Dawoodi Bohra: क्या है दाऊदी बोहरा समुदाय और उसकी सामाजिक बहिष्कार प्रथा?
मुस्लिम बोहरा समुदाय मुख्य रूप से दो मतों में विभाजित हैं। दाऊद बिन कुतुब शाह को मानने वालों को दाऊदी बोहरा और सुलेमान शाह को मानने वालों को सुलेमानी बोहरा कहा जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की पीठ ने दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित 'बहिष्कार प्रथा' को चुनौती देने वाली याचिका को सबरीमाला के फैसले की समीक्षा के लिए गठित नौ न्यायाधीशों वाली पीठ के पास भेजने का आदेश दिया है। यह पीठ इस मामले की समीक्षा करेगी कि इस प्रथा को संरक्षित रखा जाए या नहीं?
गौरतलब है कि अक्टूबर 2022 में जस्टिस संजय किशन कौल, संजीव खन्ना, ए.एस. ओक, विक्रम नाथ और जे.के. माहेश्वरी की खंडपीठ ने इस मामले को नौ न्यायाधीशों की खंडपीठ को भेजने के अपने फैसले को सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट ने कहा था कि वह इस बात पर विचार करेगी कि 1962 के आदेश द्वारा संरक्षित बहिष्कार की प्रथा जारी रह सकती है या नहीं। कोर्ट को यह भी बताया गया कि बॉम्बे प्रीवेंशन ऑफ एक्सकम्युनिकेशन एक्ट 1949 को निरस्त कर दिया गया है और महाराष्ट्र प्रोटेक्शन ऑफ पीपल फ्रॉम सोशल बॉयकाट (प्रिवेंशन, प्रोहिविशन एंड रेड्रेस्सल) एक्ट 2016 को लागू कर दिया गया है।
इस कानून की धारा 3 में किसी भी समुदाय के एक सदस्य का 16 प्रकार से सामाजिक बहिष्कार किए जाने का उल्लेख है और धारा 4 में कहा गया है कि सामाजिक बहिष्कार निषेध है और ऐसा करना दंडनीय अपराध है।
बहिष्कार प्रथा क्या है?
बोहरा समुदाय का एक सर्वोच्च धार्मिक नेता होता है, जिसे दाई अल-मुतलक सैयदना कहा जाता है। दाऊदी बोहरा समुदाय के लोग, वे चाहे दुनिया के किसी भी कोने में हों, उनके लिए अपने सर्वोच्च नेता के आदेशों का पालन करना जरूरी होता है। इनके आदेश को चुनौती नहीं दी जा सकती है। अगर समुदाय का कोई भी सदस्य अपने सर्वोच्च नेता के आदेश का पालन नहीं करता है, तो उसका बहिष्कार किया जाता है। ऐसे व्यक्ति को दाऊदी बोहरा समाज से जुड़ी मस्जिदों, कब्रिस्तानों, मदरसों तथा सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में शामिल होने की अनुमति नहीं होती है।
बहिष्कार प्रथा को कोर्ट में चुनौती
1949 में बॉम्बे प्रीवेंशन ऑफ एक्सकम्युनिकेशन एक्ट लाया गया था। यह कानून में विभिन्न समुदायों में चली आ रही कुप्रथाओं को रोकने का प्रावधान शामिल किया गया था। वास्तव में इस कानून को इसलिए लाया गया था, ताकि लोगों को उनके अधिकारों से वंचित न किया जाए। हालांकि, इसके खिलाफ कई समुदायों ने कोर्ट में अपील कर दी। दाऊदी बोहरा समुदाय के एक सदस्य ने 1949 में एक याचिका दायर की, जिसमें कहा गया कि यह कानून उनके सर्वोच्च नेता के आदेश के आड़े आता है।
सुप्रीम कोर्ट में मिली चुनौती
दाऊदी बोहरा समुदाय के 51वें प्रमुख सैयदना ताहिर सैफुद्दीन ने इस मामले को लेकर 1962 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। कोर्ट में तर्क दिया गया कि समाज में बहिष्कार का मामला धार्मिक मामलों से संबंधित नहीं है और इसे दंडनीय अपराध न बनाया जाए। सुप्रीम कोर्ट की 5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 1962 में फैसला सुनाया था कि बॉम्बे प्रीवेंशन ऑफ एक्सकम्युनिकेशन एक्ट 1949 संविधान के अनुरूप नहीं है। इस कानून को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म से जुड़े मौलिक अधिकारों का उल्लंघन भी बताया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि दाई अल-मुतलक का पद बोहरा समुदाय का एक अनिवार्य हिस्सा है और बहिष्कार प्रथा का लक्ष्य समुदाय के लोगों में धार्मिक अनुशासन लाना है, दंडित करना नहीं।
बाद में, 1986 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करके सरदार सैयदना ताहिर सैफुद्दीन बनाम बंबई राज्य के मामले में दिए गए फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया गया।
कौन हैं दाऊदी बोहरा?
