Parliament Building: भारत का नया संसद भवन तैयार, जानें दुनिया की सबसे पुरानी संसदों का रोचक इतिहास
भारत का नया संसद भवन बनकर तैयार है। यह केंद्र सरकार के सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का हिस्सा है। इस भवन का 28 मई को लोकार्पण होगा।

Parliament Building: 5 अगस्त 2019 को लोकसभा और राज्यसभा के दोनों सदनों से एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से नये संसद भवन के निर्माण को कहा गया था। इसके बाद 10 दिसंबर 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नये संसद भवन का भूमि पूजन किया। नये संसद भवन का निर्माण अब पूरा हो गया है और यह भवन आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक बनेगा। साथ ही संसद का यह नवनिर्मित भवन अत्याधुनिक सुविधाओं से भी लैस होगा।
नये संसद भवन की जरूरत क्यों
मौजूदा संसद भवन ब्रिटिश भारत में तैयार किया गया था। 1921 में इसका निर्माण शुरू होकर 1927 में पूरा हुआ यानी इसे बने लगभग 100 साल हो जायेंगे। वर्तमान में अत्याधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और तकनीकों के मामलें में यह भवन उपयुक्त नहीं है। इसलिए इन सभी जरूरतों सहित लगभग डेढ़ अरब की आबादी को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए एक नये भवन की जरुरत कई सालों से महसूस की जा रही थी।
पीएम मोदी ने भवन के शिलान्यास के दौरान जिक्र किया था कि भविष्य की जरूरतों को देखते हुए इस संसद भवन को बनाने का फैसला किया गया है। असल में भारत में पहली बार संसदीय चुनाव 1951-52 में हुए थे। उस वक्त लोकसभा की 489 सीटें हुआ करती थीं। वहीं वर्तमान लोकसभा में 545 सदस्य है। जबकि साल 2026 में लोकसभा क्षेत्रों का परिसीमन होगा, उसके बाद सदस्यों की संख्या और बढ़ जाएगी। इस नाते पुराने भवन में उन्हें बैठने की जगह उपलब्ध नहीं होगी। इसलिए नया भवन इस नाते कारगर सिद्ध होगा।
इसके अलावा निर्वाचित सांसदों के लिए संसद भवन के अन्दर ही कार्यालय नहीं बने हैं। जबकि सांसदों की तरफ से मांग होती रही है कि उन्हें संसद भवन परिसर में ही कार्यालय मिलना चाहिए। ताकि वे अपने कामकाज को बेहतर ढंग से कर सकें।
कैसे और कब बढ़ाई गयी सांसदों की संख्या
1951 में लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या 489 थी। साल 1973 में अनुच्छेद 81 में संशोधन कर सीटों की संख्या 545 की गयी थी। फिर 1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए यह तय किया गया कि लोकसभा सीटों की संख्या तय करने का आधार 1971 की जनगणना होगी और यह स्थिति 2001 तक बनी रहेगी।
उम्मीद थी कि साल 2001 में लोकसभा सीटों की संख्या में बढ़ेगी लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के शासन में इसे टाल दिया गया। तब संविधान के 84वें संशोधन के जरिये तय किया गया कि लोकसभा सीटों की संख्या तय करने का आधार 1971 की जनगणना ही रहेगी। साथ ही यह संख्या 2026 तक स्थिर रहेगी।
इसके पीछे वाजपेयी सरकार ने तर्क दिया कि जनसंख्या नियंत्रण को गंभीरता से लागू करने वाले दक्षिण भारतीय राज्यों को नये परिसीमन से नुकसान होगा। लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व घट जायेगा और उत्तर भारत की सीटें बढ़ेगी। इसलिए 20 साल इंतजार किया जाये ताकि जनसंख्या संतुलन बन सके।
एक सांसद पर 25 लाख की आबादी
सांसदों की संख्या कितनी बढ़नी चाहिए, इसे लेकर केंद्र सरकार द्वारा अभीतक कोई आंकड़ा अथवा बयान सामने नहीं आया है। वैसे नया परिसीमन बेहद जरूरी है क्योंकि इस वक्त एक लोकसभा सांसद लगभग 25 लाख की आबादी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। जबकि साल 1976 में एक सांसद ज्यादा-से-ज्यादा 10 लाख जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते थे।
नए संसद में क्या-क्या बदलेगा?
