Nepal PM: ‘5000 मौतों’ की जिम्मेदारी लेते हैं प्रचंड, जानें माओवादी से नेपाल के प्रधानमंत्री बनने का सफर
एक माओवादी नेता, शिक्षक और विद्रोही रहे नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ अपनी पहली भारत यात्रा पर है।

नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' अपने अधिकारिक चार दिवसीय (31 मई से 3 जून) भारत दौरे पर दिल्ली पहुंच गये हैं। प्रचंड पिछले साल दिसंबर में नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे। इस भारत यात्रा से दोनों देशों के बीच पहले से ही प्रगाढ़ संबंधों में नयी गति आने की उम्मीद की जा रही है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने नेपाली समकक्ष पुष्प कमल दहल से भी मिलेंगे।
पुष्प कमल दहल तीसरी बार नेपाल के पीएम का पद संभाल रहे हैं। पहले वह एक माओवादी विद्रोही भी रहे है। प्रचंड के नेतृत्व में चले आंदोलन ने ही नेपाल में राजशाही को खत्म करने और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई थी।
बेहद गरीबी देखी है पुष्प कमल दहल ने
11 दिसंबर 1954 को प्रचंड का जन्म मध्य नेपाल के पहाड़ी कास्की जिले में एक गरीब किसान परिवार में हुआ था। स्कूली शिक्षा के दौरान ही कम्यूनिज्म को लेकर उनकी रूचि बढ़ गई थी। साल 1971 में वह अपनी पढ़ाई के लिए काठमांडू चले गये लेकिन पैसे की तंगी के चलते अपने गृहनगर चितवन वापस चले आये।
युवावस्था में घोर गरीबी देखकर दहल वामपंथी राजनीतिक दलों के प्रति आकर्षित हो रहे थे तो दूसरी तरफ पैसों की तंगी के खातिर 1972 से उन्होंने चितवन के शिव नगर के एक स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। इसी दौरान उन्होंने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी और साल 1975 में उन्होंने चितवन जिले के रामपुर में कृषि और पशु विज्ञान संस्थान से स्नातक किया। फिर 1976 से 1978 तक नवलपरासी के डंडा हायर सेकेंडरी स्कूल और गोरखा के भीमोडाया हायर सेकेंडरी स्कूल में शिक्षक भी रहे।
अफसर नहीं, बन गए एक विद्रोही नेता
स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रचंड ने सरकारी नौकरी पाने के लिए तैयारियां की और इसी दौरान उन्होंने जाजोरकोट स्थित एक अमेरिकी विकास एजेंसी (USAID) में काम किया। लेकिन, ज्यादा समय तक वहां नहीं टिके। इसके बाद साल 1981 में उन्होंने नेपाल की अंडरग्राउंड कम्युनिस्ट पार्टी (चौथा सम्मेलन) में शामिल हो गये। जल्दी ही उन्हें एक बड़े माओवादी नेता के तौर पर पहचान मिलने लगी और 1989 में नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (मशाल) के महासचिव बन गये। यह पार्टी बाद में नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) बन गयी।
इसी बीच पेरू की कम्युनिस्ट पार्टी - 'शाइनिंग पाथ' की क्रांति से प्रेरित होकर प्रचंड ने भी राजशाही के पूर्ण खात्मे और लोकतंत्र लाने के लिए विद्रोह अभियान का अंडरग्राउंड होकर नेतृत्व किया। वह साल 1996 से साल 2006 तक अंडरग्राउंड रहे। इस तरह उनकी पहचान एक बड़े माओवादी विद्रोही नेता के रुप में बनी रही।
खत्म की 237 साल पुरानी राजशाही
