Israel politics and history: राजनीतिक अस्थिरता और आतंकवाद से परेशान यहूदी राष्ट्र इजरायल का क्या है इतिहास

Israel politics and history, इजराइल में हुए संसदीय चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू की नेतृत्व वाली पार्टी 'लिकुड' ने जीत दर्ज की है। इस पार्टी ने 120 सदस्यीय संसद (नेसेट) में 64 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया है। इसी के साथ बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर से इजराइल की सत्ता संभालने जा रहे हैं।

Israel politics and history: What is the history of Jewish nation Israel, troubled by political instability and terrorism

नेतन्याहू ने मौजूदा प्रधानमंत्री येर लापिड की पार्टी 'येश अतिद' को चुनाव में हरा दिया है। पिछले कुछ वर्षों से इजराइल में राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई थी। पिछले 4 वर्षों में वहां पर पांचवी बार चुनाव हुए हैं, जिसके बाद पूर्ण बहुमत के साथ किसी पार्टी ने सत्ता में वापसी की है।

बेंजामिन नेतन्याहू पहली बार 1996 में प्रधानमंत्री बने। दूसरी बार वे 2009 में प्रधानमंत्री बने और 2021 तक इस पद पर बने रहे। एक दौर ऐसा था जब नेतन्याहू की टक्कर में कोई भी विपक्षी नेता नजर नहीं आता था। नवंबर 2019 में इजरायल के इतिहास में पहली बार एक प्रधानमंत्री के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। नेतन्याहू पर यह आरोप था कि उन्होंने बड़े व्यवसायी और मीडिया दिग्गजों के साथ मिलकर रिश्वत और धोखाधड़ी की है। जून 2021 में विपक्षी गठबंधन के मजबूत होने के चलते नेतन्याहू को इस्तीफा देना पड़ा।

13 जून 2021 को नेतन्याहू के ही पूर्व सहयोगी नाफ्ताली बेनेट एक सांसद के मामूली बहुमत से प्रधानमंत्री बने। लेकिन एक वर्ष के अंदर ही उनकी सरकार में शामिल कई सदस्यों ने त्यागपत्र दे दिया, जिससे नाफ्ताली सरकार अल्पमत में आ गई। इसके बाद संसद को भंग कर दिया गया और 1 जुलाई 2022 को अगले चुनाव होने तक यैर लापिद को कार्यकारी प्रधानमंत्री बनाया गया।

नए चुनाव की घोषणा होने के बाद सभी दक्षिणपंथी यहूदी पार्टियां बेंजामिन नेतन्याहू के साथ खड़ी हो गईं। जबकि विपक्ष में अरबों की विभिन्न पार्टियां कोई संयुक्त मोर्चा नहीं बना पाईं। अरब समर्थक चार दलों का गठबंधन 'ज्वायंट लिस्ट' समाप्त हो गया और इन्होंने अलग-अलग चुनाव लड़ने की घोषणा की। इस गठबंधन में डेमोक्रेटिक फ्रंट फाॅर पीस एंड इक्वालिटी (हदश), नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (बलाद), यूनाइटेड अरब लिस्ट (राम) और अरब मुवमेंट फाॅर रिन्यूअल (ताल) शामिल थे।

इजराइल की चुनावी प्रक्रिया
इजराइल की संसद (नेसेट) के लिए प्रत्येक चार वर्ष में चुनाव होते हैं, लेकिन किसी भी सरकार का एक निश्चित कार्यकाल नहीं होता है। सरकार का विश्वास मत खोने पर संसद में बहुमत या राष्ट्रपति डिक्री के जरिए समय से पहले चुनाव कराए जा सकते हैं। 120 सीटों वाली संसद अगर बहुमत से खुद को भंग करने का फैसला कर ले तो भी दोबारा से चुनाव कराए जाते हैं।

इजरायल में भी दुनिया के बाकी देशों की तरह लोकतांत्रिक चुनाव व्यवस्था है जहां मतदान के जरिए सत्ता का शांतिपूर्ण तरीके से हस्तांतरण होता है। यहाँ पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व चुनावी व्यवस्था है, जिसे 'लिस्ट सिस्टम' भी कहा जाता है। इसमें मतदाता किसी एक राजनीतिक पार्टी के लिए अपना मत डालते हैं।

किसी भी राजनीतिक दल को चुनाव में जितने फीसदी वोट मिलते हैं, उसी अनुपात के हिसाब से संसद में उसकी सीटें तय होती हैं। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी पार्टी को 10 प्रतिशत वोट मिलते हैं तो उसे 120 सीटों (120 का 10 फीसदी=12) में से 12 सीटें मिलती हैं। इजरायल की संसद में सीट हासिल करने के लिए कुल मतदान का न्यूनतम 3.25 फीसदी मत हासिल करना जरूरी है। अगर कोई पार्टी इससे कम मत हासिल करती है तो उसे संसद में सीटें नहीं मिलती हैं। आम चुनाव से पहले, हर पार्टी अपने उम्मीदवारों की एक प्रेफरेंशियल सूची जारी करती है। इसी सूची में से सांसद बनाए जाते हैं। यह सूची अगले चुनाव तक वैध रहती है। अगर संसद के किसी सांसद की मौत हो जाती है तो पार्टी की सूची में मौजूद दूसरे व्यक्ति को नेसेट में जगह दी जाती है।

