Justice Chandrachud: भारत के नए मुख्य न्यायाधीश के वे कौन से निर्णय थे, जिन पर उठ चुका है विवाद?
जस्टिस चंद्रचूड़, अपने कैरियर में कई महत्वपूर्ण और विवादित मामलों से जुड़े रहे है। आईये जानते है ऐसे ही कुछ मामलों पर उन्होंने क्या कहा।
जस्टिस डॉ. धनंजय यशवंत चंद्रचूड़, भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) बन गए है। वे सबसे पहले 29 मार्च 2000 को बम्बई हाई कोर्ट में अतिरिक्त जज नियुक्त हुए थे। फिर, 31 अक्टूबर 2013 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद पर आसीन हुए। इसके बाद, 13 मई 2016 को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के जज बने।

जस्टिस चंद्रचूड के पिता, जस्टिस वाईवी चंद्रचूड भी सुप्रीम कोर्ट के 16वें मुख्य न्यायाधीश रह चुके है। वे लगभग सात साल और चार महीनों तक चीफ जस्टिस रहे थे, जो शीर्ष अदालत के इतिहास में किसी CJI का सबसे लंबा कार्यकाल रहा है। जस्टिस चंद्रचूड़, अपने कैरियर में कई महत्वपूर्ण और विवादित मामलों से जुड़े रहे है। आईये जानते है ऐसे ही कुछ मामलों पर उन्होंने क्या कहा।
नाथूराम गोडसे पर ड्रामा
साल 1998 में एक प्ले ड्रामा - 'मी नाथूराम गोडसे बोलते' पर पुलिस ने महाराष्ट्र में प्रतिबन्ध लगा दिया गया। नाटक के लेखक ने बॉम्बे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
साल 2001 में जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए न सिर्फ इस प्ले पर लगे प्रतिबन्ध को हटाया बल्कि कहा कि लोकतंत्र में सभी प्रकार के विचारों का सम्मान करना चाहिए, चाहे वे मुख्यधारा के हो अथवा उसके विरोध करने वालों के। उन्होंने सरकार को भी सलाह देते हुए कहा कि इस पुलिस कल्चर से बचना चाहिए और विपरीत विचारों को भी जगह देनी चाहिए।
न्यायपालिका में सुधार की वकालत
बात जनवरी 2009 की है, जब जस्टिस चंद्रचूड़ बॉम्बे उच्च न्यायालय में जज के तौर पर कार्यरत थे और मुंबई स्थित टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज (TISS) के एक कार्यक्रम में उन्हें मुख्य वक्ता के तौर पर बुलाया गया था। अपने भाषण में उन्होंने न्यायपालिका की तात्कालिक चुनौतियों पर विचार रखते हुए न्यायपालिका को यूजर फ्रेंडली (user friendly) बनाने के प्रयासों पर अधिक जोर दिया।
इस कार्यक्रम में किसी ने उनसे एक प्रश्न पूछा कि न्यायपालिका की अवमानना (Contempt of Court) पर उनके क्या विचार है? इसका जवाब जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह कहते हुए दिया कि अब यह बीती हुई बातें है और न्यायाधीशों को अपनी आलोचनाओं पर संकुचित विचार नहीं रखने चाहिए।
जस्टिस चंद्रचूड कई बार मीडिया में न्यायाधीशों की टिप्पणियों की गलत व्याख्या पर अपनी नाराजगी व्यक्त कर चुके है। वे न्यायालयों द्वारा सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग की पुरजोर वकालत करते रहे है।
निजता के अधिकार पर पिता के आदेश को पलट दिया
साल 2017 में निजता के अधिकार पर एक फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे मौलिक अधिकार बताया था। नौ जजों वाली सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से ये निर्णय लिया था। इस दौरान जिस एक जज की बहुत चर्चा हुई, वे जस्टिस चंद्रचूड़ थे। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की इस पीठ का वे भी हिस्सा थे और उन्होंने 41 साल पहले अपने पिता जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ द्वारा दिए फैसले को पलट दिया था।
रोहिंग्या घुसपैठियों का समर्थन
साल 2017 में जस्टिस चंद्रचूड सहित तीन न्यायाधीशों की एक पीठ ने दो रोहिंग्या घुसपैठियों की याचिका पर सुनवाई की और इस मामले को मानवता से जुड़ा करार दिया। जबकि इस पर केंद्र सरकार ने अपना हलफनामा देते हुए स्पष्ट कहा कि यह घुसपैठिये देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा है। साल 2018 में इस बात का खुलासा हो चुका है कि रोहिंग्या घुसपैठियों के लश्कर और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों से सम्बन्ध है।
जस्टिस लोया मौत
साल 2018 में जस्टिस चन्द्रचूड़ उस तीन सदस्यीय खंडपीठ का हिस्सा थे जिसमें जस्टिस लोया की मृत्यु से संबंधित सभी दस्तावेज की विवरणिका पेश करने का आदेश दिया गया था। यही नहीं, इस मामले पर उन्होंने कहा कि वे इन्साफ दिलाने के लिए हर तरह के सवाल पूछेंगे।
सबरीमाला मामला में परम्पराओं को बदला
साल 2018 में, सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर उच्चतम न्यायालय ने संज्ञान लिया तो इस मामलें से जस्टिस चंद्रचूड़ भी जुड़े हुए थे। उन्होंने सबरीमाला मंदिर में हजारों सालों से महिलाओं के प्रवेश पर रोक की परंपरा को पलट दिया।
श्रीराम जन्मभूमि पर ऐतिहासिक फैसला