नये संसद भवन में लोकसभा और राज्यसभा कक्ष में प्रत्येक बेंच पर एक साथ दो सदस्य बैठ सकेंगे और प्रत्येक सीट डिजिटल प्रणाली और टच स्क्रीन से सुसज्जित की गई है। नये संसद भवन में लोकसभा को राष्ट्रीय पक्षी मयूर के आकार, जबकि राज्यसभा को राष्ट्रीय पुष्प कमल के आकार और भूकंप रोधी डिजाइन में तैयार किया गया है।
नया संसद भवन को हर मामले में विश्व की सबसे अत्याधुनिक इमारत के तौर पर तैयार किया गया है। इस भवन में 2000 लोग प्रत्यक्ष और 9000 अप्रत्यक्ष रूप से बैठ सकेंगे। नया भवन करीब 64,500 स्क्वायर मीटर में फैला होगा। इस भवन में जहां लोकसभा में 888 सांसदों के बैठने की व्यवस्था होगी, वहीं राज्यसभा में 384 सदस्यों के बैठने का इंतजाम किया गया है। दोनों सदनों की संयुक्त मीटिंग में कुल 1280 सांसद एक साथ बैठ सकेंगे।
नये संसद भवन के दोनों सदनों - लोकसभा और राज्यसभा के कर्मचारी अब नयी वर्दी पहनेंगे। इसे नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (निफ्ट) ने डिजाइन किया है। पहले संसद के अंदर काम करने वाले कर्मचारी सफेद ड्रेस पहनते थे। हालांकि, बजट सत्र के दौरान मार्शलों का ड्रेस बदल दिया गया था। वहीं नये संसद भवन में सेंट्रल हॉल नहीं होगा। इसकी जगह कमेटी हॉल होगा। इसमें विशेष तौर पर बेहद खूबसूरत संविधान कक्ष बनाया गया है। इस हॉल में देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों समेत महान सेनानियों की तस्वीरें लगाई जाएगी। इसके अतिरिक्त लाउंज, पुस्तकालय, कैंटीन की सुविधा उपलब्ध होगी।
नये संसद भवन में तीन द्वार - ज्ञान द्वार, शक्ति द्वार और कर्म द्वार बनाये गए है। सांसदों, वीआईपी और मेहमानों सबके लिए अलग-अलग प्रवेश द्वार है। साथ ही लोकसभा स्पीकर, प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष के लिए विशेष चैंबर बनाये गये हैं।
पुराने संसद भवन की समस्याएं?
बात अगर पुराने संसद भवन की करें तो यहां संसद भवन में लोकसभा सांसदों की बैठने की क्षमता 590 थी। जबकि राज्यसभा में यह संख्या 300 से भी कम है। ऐसे में नये संसद भवन में बैठने के लिए सीटों की क्षमता बढ़ाई गई है।
पुराने संसद का क्या है इतिहास?
संसद की पुरानी इमारत ब्रिटिश राज के समय में 1927 में बनकर तैयार हुई थी। तब 1926 से 1931 तक इरविन भारत के वायसराय थे। इस कारण भारतीय संसद का उद्घाटन उन्होंने किया था। तब उसे हाउस ऑफ पार्लियामेंट कहा गया था। इस हाउस में ब्रिटिश सरकार की विधान परिषद काम करती थी। आजादी के बाद इसे लोकतांत्रिक भारत के संसद भवन में परिवर्तित कर दिया गया।
ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने इस संसद भवन का डिजाइन तैयार किया था। उस वक्त इसके निर्माण में लगभग 83 लाख रुपये खर्च हुए थे। यह भवन 566 मीटर व्यास में बना था। बाद में ज्यादा जगह की जरूरत पड़ी तो 1956 में संसद भवन में दो और मंजिलें जोड़ी गयी थी।
दुनिया की सबसे पुरानी संसदीय इमारतें
इमारत द बिन्नेनहोफ - नीदरलैंड के संसद की इमारत द बिन्नेनहोफ सबसे पुरानी मानी जाती है, जिसका इस्तेमाल अभी हो रहा है। हेग शहर में बने इस भवन का निर्माण 13वीं शताब्दी में हुआ था।
पलाज्जो मडामा - इटली का संसद भवन पलाज्जो मडामा भी काफी पुराना है। इसे इटली की राजधानी रोम में बनाया गया और इसका निर्माण 16वीं शताब्दी में किया गया था।
लक्जमबर्ग पैलेस - फ्रांस की संसद का नाम लक्जमबर्ग पैलेस है। इसे पेरिस में राजा के भवन के रूप में 1615 से 1645 के बीच में बनाया गया था।
अमेरिकी संसद - अमेरिका के संसद भवन का निर्माण सन 1800 में पूरा हुआ था और इसे नॉर्थ और साउथ अमेरिका में सबसे पुराना संसद भवन माना जाता है।
हाउस ऑफ कॉमन्स और लॉर्ड्स - ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स और हाउस ऑफ लॉर्ड्स का निर्माण क्रमश: 1840 और 1870 में हुआ था।












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