अगर सबसे बड़ी पार्टी गठबंधन की सरकार बनाने में नाकाम रहती है, तो राष्ट्रपति किसी दूसरी पार्टी को मौका दे सकता है। 2009 में भी ऐसा ही समीकरण देखने को मिला था जब कदीमा पार्टी की नेता ज़िपी लीवनी नेतन्याहू के नेतृत्व वाली लिकुड पार्टी से एक सीट ज्यादा हासिल करने के बावजूद सरकार नहीं बना पाई थी। अप्रैल 2019 के चुनावों के बाद, राष्ट्रपति ने नेतन्याहू को सरकार बनाने के लिए बुलाया था, लेकिन वह गठबंधन नहीं बना सके। संसद भंग करने के पक्ष में नेसेट में मतदान हुआ जिसके बाद दोबारा चुनाव कराए गए।

अरब देशों द्वारा इजराइल को मान्यता
अमेरिका के प्रयासों से इजराइल के राजनयिक संबंध अब तक आठ मुस्लिम देशों से स्थापित हो चुके हैं। इनमें तुर्की, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, सूडान, बहरीन, मोरक्को, जॉर्डन और मिस्र शामिल हैं।

इजराइल का इतिहास
14 मई 1948 को इजराइल अस्तित्व में आया। इजराइल एक ऐसा देश है जिसने दुश्मनों से घिरे होने के बाद भी उनकी नाक में दम कर रखा है। इसकी खुफिया एजेंसी मोसाद के नाम से ही दुश्मनों के पसीने छूट जाते हैं। आज दुनिया के नक्शे में इजराइल जिस आकार में है इसके पीछे सालों पुराना इतिहास है।

कभी इजराइल की जगह तुर्की का ओटोमान साम्राज्य हुआ करता था। प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की की हार के बाद इस इलाके में ब्रिटेन का कब्जा हो गया। ब्रिटेन उस समय एक बड़ी शक्ति था और दूसरे विश्वयुद्ध तक ये इलाका ब्रिटेन के कब्जे में ही रहा।

अरबों और यहूदियों में संघर्ष
1948 में पहली बार अरबों और यहूदियों में संघर्ष हुआ। ब्रिटेन ने यहूदियों को यह आश्वासन दिया था कि वे उनके लिए एक आजाद संप्रभु राष्ट्र इजराइल की स्थापना करेंगे। मगर अरबों के रूख को देखते हुए ब्रिटेन को इजराइल की स्थापना की घोषणा करने की हिम्मत नहीं हुई और वे फिलिस्तीन को छोड़कर वहां से चले गए। इसके बाद यहूदी नेताओं ने इजराइल नामक देश की घोषणा कर दी।

इसका विरोध फिलिस्तीनी मुसलमानों ने किया और युद्ध शुरू कर दिया। युद्ध के दौरान कई फिलिस्तीनियों को अपना घर-बार छोड़कर भागना पड़ा। युद्ध की समाप्ति के बाद इजराइल ने फिलिस्तीन के अधिकांश भाग पर कब्जा कर लिया। इस युद्ध में जॉर्डन ने जिस क्षेत्र पर कब्जा किया था, उसे वेस्ट बैंक कहा जाता है। जबकि मिस्र ने जिस क्षेत्र पर कब्जा किया था, उसे गाजा की पट्टी कहा जाता है।

युद्ध समाप्त होने के साथ ही इजराइल की 120 सदस्यीय संसद के लिए 25 जनवरी 1949 को पहला चुनाव हुआ, जिसमें यहां के नागरिकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और डेविड बेन-गुरियन देश के पहले प्रधानमंत्री चुने गए।

1967 में हुए एक अन्य युद्ध में इजराइल ने पूर्वी यरुशलम और वेस्ट बैंक पर भी कब्जा कर लिया। इसके अतिरिक्त उसने सीरिया के गोलन हाइट्स और मिस्र के सिनाई क्षेत्र पर भी कब्जा कर लिया। इजराइल पूरे यरुशलम पर अपना दावा करता है, जबकि फिलिस्तीनी पूर्वी यरुशलम को अपना मानते हैं। इजरायल के दावे को मान्यता देने वाले देशों में अमेरिका, ब्रिटेन सहित अनेक देश शामिल हैं। गाजा और वेस्ट बैंक में रहने वाले मुसलमानों का कहना है कि इजरायल उनका उत्पीड़न करता है।

यहूदियों के ऊपर दो हजार साल तक बेशुमार अत्याचार हुए हैं। यहूदियों की रंजिश मुसलमानों से ज्यादा रोमन और ईसाइयों से रही है। मुसलमानों और यहूदियों की समस्या तो मात्र 100 साल पुरानी है। रोमन लोगों ने यहूदियों का जैसा कत्लेआम किया, वैसा इतिहास में कहीं और नहीं दिखता और कई जगहों पर यहूदी और मुसलमान साथ भी रहे हैं, जैसे मदीना और स्पेन, लेकिन उनके बीच कभी विश्वास पैदा न हो सका।

ईसाई और इस्लाम से भी प्राचीन धर्म होने के बावजूद यहूदियों के पास सदियों तक अपना कोई मुल्क नहीं रहा। यहूदी अपने पूर्वजों की भूमि इजराइल और खासतौर से यरुशलम को लेकर बहुत भावुक हैं, क्योंकि यहां पर कभी उनकी सल्तनत थी। यहीं पर उनका पहला और दूसरा मंदिर था और यहूदियों को भरोसा है कि यहीं पर उनका तीसरा मंदिर बनेगा।

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