा का अपना अलग ही धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व है।

कहते है कि इस परिक्रमा में भाग लेने वाले को चार धाम की यात्रा का पुण्य मिलता है। जाने अनजाने में मन, वचन तथा कर्म से हुए पापों से मुक्ति मिलती है। यह यात्रा मोक्ष तथा मनोवांछित फल देने वाली है। पूरे एक सप्ताह तक 110 किमी के आस्था के सफर में जोधपुर शहर सहित मारवाड़ अंचल से तकरीबन एक लाख श्रद्धालु भाग लेते हैं। कोरोना के चलते 6 साल बाद हो रही परिक्रमा 28 जुलाई से 3 अगस्त तक आयोजित की जा रही है।
100 साल पहले शुरू हुई थी यात्रा
आज से लगभग 100 साल पहले हिंदू सेवा मंडल के 50 कार्यकर्ताओं के साथ इस परिक्रमा की शुरुआत की गई थी। तब से लेकर आज तक इसका संचालन हिंदू सेवा मंडल ही करता आया है। इस परिक्रमा का उल्लेख स्कंद पुराण में भी मिलता है। पहले लोग अपने सिर पर राशन की सामग्री लेकर परिक्रमा करते थे। मान्यता है कि अधिक मास में दान पुण्य और अपने शरीर को कष्ट देकर की गई तपस्या का फल मिलता है। इसमें जोधपुर और मारवाड़ के श्रद्धालु बड़ी संख्या में शिरकत करते हैं। वर्तमान यात्रा में हिंदू सेवा मंडल के 500 से अधिक पदाधिकारी व कार्यकर्ता और 50 से अधिक सामाजिक संगठन और 30 समितियां सहयोग करती हैं।
चारों दिशाओं में आध्यात्मिक स्थान, इसलिए नाम पड़ा भौगिशैल
दरअसल जोधपुर के आसपास पहाड़ियों में प्राचीन मन्दिरों तथा संतों की तपोस्थली के अनेक स्थानों का अपना आध्यात्मिक महत्व है। चारों दिशाओं में पहाड़ियों पर स्थित आध्यात्मिक महत्त्व के स्थलों की यात्रा होने से ही इसे भौगिशैल परिक्रमा कहा जाता है। इस यात्रा का प्रथम पड़ाव रातानाडा में होता है। यहां पहाड़ी पर स्थित भगवान गणेश के दर्शन के बाद दूसरे दिन तड़के चार बजे यह पैदल यात्रा आगे के लिए प्रस्थान करती है। उसके बाद चौपासनी, बड़ली, बैद्यनाथ, बेरीगंगा, मंडोर उद्यान के बाद मण्डलनाथ महादेव सहित अनेकानेक आध्यात्मिक महत्त्व के पावन स्थल आते हैं। जहां दर्शन कर यात्रीगण कष्टों से मुक्ति पाते हैं।
प्रथम पड़ाव गणेश मंदिर रातानाड़ा
जोधपुर शहर से 5 किमी की दूरी पर स्थित रातानाडा की पहाड़ी पर प्राचीन गणेश मंदिर है। यह मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है। पौराणिक कथा के अनुसार इसका अत्यन्त महात्म्य है। शहर में किसी भी घर में मांगलिक कार्य होने पर प्रथम निमंत्रण यहां विराजमान भगवान गणेश को दिया जाता है। यहां भगवान गणेश की मूर्ति के दर्शन मात्र से जीव की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। यहां की प्रतिमा की ऊंचाई 8 फीट और चौड़ाई 5 फुट है। भौगिशैल परिक्रमा के यात्रियों का प्रथम पड़ाव यहीं रहता है। यहां दर्शन के बाद ही आगे की यात्रा शुरू होती है। गणेश मंदिर के बाद यात्री विभिन्न मार्गों से होकर मसूरिया स्थित बाबा रामदेव के गुरु बालीनाथजी के समाधि स्थल पहुंचते हैं।
दूसरा पड़ाव मसूरिया बाबा रामदेव मन्दिर
लोक देवता बाबा रामदेव के गुरु बालीनाथजी का विश्व विख्यात मंदिर मसूरिया पहाड़ी पर स्थित है। परिक्रमा के दूसरे दिन यात्री यहां शीश नवाने पहुंचते है। यहां से प्रस्थान कर भौगीशैल परिक्रमा के यात्री चौपासनी पहुंच कर रात्रि विश्राम के लिए पड़ाव डालते हैं।
तीसरा चौपासनी में श्रीनाथजी का विशाल मंदिर