दाऊदी बोहरा शिया मुसलमान हैं। इस समुदाय की वेबसाइट के अनुसार इसके 10 लाख से अधिक सदस्य विश्व के 40 देशों में फैले हुए हैं। आमतौर पर इन्हें शिक्षित, मेहनती, कारोबारी, समृद्ध और आधुनिक जीवन शैली वाला माना जाता हैं। इस समुदाय का प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्मगुरु के प्रति गहरी आस्था रखता है और उनके हर उचित-अनुचित निर्देशों का निष्ठापूर्वक पालन करने को बाध्य होता है।
सैयदना की ताकत
इस समुदाय का एक सर्वोच्च नेता होता है, जिसे 'अल-दाई अल-मुतलक सैयदना' कहा जाता है। इस समुदाय का धर्मगुरु पिछले लगभग 400 वर्षों से भारत से ही चुना जा रहा है। इस समुदाय के वर्तमान और 53वें धार्मिक प्रमुख सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन है। दूसरे धर्म के धर्मगुरुओं के मुकाबले सैयदना का अपने समुदाय में अलग ही रूतबा है। वे अपने समुदाय के एक तरह से शासक है। दाऊदी बोहरा समुदाय की विरासत फातिमी इमामों से जुड़ी हुई है, जिन्हें पैगम्बर हजरत मोहम्मद का वंशज माना जाता है।
बोहरा धर्मगुरु सैयदना की बनाई व्यवस्था के अनुसार, बोहरा समुदाय में हर धार्मिक, पारिवारिक और व्यावसायिक कार्य के लिए सैयदना की अनुमति जरूरी हैं और यह अनुमति लेने के लिए एक निश्चित शुल्क चुकाना होता है। इसके अलावा समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी वार्षिक कमाई का एक निश्चित हिस्सा दान के रूप में देना अनिवार्य होता है।
दाऊदी बोहरा समुदाय मुख्य रूप से इमामों के प्रति अपना अकीदा (श्रद्धा) रखता है। दाऊदी बोहराओं के 21वें और अंतिम इमाम तैयब अबुल कासिम थे। इसके बाद 1132 से आध्यात्मिक गुरुओं की परंपरा शुरू होती है, जिन्हें दाई अल-मुतलक सैयदना कहा जाता है। दाई अल-मुतलक का अर्थ सर्वोच्च सत्ता होता है और उनकी व्यवस्था में कोई भीतरी और बाहरी शक्ति दखल नहीं दे सकती।
सैयदना के दूत
देश-विदेश में जहां भी बोहरा समुदाय बसा हुआ है, वहां सैयदना की ओर से अपने दूत नियुक्त किए जाते हैं, जिन्हें आमिल कहा जाता है। यही लोग सैयदना के फरमान को अपने समुदाय के लोगों तक पहुंचाकर उस पर अमल भी करवाते है। स्थानीय स्तर से लेकर सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों पर भी इन आमिलों का ही नियंत्रण रहता हैं। एक निश्चित अवधि के बाद इन आमिलों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर तबादला भी होता रहता है।
बोहरा समुदाय का विभाजन
1588 में 30वें सैयदना की मृत्यु के बाद, उनके वंशज दाऊद बिन कुतुब शाह और सुलेमान शाह के बीच सैयदना की पदवी पर दावेदारी को लेकर विभाजन हो गया। इस विभाजन से दो समुदाय बने। दाऊद बिन कुतुब शाह को मानने वालों को दाऊदी बोहरा और सुलेमान को मानने वालों को सुलेमानी बोहरा कहा जाता है। सुलेमानी मत को मानने वालों को सुन्नी बोहरा कहा जाता है। वे हनफी इस्लामिक कानून को मानते है। जबकि दाऊदी बोहरा समुदाय इस्माइली शिया समुदाय का उप-समुदाय है और दाईम उल-इस्लाम को मानते हैं। सुलेमानी बोहरा का मुख्यालय यमन में और दाऊदी बोहरा समुदाय का मुख्यालय मुंबई में स्थित है।












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