Sharad Pawar: शरद पवार लड़ रहे हैं अंतिम लड़ाई, बचेगी इज्जत या होगी किरकिरी?

शरद पवार का राजनीतिक साम्राज्य इस समय बिखरा हुआ दिखाई दे रहा है। लेकिन लोग अब भी मानते हैं कि उनका राजनीतिक कौशल अभी मंद नहीं हुआ है। बढ़ती उम्र के बावजूद शरद पवार महाराष्ट्र में किसी को जिताने या हराने में सक्षम हो सकते हैं।

विपरीत परिस्थितियों से जूझना उन्हें खूब आता है। वह सत्तर के दशक से ही एक मंजे हुए राजनीतिज्ञ की भूमिका में हैं। वह अपनी आस्तीन से कभी भी एक नया इक्का निकाल सकते हैं।

Sharad Pawa

उम्र के इस पड़ाव में कितने असरदार पवार

शरद पवार के लिए अभी भी महाराष्ट्र के किसी भी निर्वाचन क्षेत्र से व्यक्तिगत एमपी का चुनाव जीतने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए, पर वर्तमान स्थिति में उनकी पार्टी है या गठबंधन है उसे उबार सकते हैं क्या? यह सबसे बड़ा सवाल है। शरद पवार अब 80 की उम्र पार कर चुके हैं। क्या अब भी वह बीजेपी और खास कर अपने भतीजे अजीत पवार के खिलाफ लड़ने की स्थिति में हैं क्या? भले ही शरद पवार महाराष्ट्र की राजनीति में एक महानायक रहे हैं, लेकिन क्या बदली परिस्थियों में भी अपना तिलिस्म बरकरार रख सकते हैं।

सुप्रिया सुले क्या बनेंगी पवार की कमजोरी

सुप्रिया सुले बारामती से चुनाव लड़ रही हैं। शरद पवार की बेटी के रूप में उनकी उम्मीदवारी पवार पर भी दवाब डाल रही है। यदि वह चुनाव हार जाती हैं तो महाराष्ट्र में शरद पवार के राजनीतिक करियर का अंत मान लिया जाएगा। यह उनके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी भी हो सकती है। शरद पवार खुद इस क्षेत्र से छह बार सांसद रहे हैं। बारामती के मतदाताओं के साथ पवार का अलग संबंध रहा है।

अजीत पवार अपने चाचा से राजनीतिक लड़ाई में कमजोर नहीं दिखना चाहते। उन्होंने भी बारामती लोकसभा सीट जीतने को ही अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है। वह अपनी पत्नी को इस सीट से चुनाव लड़वा रहे हैं। वह उपमुख्यमंत्री भी हैं और एनडीए में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए वह यह सीट हर हाल में जीतना चाहेंगे।

अपनी पार्टी में विभाजन से पहले शरद पवार यह दम भर रहे थे कि वह मोदी को गद्दी से उतार देंगे, लेकिन आज खुद उनकी ही पार्टी के नेताओं ने उन्हें किनारे लगा दिया है। लोग कहते हैं कि शरद पवार की सबसे बड़ी कमी पार्टी को एक जागीरदार की शैली में चलाने की थी। जो परिस्थतियों को भांपने के बजाय अपने परिवार के सदस्यों के हितों को साधने में लगे हुए थे।

उन्होंने इस बात को नज़रअंदाज कर दिया कि बेटी सुप्रिया सुले के अलावा उनके परिवार का कोई भी सदस्य अब उनके अधीन नहीं है। पवार ने भी परिवार के अन्य सदस्यों को बुलाकर सत्ता के बंटवारे पर कोई चर्चा नहीं की। पवार इसे आम चुनाव तक के लिए टालते रहना चाहते थे। नतीजा लोग पाला बदल कर चले गए। क्या शरद पवार अब भी अपनी बची पार्टी में नई जान आने की उम्मीद कर सकते हैं।

प्रधानमंत्री पद के आकांक्षी शरद पवार प्रतीक्षारत ही क्यों रह गए

शरद पवार ने भी प्रधानमंत्री पद का सपना देखा था। वे तब से इस पद के आकांक्षी है जब इंदिरागांधी के खिलाफ काँग्रेस में फूट पड़ी थी। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने के अपने सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने 1970 के दशक के अंत में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस से नाता तोड़ लिया था।

1978 में शरद पवार मुख्यमंत्री बन गए थे लेकिन वह उस पद पर केवल 19 महीने तक ही रह सके। 1987 में राजीव गांधी के कहने पर कांग्रेस में लौटकर एक बार फिर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने और लगभग 3 वर्षों तक उस पद पर बने रहे। लेकिन जब 1991 में, राजीव गांधी की हत्या हो गई और शरद पवार को भारत के प्रधान मंत्री बनने का मौका मिला, तब पीवी नरसिम्हा राव का नाम आगे आ गया और शरद पवार को अपने सपने के घोड़े थामने पड़े। 1993 में वह एक बार फिर करीब 2 साल के लिए महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री बने।

1997 में, शरद पवार ने कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनने का एक और असफल प्रयास किया, लेकिन यहाँ भी वह चूक गए। उन्हें केवल 1 वर्ष की अवधि के लिए लोकसभा में विपक्ष के नेता बनने का अवसर मिला।

सोनिया गांधी के बहाने कांग्रेस से किया किनारा

1999 में शरद पवार और पी ए संगमा ने विदेशी मूल का हवाला देते हुए सोनिया गांधी के नेतृत्व का विरोध किया और पवार ने अपनी नई पार्टी एनसीपी का गठन कर लिया। हालाँकि, जल्दी ही उन्हें महाराष्ट्र में शिवसेना बीजेपी गठबंधन को सत्ता से बाहर रखने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन करना पड़ा।

फिर 2004 में एनडीए को केंद्र की सत्ता से बेदखल करने के लिए उन्हीं सोनिया गांधी के नेतृत्व में काम करना स्वीकार कर लिया। तब से एनसीपी और कांग्रेस साथ साथ काम रही हैं। अब कम ही संभावना है कि पवार को भारत के प्रधानमंत्री बनने का कोई अवसर मिले। वह इस समय 84 वर्ष के हैं और उनका स्वास्थ्य शायद ही उन्हें किसी अतिरिक्त भागदौड़ की अनुमति दे।

कभी एनसीपी की राष्ट्रीय स्तर पर अच्छी उपस्थिति थी। इसके पास राष्ट्रीय पार्टी का तमगा भी था, लेकिन अब इसका प्रभाव क्षेत्र महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों तक सीमित रह गया है। भले ही एनसीपी इस समय इंडिया गठबंधन का हिस्सा है, लेकिन सोनिया कांग्रेस और शरद पवार के बीच विश्वास की अब भी कमी है। बहरहाल 2024 शरद पवार के लिए अभी नहीं तो कभी नहीं वाला वर्ष है।

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