चौपासनी में श्रीनाथजी का विशाल मंदिर है। इसको श्यामबाबा का मंदिर भी कहा जाता है। श्याम मनोहर का मंदिर महाराजा सरदारसिंहजी के समय संवत् 1957 (1900 ई.) में बनवाया गया था। जब औरंगजेब ने मंदिरों को तोड़ने की आज्ञा जारी की तब गोवर्धन पर्वत पर स्थित श्रीनाथजी की मूर्ति को लेकर पुजारी दामोदर और उनके चाचा गोविन्द 1669 ई. में जोधपुर आए और चौपासनी में छह माह विश्राम किया। इसके बाद मेवाड़ महाराणा राजसिंह के आग्रह पर पुजारी श्रीनाथ की मूर्ति सीहाड़ लेकर पहुंचे और वहां मंदिर बनवाया तथा मूर्ति स्थापना की। यह स्थान आज नाथद्वारा के नाम से विश्व विख्यात है। यदि उस समय जोधपुर महाराजा जसवंत सिंह का असामायिक निधन नहीं होता तो श्रीनाथजी चौपासनी में विराजित होते। श्रीनाथजी के मूल विग्रह के चौपासनी से चले जाने के बाद दूसरी मूर्ति स्थापित की गई जिनकी वल्लभ सम्प्रदाय की परम्परानुसार आज भी सेवा पूजा होती है। परिक्रमा के यात्री यहां श्रीनाथजी के दर्शन कर रात भर भजन कीर्तन करते हैं। अगली सुबह बड़ली के लिए प्रस्थान करते हैं। यहां से अरना झरना के दर्शन कर बड़ली पहुंचते हैं। बड़ली में उनका रात्रि पड़ाव रहता है।
चौथा पड़ाव बड़ली भैरू का प्राचीन मन्दिर
जोधपुर से करीब पंद्रह किलोमीटर दूर जैसलमेर रोड़ पर बड़ली नामक गांव है। यहां पर तालाब किनारे भैरूं बाबा का अति प्राचीन मंदिर है। भौगिशैल परिक्रमा के यात्रियों के पड़ाव के कारण इस दिन यहां भारी मेला लगता है। यात्रीगण यहां भैरूनाथ के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। साथ ही यहां स्थित तालाब में स्नान कर कष्टों से मुक्ति पाते हैं। रात भर सत्संग कर यात्रीगण अगली सुबह प्राचीन वैधनाथ थाम के लिए निकल पड़ते है।
पांचवां पड़ाव प्राचीन वैधनाथ धाम
परिक्रमा के यात्री दुर्गम पहाड़ियों से होते हुए वैधनाथ पहुंचते है। यहां रात्रि विश्राम के साथ ही भजन कीर्तन करते वैधनाथ का गुणगान करते हैं। इस स्थान का भी आध्यात्मिक महत्त्व है। शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित पहाडियों में स्थित वैद्यनाथ महादेव मंदिर जोधपुर की स्थापना से 340 साल पूर्व का है।
छठा पड़ाव बैरी गंगा में 365 दिन बहती है प्राकृतिक जलधारा
वैद्यनाथ से तड़के प्रस्थान कर परिक्रमा के यात्री मंडोर स्थित बेरी गंगा पहुंचते हैं। यहां से बह रही प्राकृतिक जलधारा में स्नान कर यात्रीगण खुद को धन्य समझते है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका अस्तित्व पांच हजार वर्ष पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि यहां शिवलिंग और भैरु की मूर्ति सहित गंगा का अवतरण हुआ था। बाद में यह स्थान लोप हो जाने से सैंकड़ो सालों तक गुप्त रहा। पहाडियों से निकल रही प्राकृतिक जलधारा से बहुत सी मान्यताएं जुड़ी हैं। बेरी गंगा के प्रमुख मंदिर में स्थापित भैरु की मूर्ति से ही गंगा का प्रवाह निकलने की मान्यता है। कहा जाता है कि यहां का पानी कभी नहीं सूखता।
सातवां और अंतिम पड़ाव मंडोर में
