Dalai Lama का चीन को जवाब और भारत को प्यार, जानें तिब्बत की निर्वासित सरकार के बारे में
बौद्ध धर्म के सबसे बड़े धर्मगुरु दलाई लामा कई सालों से भारत में निर्वासित जीवन बिता रहे हैं और चीन को लेकर मुखर रहते हैं।

India China faceoff: 9 दिसंबर 2022 को तवांग में भारत-चीन की झड़प के सवाल का जवाब देते हुए कांगड़ा हवाईअड्डे पर बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा ने कहा कि "मेरा चीन लौटने का कोई मतलब नहीं है। मुझे भारत पसंद है। कांगड़ा अच्छी जगह है। पंडित नेहरू की पसंद है। यह जगह मेरा स्थायी निवास है। यह बहुत सही है। धन्यवाद।"
पिछले दिनों तवांग में चीन और भारत की सेनाओं का जिस तरह से सामना हुआ और उससे पहले भी गलवान में ऐसी ही एक घटना हो चुकी थी। दोनों ही मामलों में तिब्बत का मामला भी खूब चर्चा में आया। फिलहाल तिब्बत चीन के कब्जे में है लेकिन वहां के राष्ट्राध्यक्ष भारत में निर्वासित जीवन जी रहे हैं।
दलाई लामा ने कब-कब चीन को दिया जवाब
2022 में ही दलाई लामा ने कहा था कि "जब मैं 16 साल का था, तब मैंने अपनी आजादी खो दी थी और जब मैं 24 साल का था, तब मैंने अपना देश खो दिया था। और पिछले 60 वर्षों और उससे भी अधिक समय में मेरी मातृभूमि से कई दुखद समाचार आ रहे हैं। हिंसा, विनाश और हत्या की कहानियां, जो हमें बेबसी की भावना से भर देती हैं। लेकिन ये वक्त अपनी बुद्धिमता का उपयोग कर मनोबल को गिराने की बजाय उसे अपनी आंतरिक शक्ति के निर्माण में लगाने का है।"
दलाई लामा ने सितंबर 2022 में हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में अपने आवास पर यूनाइटेड स्टेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ पीस (यूएसआईपी) द्वारा आयोजित एक संवाद कार्यक्रम के दौरान कहा कि "मैंने पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कहा, मैं और 15-20 साल जीवित रहूंगा, कोई सवाल ही नहीं है। जिस समय मैं मरूंगा, मैं भारत में मरना पसंद करूंगा। भारत ऐसे लोगों से घिरा हुआ है जो प्यार करते हैं, यहां पर बनावटी कुछ भी नहीं है। अगर मैं बनावटी चीनी अधिकारियों से घिरा हुआ मर जाऊं... वे बहुत ज्यादा बनावटी हैं। मैं इस देश में स्वतंत्र लोकतंत्र के साथ मरना पसंद करुंगा।"
कौन हैं तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा?
दलाई लामा कोई नाम नहीं होता है बल्कि बौद्धों के सबसे बड़े धर्मगुरु की पदवी को कहा जाता है। फिलहाल इस पदवी पर 14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो विराजमान हैं। वास्तव में, दलाई लामा एक मंगोलियाई शब्द है, जिसका मतलब होता है ज्ञान का महासागर। एक समय था जब दलाई लामा को तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष के रूप में देखा जाता था लेकिन तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद दलाई लामा ने 31 मार्च 1959 को भारत में शरण ले ली। तब से दलाई लामा तिब्बत की संप्रभुता के लिए अहिंसात्मक संघर्ष कर रहे है। अहिंसा के माध्यम से उनके संघर्ष को लेकर साल 1989 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था।
क्या है चीन और तिब्बत का विवाद?
