Reservation Limit: नौकरियों में 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण की बढ़ती मांग, जानें कानूनी पक्ष
देश में सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में मिलने वाले जाति के आधार पर 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण को लेकर कई राज्य सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट को सुझाव भेजा है।

Reservation Limit: छत्तीसगढ़ सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए 58 प्रतिशत आरक्षण पर लगी गई रोक को हटा लिया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट इस मामले की एक बार फिर से जुलाई में सुनवाई करेगा।
साल 2012 में भाजपा की रमन सिंह सरकार ने सरकारी नौकरी में आबादी के हिसाब से 58 प्रतिशत आरक्षण की अधिसूचना जारी की थी। इसमें राज्य की अनुसूचित जनजाति को 32 प्रतिशत, अनुसूचित जाति को 12 प्रतिशत और ओबीसी को 14 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया था। यह दायरा संविधान द्वारा निर्धारित 50 प्रतिशत आरक्षण के दायरे से ज्यादा हो गया था, जिसे लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
एक दशक मामला चलने के बाद पिछले साल 19 फरवरी 2022 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी नौकरी और शैक्षणिक संस्थानों में मिलने वाले 58 प्रतिशत आरक्षण को असंवैधानिक करार दे दिया था। छत्तीसगढ़ सरकार और राज्य के कई आदिवासी संगठनों ने हाईकोर्ट के फैसले को चैलेंज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए 58 प्रतिशत आरक्षण को फिलहाल बरकरार रखने के लिए कहा है।
क्यों बढ़ाया गया आरक्षण?
2012 में राज्य की रमन सिंह सरकार ने राज्य के आदिवासियों को सरकारी संस्थानों में सीधे प्रवेश और नौकरी में ज्यादा अवसर दिए जाने को लेकर आरक्षण का दायरा बढ़ाने का फैसला किया था। हालांकि, मौजूदा भूपेश बघेल सरकार राज्य में 76 प्रतिशत आरक्षण लाने की तैयारी में है। इसे लेकर छत्तीसगढ़ विधानसभा में सर्वसम्मति से 76 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए संशोधन विधेयक भी पारित किया जा चुका है, लेकिन फिलहाल राज्यपाल से इस पर मंजूरी नहीं मिली है। राज्य में आरक्षण की स्थिति स्पष्ट नहीं होने की वजह से छत्तीसगढ़ के कई इंजीनियरिंग, मेडिकल कॉलेज समेत पॉलिटेक्निक की प्रवेश परीक्षाएं प्रभावित हो गई थीं। सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत मिलने से ये प्रवेश परीक्षाएं आयोजित की जा सकेंगी।
कई राज्य चाहते हैं 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण
2021 में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के मराठा समुदाय के आरक्षण मामले पर सुनवाई करते हुए सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की 50 प्रतिशत वाली सीमा में बदलाव को लेकर राज्य सरकारों से राय मांगी थी। इस समय देश के आधा दर्जन ऐसे राज्य हैं, जो 50 प्रतिशत आरक्षण के मौजूदा दायरे को बढ़ाना चाहते हैं, जिनमें महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, तामिलनाडु, झारखंड और कर्नाटक शामिल हैं। ये राज्य सरकारें अपना राजनीतिक और सामाजिक समीकरण मजबूत करने के लिए आरक्षण के दायरे को बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन 1992 में दिया गया सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला इनके आड़े आ जाता है।
इंदिरा साहनी मामले में ऐतिहासिक फैसला
साल 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, जिसमें जाति-आधारित आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत कर दी गई थी। इस फैसले के बाद से देश में जाति के आधार पर 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। बीते कई सालों में राजस्थान के गुर्जर, महाराष्ट्र के मराठा और गुजरात के पटेल समुदायों ने भी राज्य सरकारों से सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की मांग की है। साल 2019 में केन्द्र की मोदी सरकार ने सामान्य वर्ग को आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया था, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा जाति के आधार पर दिए गए 50 प्रतिशत आरक्षण से अलग था। इसके बाद आरक्षण की सीमा बढ़कर अब 60 प्रतिशत हो गई है।
राज्य सरकारों का पक्ष
2021 में कर्नाटक की बीएस येदियुरप्पा सरकार ने कैबिनेट बैठक करते हुए 50 प्रतिशत आरक्षण के दायरे को बढ़ाने का फैसला लिया था। कैबिनेट का मानना था कि मौजूदा परिवेश में सामाजिक परिदृश्य पूरी तरह से बदल गया है और पिछड़े वर्ग की आकांक्षाएं बढ़ गई हैं। कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण के दायरे को बढ़ाने के मामले पर अपनी राय भी रखी। फिलहाल कर्नाटक में अनुसूचित जातियों के लिए 15 प्रतिशत, एसटी के लिए 3 प्रतिशत और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 32 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है।
राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार भी 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण के पक्ष में कई बार आवाज उठा चुकी है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से 50 प्रतिशत की सीमा पर पुनर्विचार करने के लिए कहा है और उसे बढ़ाने की सिफारिश की है। दरअसल, पिछले एक दशक से राजस्थान का गुर्जर समुदाय अलग से आरक्षण की मांग कर रहा है।
तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है, जिसमें 30 प्रतिशत आरक्षण पिछड़ा वर्ग को मिल रहा है। वहीं, 20 प्रतिशत अति पिछड़ा वर्ग, 18 प्रतिशत एससी और 1 प्रतिशत एसटी वर्ग को यह आरक्षण दिया जा रहा है। 1992 के इंदिरा साहनी जजमेंट के आधार पर तमिलनाडु में मिलने वाले आरक्षण को कोर्ट में चुनौती दी गयी है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई चल रही है। झारखंड की हेमंत सोरन की सरकार ने भी 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण की मांग की है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष भी रखा है।
झारखंड का ओबीसी समुदाय कई वर्षों से 27 प्रतिशत आरक्षण की मांग कर रहा है, जबकि मौजूदा स्थिति में इसे 14 प्रतिशत का आरक्षण मिल रहा है। अगर, सुप्रीम कोर्ट राज्य सरकारों की राय पर जाति के हिसाब से आरक्षण को 50 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ाने पर राजी हो जाता है, तो कई राजनीतिक पार्टियों को अपना वोटबैंक बढ़ाने और चुनावी वादे पूरा करने का मौका मिल जाएगा। कई राज्यों में हर साल हो रहे विधानसभा चुनाव को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण वाले मामले में अपना फैसला नहीं दिया है। छत्तीसगढ़ वाले मामले में भी कोर्ट ने आरक्षण पर हाईकोर्ट द्वारा लगाए गई रोक को केवल हटाया है।
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