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पप्पू के बागी होने का असर लालू की बेटी मीसा के चुनाव क्षेत्र में

Pappu Yadav: राजद प्रमुख लालू प्रसाद की बेटी मीसा भारती के चुनावी भविष्य पर पप्पू यादव के बागी होने का कुछ असर पड़ेगा क्या? यह सवाल इसलिए कि पूर्णिया में लालू और तेजस्वी के ना चाहने के बाद भी यादवों का वोट पप्पू यादव को पड़ा है और 20 बरस में बिहार में पहली बार ऐसा हुआ है कि यादव मतदाताओं ने खुलकर लालू परिवार के विरोधी हो चुके पप्पू यादव को अपना समर्थन दिया है।

पाटलीपुत्र से आरजेडी के निशान पर लड़ रही मीसा भारती के लिए यह खतरे का अलार्म है, क्योंकि उनके खिलाफ़ भी एक कद्दावर यादव नेता रामकृपाल यादव बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। लगभग 16 लाख पंजीकृत मतदाताओं में यादव वोटरों की संख्या 4 लाख से अधिक है। इसके बावजूद मीसा भारती पिछले दो चुनाव हार चुकी हैं। आरजेडी में ही यह सवाल उठाया जा रहा है कि मीसा को फिर यहाँ से टिकट क्यों दिया गया।

lok sabha chunav

कभी लालू के करीबी थे रामकृपाल

रामकृपाल यादव कभी लालू परिवार के वफादार रहे थे। उन्होंने लालू यादव का कई साल तक अनुसरण किया। लेकिन 2014 के चुनाव में वह बीजेपी के साथ हो लिए। वजह मीसा भारती ही बनीं। पाटलीपुत्र से रामकृपाल यादव टिकट चाहते थे लेकिन लालू परिवार ने उनको मना कर दिया और मीसा को टिकट दे दिया। रामकृपाल यादव के आत्मसम्मान को ठेस लगी और उन्होंने आरजेडी छोड़ कर भाजपा की शरण ली।

इस चुनाव में मीसा भारती हार गईं। पाटलीपुत्र के मतदाताओं ने 2019 में भी लालू परिवार की राजनीति को खारिज कर दिया था। बिहार का एक वर्ग आज भी मानता है कि लालू परिवार ने राज्य को लूटा है और उनके कारण ही गरीबी और पिछड़ेपन में बिहार डूब गया था। लालू यादव को कई भ्रष्टाचार के मामलों में भी जिम्मेदार ठहराया गया और उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

क्या यादव अब लालू से छिटक रहे हैं?

बिहार में पप्पू यादव या राम कृपाल यादव के उदाहरण बताते हैं कि अच्छी खासी संख्या में यादव मतदाता लालू यादव के राजद से दूर जा रहे हैं। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि लालू यादव पार्टी का पूरा नियंत्रण अपने बेटे तेजस्वी यादव को दे रहे हैं और वह अपनी पार्टी के सभी पुराने शक्ति केंद्रों को नष्ट कर रहे हैं। परिवार के सदस्य बिहार में किसी भी अन्य यादव नेतृत्व को बर्दाश्त नहीं कर रहे हैं।

1990 और 2000 के दशक के दौरान, राजद में जिला स्तर या मंडल स्तर के कई मजबूत नेता थे, जिन्हें अपने क्षेत्रों में खुली छूट थी। लेकिन अब लालू यादव केवल परिवार तक सीमित रह गए हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पूर्णिया है। लालू यादव ने अपने समय में पप्पू यादव को कभी भी बड़े पैमाने पर बिहार यादव नेता के रूप में उभरने नहीं दिया और अब उनकी कोशिश है कि पप्पू यादव तेजस्वी यादव के लिए चुनौती बनकर न उभरें।

इसलिए, लालू यादव ने कांग्रेस और गांधी परिवार को पूर्णिया सीट राजद को देने के लिए मजबूर किया। वही पप्पू यादव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़े हैं और ऐसा लग रहा है कि पूर्णिया के ज्यादातर यादव मतदाता लालू यादव को नहीं बल्कि पप्पू यादव को चुन चुके हैं। यह भी संभव है कि यादव बहुल पूर्णिया में राजद की उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहें।

दूसरा उदाहरण नवादा का है। स्थानीय कद्दावर राजद नेता राज बल्लभ यादव दो दशकों से अधिक समय से महत्वपूर्ण राजद नेता रहे। वह खुद 2014 में लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं और उनकी पत्नी 2019 में। वह 3 बार विधायक रहे हैं और अब जेल में हैं। पर उनकी पत्नी नवादा विधानसभा सीट से मौजूदा विधायक हैं और उनके भतीजे नवादा से एमएलसी हैं और उनके परिवार का एक अन्य सदस्य जिला परिषद का अध्यक्ष है। लेकिन इस बार नवादा से राज बल्‍लभ यादव के भाई बिनोद यादव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं और राजद के दो स्थानीय विधायकों ने बिनोद यादव का समर्थन कर दिया है। जाहिर है राज बल्लभ यादव पर से भी लालू की पकड़ ढीली पड़ चुकी है।

काँग्रेस में भी आंतरिक कलह

इधर आरजेडी के साथ गठबंधन बनाने वाली काँग्रेस में भी आंतरिक कलह है। बिहार कांग्रेस के दो सबसे लोकप्रिय नेता पप्पू यादव और कन्हैया कुमार को मौजूदा प्रदेश काँग्रेस अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह ने तिकड़म भिड़ा कर सुनिश्चित किया कि इन दोनों को उनकी मनपसंद सीटें न मिलें, क्योंकि उन्हें डर था कि ये दोनों नेता उन पर भारी न पड़ जाए। कहते हैं कि प्रियंका गांधी ने पप्पू यादव से वादा किया था कि उन्हें पूर्णिया सीट मिलेगी लेकिन लालू यादव से अखिलेश प्रसाद सिंह ने पैरवी करके सीट नहीं लेने दी। कांग्रेस ने आसानी से बेगुसराय सीट पर भी अपना दावा छोड़ दिया। अब बिहार में आम कांग्रेसी अनमने ढंग से चुनाव में भागीदारी कर रहे हैं।

तेजस्वी के भविष्य के लिए कुछ सीटों का बलिदान

लालू यादव की नजर 2025 के विधानसभा चुनाव पर है। वह अपने बेटे तेजस्वी यादव को बिहार में नंबर वन यादव नेता बनाने के लिए बेचैन हैं। इस चक्कर में लालू यादव लोकसभा की कुछ सीटें गंवाने के लिए भी तैयार हैं। उसमें मीसा भारती की भी सीट हो सकती है। पाटलिपुत्र लोक सभा क्षेत्र में कुल 16.5 लाख मतदाता हैं। जिनमें सबसे अधिक संख्या यादव मतदाताओं की है। यादव वोट 4 लाख से भी अधिक है। उसके बाद 1 लाख ब्राह्मण, 1.7 लाख कुर्मी, 80 हजार राजपूत 1.7 लाख कोइरी और 1.5 लाख मुस्लिम मतदाता भी हैं। यहाँ अच्छी संख्या में दलित मतदाता भी हैं।

पिछले तीन चुनावों से यादव मतदाता बटें हुए हैं। इस बार लालू परिवार को उम्मीद थी कि 10 साल की सांसदी कर चुके राम कृपाल से वोटर नाराज हो सकते हैं, लेकिन आरजेडी में ही बिहार के प्रमुख यादव नेताओं की अनदेखी और उनके प्रति असम्मान का बर्ताव मीसा भारती के लिए ही परेशानी के कारण बन सकते हैं।

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