सीपीएन (माओवादी) ने 13 फरवरी 1996 को कई पुलिस स्टेशनों पर हमलों के साथ राजशाही को खत्म करने के लिए अपना विद्रोही अभियान शुरू किया। विद्रोह के 10 सालों के दौरान प्रचंड अंडरग्राउंड रहे और अनेक गुरिल्ला अभियानों के जरिये राजशाही तंत्र को चुनौती देते रहे। उनके इन्हीं अभियानों की बदौलत नेपाल में 237 साल पुरानी राजशाही को समाप्त कर दिया गया।
जून 2006 में प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला और विपक्षी नेताओं के साथ देश की नयी सरकार के निर्माण पर बातचीत करने के लिए एक बैठक में पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' ने अपनी सार्वजनिक उपस्थिति दी। उस वक्त उनकी लोकप्रियता नेपाल में बहुत ज्यादा बढ़ गयी थी। नवंबर 2006 में व्यापक शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इसके बाद सीपीएन (माओवादी) ने प्रचंड को नयी सरकार के प्रमुख के रूप में स्थापित करने के लिए काम किया। 28 मई 2008 को पहली संविधान सभा द्वारा राजशाही को समाप्त कर देश को एक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया। इसी साल लोकतांत्रिक देश के पहले प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' बने।
प्रचंड का भारत से समधी का रिश्ता
जब पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' ने फरवरी 1996 में सशस्त्र आंदोलन की घोषणा की, तब उन्हें अपनी बेटियों की चिंता सताने लगी। प्रचंड तीन बेटियों के पिता थे। सबसे बड़ी बेटी ज्ञानु, फिर रेणु और सबसे छोटी बेटी गंगा। ज्ञानु की शादी 1993 में 'जनयुद्ध' शुरू होने से तीन साल पहले हो गयी थी और दो बेटियां रेणु और गंगा तब बड़ी हो रही थी।
इसी बीच भारत में लखनऊ के लीला होटल में 9 फरवरी 1997 को प्रचंड ने दोनों बेटियों रेणु और गंगा की शादी भारतीय लड़कों से करवा दी।
बीबीसी को रेणु बताती हैं कि "तब मेरी उम्र सिर्फ 19 की थी। लोग लड़की देखने जाते हैं लेकिन मैं लड़का देखने जालंधर गयी थी। मेरा शादी का कोई मूड नहीं था तो जब मैंने पापा से कहा कि शादी नहीं करनी है। तब पापा ने जवाब दिया कि क्रांति के लिए लोग अपनी जान दे रहे हैं और तुम शादी भी नहीं कर सकती? तुम्हारी शादी क्रांति के लिए बहुत मायने रखती है। अब इसके बाद मैं निःशब्द हो गई।"
प्रचंड ने ली 5000 मौतों की जिम्मेदारी?
आपको बता दें कि नेपाल में माओवादियों का राजशाही के खिलाफ विद्रोह 13 फरवरी 1996 में शुरू हुआ था। यह विद्रोह 21 नवंबर 2006 को सरकार के साथ व्यापक शांति समझौता होने के बाद आधिकारिक तौर पर खत्म हो गया था। एक दशक के इस संघर्ष में कई हजार लोगों की मौत हो गई थी। एक दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद 15 जनवरी 2020 को प्रचंड ने काठमांडू में माघी महोत्सव के दौरान सार्वजनिक सभा में कहा कि मुझ पर 17,000 लोगों की हत्या का आरोप लगाया जाता है, जो सच नहीं है।
उन्होंने आगे कहा था कि अगर आप मुझ पर 5,000 मारे गये लोगों की जिम्मेदारी डालते हैं, तो यह मेरा नैतिक दायित्व है कि मैं उन मौतों की जिम्मेदारी लूं। प्रचंड ने कहा था कि वह इससे भाग नहीं सकते लेकिन जो उन्होंने नहीं किया उसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जाना चाहिए। उन्होंने 5,000 लोगों की मौत की जिम्मेदारी लेते हुए बाकी 12,000 मौतों की जिम्मेदारी सामंती सरकार को लेनी चाहिए।












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