साल 1949 में चीन में माओत्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट सरकार सत्ता में आई। जिसके बाद, चीन ने अपने साम्राजवाद (imperialism) के तहत तिब्बत पर 6-7 अक्टूबर 1950 को हमला बोल दिया। तकरीबन 8 महीनों तक चीनी सैनिकों ने तिब्बत में भीषण आतंक मचाया। कई रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ कि चीन ने तिब्बत के तकरीबन 10 लाख से भी ज्यादा लोगों को मार डाला और 6,000 से ज्यादा बौद्ध मठों को उजाड़ दिया। फिर, ताकत के बल पर 23 मई 1951 को चीन ने तिब्बत से 17 बिंदुओं वाले एक समझौते पर हस्ताक्षर करवा लिए, जिसके बाद चीन ने तिब्बत पर अपने कब्जे को एकतरफा आधिकारिक जामा पहना दिया।
जब दलाई लामा ने किया विरोध
दलाई लामा ने 18 अप्रैल 1959 को बताया कि चीन ने 17 बिंदुओं पर जबरन समझौता करवाया था। चीन का तिब्बत पर कब्जा अवैध है। दरअसल, चीन ने तिब्बत पर कब्जा तो कर लिया, लेकिन दलाई लामा की वहां उपस्थिति के चलते वहां अपना अधिपत्य कायम नहीं कर सका। इसलिए साल 1959 के मार्च महीने में चीन ने दलाई लामा को बंधक बनाना चाहा। जब ये बात तिब्बतियों को पता चली तो हजारों लोगों ने सुरक्षा घेरा बनाकर एक सैनिक के वेश में दलाई लामा को राजधानी ल्हासा से निकालकर भारत पहुंचा दिया। तब भारत सरकार ने उन्हें शरण दी।
भारत से चलती है तिब्बत की निर्वासित सरकार
भले ही चीन ने तिब्बत कर कब्जा कर लिया है लेकिन तिब्बत के लोगों की अपनी सरकार चलती है। जिसका केंद्र है हिमाचल प्रदेश का धर्मशाला। यहां पर इनकी संसद भी है। हालांकि, यह सरकार निर्वासित तिब्बतियों की है। इसके चुनाव में दुनियाभर के तिब्बती शरणार्थी वोटिंग करते हैं। वोट डालने के लिए शरणार्थी तिब्बतियों को रजिस्ट्रेशन करवाना होता है। चुनाव के बाद एक राष्ट्रपति को चुना जाता है। जिन्हें 'सिकयोंग' कहा जाता है। इनका कार्यकाल 5 सालों का होता है। मई 2021 में हुए चुनावों में 'पेंपा सेरिंग' निर्वासित तिब्बती सरकार के नये राष्ट्रपति बने थे।
भारत-चीन के बीच तिब्बत मुद्दा
साल 1962 के भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में चीन ने लद्दाख में अक्साई चीन वाले इलाके पर कब्जा कर लिया। वही अरुणाचल प्रदेश पर भी वह अपना दावा करता रहता है। चीन का कहना है कि यह दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा है। चीन, तिब्बत और भारत के बीच मैकमोहन रेखा को भी नहीं मानता है। चीन का कहना है कि साल 1914 में जब ब्रिटिश भारत और तिब्बत के प्रतिनिधियों ने यह समझौता किया था, तब चीन वहां मौजूद नहीं था। जबकि तिब्बत तो चीन का अंग रहा है तो चीन से पूछे बिना कोई सीमा कैसे बांध सकता है?
यह भी पढ़ें: India-China faceoff: तवांग सीमा पर लगाए जा रहे हैं नए मोबाइल टावर, इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी हो रहा है ये काम
-
'शूटिंग सेट पर ले जाकर कपड़े उतरवा देते थे', सलमान खान की 'हीरोइन' का सनसनीखेज खुलासा, ऐसे बर्बाद हुआ करियर -
Delhi NCR Weather Today: दिल्ली-NCR में होगी झमाझम बारिश, दिन में छाएगा अंधेरा, गिरेगा तापमान -
युद्ध के बीच ईरान ने ट्रंप को भेजा ‘बेशकीमती तोहफा’, आखिर क्या है यह रहस्यमयी गिफ्ट -
Gold Silver Price: सोना 13% डाउन, चांदी 20% लुढ़की, मार्केट का हाल देख निवेशक परेशान -
Ram Navami Kya Band-Khula: UP में दो दिन की छुट्टी-4 दिन का लंबा वीकेंड? स्कूल-बैंक समेत क्या बंद-क्या खुला? -
इच्छामृत्यु के बाद हरीश राणा पंचतत्व में विलीन, पिता का भावुक संदेश और आखिरी Video देख नहीं रुकेंगे आंसू -
'मुझे 10 बार गलत जगह पर टच किया', Monalisa ने सनोज मिश्रा का खोला कच्चा-चिट्ठा, बोलीं-वो मेरी मौत चाहता है -
Petrol-Diesel Shortage: क्या भारत में पेट्रोल-डीजल समेत ईंधन की कमी है? IndianOil ने बताया चौंकाने वाला सच -
कौन हैं ये असम की नेता? जिनके नाम पर हैं 37 बैंक अकाउंट, 32 गाड़ियां, कुल संपत्ति की कीमत कर देगी हैरान -
Iran Vs America: ईरान ने ठुकराया पाकिस्तान का ऑफर, भारत का नाम लेकर दिखाया ऐसा आईना, शहबाज की हुई फजीहत -
LPG Crisis: एलपीजी संकट के बीच सरकार का सख्त फैसला, होटल-रेस्टोरेंट पर नया नियम लागू -
Trump Florida defeat: ईरान से जंग ट्रंप को पड़ी भारी, जिस सीट पर खुद वोट डाला, वहीं मिली सबसे करारी हार












Click it and Unblock the Notifications