साल 2019 में, श्रीरामजन्म भूमि पर सुनवाई के दौरान लगभग 500 साल पुराने दस्तावेजों का अध्ययन किया गया और एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक फैसला जन्मभूमि के पक्ष में सुनाया गया। जस्टिस चंद्रचूड इस फैसले को सुनाने वाली खंडपीठ का हिस्सा थे।
नागरिकता संशोधित कानून (CAA) विरोधी आंदोलन पर निजी विचार
जब देशभर में CAA और NRC पर आन्दोलन हो रहे थे तो फरवरी 2020 में जस्टिस चंद्रचूड़ 15वें जस्टिस पीडी देसाई मेमोरियल लेक्चर में 'द ह्यूज दैट मेक इंडिया: बहुलता से बहुवाद तक' विषय पर अपने विचार रखने अहमदाबाद में थे।
अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि "असहमति लोकतंत्र का 'सेफ्टी वॉल्व' होता है। किसी मुद्दे पर असहमति को राष्ट्र-विरोधी और लोकतंत्र विरोधी बता देना संवैधानिक मूल्यों और लोकतंत्र को बढ़ावा देने के प्रति देश की प्रतिबद्धता के मूल विचार पर चोट करता है।"
एडल्टरी लॉ का फैसला भी पलटा
जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने पिता द्वारा एडल्टरी लॉ पर दिया फैसला भी साल 2018 में पलट दिया था। साल 1985 में जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ ने एडल्टरी कानून को संवैधानिक रूप से वैध करार दिया था। जबकि न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ उस पीठ का हिस्सा थे, जिसने सर्वसम्मति से उस कानून को रद्द कर दिया जो एडल्टरी को एक व्यक्ति द्वारा दूसरे के खिलाफ किए गए अपराध के रूप में मानता है। उस आदेश के बाद, एडल्टरी (विवाहेतर संबंध) अब अपराध नहीं है, केवल तलाक का आधार है।
मेरिटल रेप अथवा वैवाहिक बलात्कार
साल 2022 में, सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यों की पीठ ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि वैवाहिक बलात्कार अथवा मेरिटल रेप को भी बलात्कार की श्रेणी में आना चाहिए। इस पीठ में जस्टिस चंद्रचूड भी शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बहुत ही विवादित माना गया और पूरे देश में ऐसे मामलों को लेकर एक लम्बी बहस छिड़ गयी।
इस पीठ ने वैवाहिक दुष्कर्म को बलात्कार के दायरे में रखते हुए विवाहित महिलाओं के गर्भपात के अधिकार को परिभाषित किया। कोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म का अर्थ है बिना सहमति के संबंध, वैवाहिक संबंधों में अंतरंग पार्टनर की यौन हिंसा एक वास्तविकता है। ऐसे में महिला बिना इच्छा के गर्भवती हो सकती है। अगर ऐसे जबरन संबंधों की वजह से पत्नी गर्भवती होती है, तो उसे गर्भपात का अधिकार है।
केंद्र सरकार ने 2017 में दिल्ली हाईकोर्ट में कहा था कि वैवाहिक दुष्कर्म का अपराधीकरण भारतीय समाज में विवाह की व्यवस्था को अस्थिर कर सकता है। ऐसा कानून पति के उत्पीड़न के हथियार के रूप में काम करेगा।
न्यायपालिका की अवमानना
साल 2022 में जस्टिस चंद्रचूड़ के समक्ष न्यायपालिका की अवमानना से जुड़ा एक मामला आया। दरअसल, कुछ महीनों पहले मद्रास उच्च न्यायालय ने एक वकील को न्यायपालिका की अवमानना के लिए 15 दिन की कैद की सजा सुना दी। उस वकील ने सजा से राहत पाने के लिए उच्चतम न्यायालय में अपील की और जस्टिस चंद्रचूड़ ने मद्रास उच्च न्यायालय की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि न्यायाधीशों पर आरोप लगाना अब फैशन बन गया है। जबकि खुद जस्टिस चंद्रचूड़ कई बार न्यायपालिका की अवमानना को पुराने जमाने की बात कह चुके थे।
कश्मीर घाटी में हिन्दुओं के नरसंहार पर सुनवाई से इंकार
एक गैर-सरकारी संगठन ने कश्मीर घाटी में 1989-90 में घाटी में आतंकवाद के चलते कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार सहित अन्य जघन्य अपराधों के मामलों पर संज्ञान लेने के लिए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की तो उसे खारिज कर दिया गया।
इस याचिका को ख़ारिज करने वाली पीठ का हिस्सा जस्टिस चंद्रचूड़ भी थे और उन्होंने कहा कि करीब 27 साल बीत चुके हैं। ऐसे में हत्या, आगजनी एवं लूटपाट के उन मामलों में सबूत एकत्र करना बहुत मुश्किल होगा, जिनके कारण बड़े पैमाने पर घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ था। पीठ ने यह भी कहा, 'आप याचिकाकर्ता पिछले 27 वर्षों तक बैठे रहे। अब हमें बताइए कि सबूत कहां से आएंगे?'
आल्ट न्यूज़ और रिपब्लिक भारत
आल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर को कुछ दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत मिल गयी और साथ ही उत्तर प्रदेश द्वारा जांच के लिए गठित एसआईटी (SIT) भी भंग कर दी गयी। जस्टिस चन्द्रचूड की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि ऐसा कोई भी कारण नहीं दिखाई देता, जिससे याचिकाकर्ता को लगातार हिरासत में रखा जाए।
जबकि रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी पर दर्ज एफआईआर (FIR) रद्द करने का मामला जस्टिस चंद्रचूड के सामने आया तो उन्होंने नियमों का हवाला देते हुए एफआईआर रद्द नहीं की।
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