बेरी गंगा में रात्रि विश्राम के बाद भौगिशैल परिक्रमा के यात्री मंडोर पहुंचते हैं। यहां नागादड़ी झील में स्नान कर देवदर्शन के लिए देवताओं की साल पहुंचते हैं। बाद में अजीत पोल, वीरों का दालान, मंदिर, बावड़ी, जनाना महल, एक थम्बा महल, नहर, झील व जोधपुर के विभिन्न महाराजाओं के स्मारकों का अवलोकन कर रात्रि विश्राम के लिए पड़ाव डालते हैं। परिक्रमा के अंतिम पड़ाव मंडोर के बाद परिक्रमा यात्री सातवें दिन सुबह संतोषी माता मंदिर, कागा तीर्थ शीतला माता मंदिर, शेखावतजी का तालाब हनुमान मंदिर, उम्मेद भवन होते हुए रातानाडा गणेश मंदिर में दर्शन करते हैं। उसके बाद शोभायात्रा के रूप में शहर के भीतरी भागों में स्थित कुंजबिहारी, गंगश्यामजी व घनश्यामजी मंदिर के दर्शन कर यात्रा का समापन होता है।
यह रहेगा परिक्रमा का मार्ग
28 जुलाई भौगीशेल परिक्रमा की शुरूआत हिंदू सेवा मंडल कार्यालय घंटाघर पर ध्वज पूजन के साथ प्रारंभ होगी। इसके बाद तीजां मां मंदिर, सोजती गेट पुलिस लाइन होते हुए रातानाडा भाटी चौराहा विनायकजी दर्शन होंगे। इसके बाद रात्रि विश्राम रातानाडा भाटी चौराहा पर किया जाएगा। 29 जुलाई सुबह 4 बजे से परिक्रमा ध्वज प्रस्थान होगा। यहां से रिक्तिया भैरूजी, 12 वी रोड़, राजेंद्र मार्ग होते हुए मसूरिया बाबा रामदेव मंदिर, पाल लिंक रोड़ जूना खेड़ापति हनुमान मंदिर, सैन बगेची होते हुए चौपासनी में रात्रि विश्राम होगा। 30 जुलाई चौपासनी से हथकरघा भवन, दंताल माता, श्रीजी बैठक, कच्छवाहा चैराहा से पहाड़ी मार्ग होते हुए अरना झरना, भदरेसिया, कदमकण्डी होते हुए पड़ाव बड़ली पहुंचेगा। यहां रात्रि विश्राम किया जाएगा। 31 जुलाई को बड़ली से परिक्रमा पड़ाव सोढ़ों की ढाणी, रूपावतों का बेरा, कुई बावड़ी, भूरी बेरी, बृहस्पति कुंड होते हुए बैद्यनाथ महादेव पहुचंकर विश्राम होगा।
एक अगस्त पांचवे दिन की यात्रा मंडलनाथ महादेव, कुंडली माता, बीएसएफ, जोगी तीर्थ, दईजर माता से पहाड़ी मार्ग होते हुए बेरी गंगा पहुंचेगी। यहां पड़ाव का विश्राम होगा। 2 अगस्त को बेरी गंगा से 6वें दिन की यात्रा की शुरुआत सुबह 5 बजे से होगी। यहां से निम्बली निम्बा तीर्थ, रेलवे स्टेशन मंडोर बालाजी मंदिर होते हुए पड़ाव का दिन विश्राम मंडोर उद्यान में होगा। शाम 5 बजे भुवनेशवरी माता के दर्शन कर रात्रि विश्राम कृषि मंडी में किया जाएगा। तीन अगस्त को अंतिम दिन पड़ाव सुबह 5 बजे संतोषी माता, कागा तीर्थ शीतला माता, शेखावत बालाजी के दर्शन कर उम्मेद भवन, रातानाडा गणेश मंदिर, पुलिस लाईन, सोजती गेट, कंदोई बाजार, कपड़ा बाजार, सराफा बाजार, जूनी मंडी गंगश्यामजी मंदिर दर्शन कर परिक्रमा ध्वज हिंदू सेवा मंडल कार्यालय घंटाघर पहुंचकर विसर्जन होगा।
कोरोना के चलते गत बार नहीं हुआ था आयोजन, इस बार जोरदार उत्साह
हर तीन साल बाद अधिक मास में होने वाली परिक्रमा गत बार कोरोना की वजह से नहीं हो पाई थी। परंपराओं के चलते सिर्फ प्रतीकात्मक परिक्रमा ही निकाली गई थी। हिंदू सेवा मंडल ने बताया कि इस बार परिक्रमा को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह है। यात्रियों के रहने खाने-पीने से लेकर उनके सामान को अगले परिक्रमा स्थल तक पहुंचाने की व्यवस्था मंडल की ओर से की जाएगी। इसके लिए चार ट्रक भी लगाए जाएंगे। जो यात्री पैदल नहीं चल सकते उनके लिए मिनी बसों की व्यवस्था की गई है। परिक्रमा में शामिल होने वाले श्रद्धालु प्राचीन जलकुंडों में स्नान कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं। परिक्रमा में जिला प्रशासन के अलावा स्वयंसेवी संस्थाओं, भामाशाहों, धार्मिक संगठनों का भी सहयोग रहता है।












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