Himachal Pradesh: बारिश से हिमाचल में जान-माल का इतना नुकसान क्यों, जानिए प्रमुख कारण
हिमाचल प्रदेश में बारिश के कहर ने सभी जिलों में अपना रौद्र रुप दिखाया है। कहीं सड़कें टूट गयी तो कहीं पहाड़ खिसक गये, तो कहीं लैंडस्लाइडिंग इतनी ज्यादा हुई कि सब तबाह हो गया। इस बीच मौसम विभाग ने 14-16 जुलाई के बीच भारी बारिश का फिर से अलर्ट जारी कर दिया है।
राज्य के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह हवाई सर्वे कर रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री को भी मौजूदा हालातों से अवगत करा दिया है। फिलहाल राज्य में बिजली, पानी, यातायात और दूरसंचार सब ठप्प पड़ गया है।

मानसून के दिनों में प्रकृति का यह एक सामान्य स्वरुप है। कभी सामान्य बारिश होती है तो कभी जरूरत से ज्यादा। मगर इन सब के बीच एक सवाल पैदा होता है कि आखिर जान-माल का इतना नुकसान क्यों हो रहा है? हम सभी यह भी जानते है कि प्रकृति कभी किसी को अकारण ही नुकसान नहीं पहुंचाती। आइये इस नुकसान और इंसानी गतिविधियों के माध्यम से यह समझने की कोशिश करते हैं।
अवैध निर्माण सबसे बड़ा कारण
भारी नुकसान का बड़ा कारण अवैध निर्माण है। लोग चर्चाएं भी कर रहे हैं कि आखिर प्रदेश में ऐसे गैर-कानूनी अवैध निर्माण को कौन संरक्षण दे रहा है? प्रदेश में नदियों किनारे बने होटल और घर बह गये। जब तबाही हुई तो सरकार को भी इस बात का ख्याल आया कि ये तो गलत हो रहा था। बीते दिनों हिमाचल मंत्रिमंडल के सदस्य चंद्र कुमार ने कहा कि कैबिनेट की बैठक में नदियों के किनारे होने वाली अवैध गतिविधियों पर रोक लगाने पर चर्चा की जाएगी। मनाली में जब नदी किनारे बनी सेफ्टी वॉल तक बह गयी तो सरकार को ध्यान आया कि निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल हुआ है।
अवैध निर्माण का एक उदाहरण यूं समझिए। कांगड़ा जिला के धर्मशाला में घने जंगलों में पेड़ काटकर भवनों का निर्माण करने का काम मैक्लोडगंज में धड़ल्ले हो रहा था। इस मामले की शिकायत यहां के निवासियों ने नहीं बल्कि एक विदेशी पर्यटक ने वन विभाग से की थी। यह अवैध खुदाई किसने की? इस पर भी सभी विभाग चुप्पी साधे हुए हैं और किसी आपदा के आने का इंतजार कर रहे हैं।
भूमि की जांच किए बिना भवनों का निर्माण
हिमाचल प्रदेश पहाड़ी राज्य है। यहां लगभग सभी घर पहाड़ों पर बने हैं। मगर लोग बिना जियोलॉजिकल सर्वे के पहाड़ों पर घर बना रहे हैं। जब कुछ समय के बाद पहाड़ की मिट्टी खिसकने लगती है तो जानमाल को भारी नुकसान पहुंचता है। स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी के आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल में 2020 में लैंड स्लाइड की केवल 16 घटनाएं हुई थी। जो साल 2021 में बढ़कर 100 और 2022 में 117 हो गयी थी। 2022 में 406 लोगों की जान ऐसे ही कारणों से गयी। जिसके बाद राज्य सरकार ने जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया से प्रदेश का सर्वे कराया। तब इस बात का खुलासा हुआ कि प्रदेश भर में 17,120 साइट ऐसी हैं जहां लैंड स्लाइड की संभावनाएं ज्यादा रहती है।
इन आंकड़ों को यदि जिले के अनुसार देखें तो सिरमौर में 2559, चंबा में 2389, लाहौल स्पीति में 2295, कांगड़ा में 1779, शिमला में 1357, बिलासपुर में 446, ऊना में 391, मंडी में 1799 और किन्नौर में 1595 ऐसी खतरनाक साइटें हैं, जिन्हें जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने चिन्हित किया है।
जगह जगह बांधों के निर्माण
हिमाचल में जगह-जगह बांधों का ताबड़तोड़ निर्माण किया जा रहा है। बांधों के साथ लगते गांवों में सबसे ज्यादा नुकसान बरसात के दिनों में होता है। इससे बाढ़ और आसपास की बसावट का विनाश होने का खतरा सबसे अधिक होता है। क्योंकि बरसात में जलस्तर बढ़ जाता है। तो बांधों का जलस्तर अपने खतरे के निशान से ऊपर आने लगता है। हिमाचल में मंडी, बिलासपुर, कुल्लू में हो रही त्रासदी में इसका भी हाथ है। बिलासपुर जिले में भाखड़ा बांध, जिला कांगड़ा का पोंग डैम, मंडी का पंडोह डैम इसके कुछ उदाहरण है। क्योंकि जब जलस्तर बढ़ता है तो इन बांधों के आसपास के इलाकों में पानी भरने का खतरा सबसे अधिक हो जाता है। हाल ही में हुई भयंकर बारिश में पंडोह बाजार में पानी घुस आया था।
पेड़ों का अवैध कटान
हिमाचल की भौगोलिक परिस्थितियों के हिसाब से यहां पेड़ों का होना अति आवश्यक है। पेड़ों की जड़ें मिट्टी में पकड़ बनाये रखती हैं, जिससे लैंड स्लाइडिंग का खतरा कम रहता है। पर हिमाचल में लैंड स्लाइडिंग होने के प्रमुख कारणों में पेड़ों का अवैध कटान भी जिम्मेदार है। अवैध कटान के दो बड़े उदाहरण बीते दिनों चम्बा और शिमला में देखने को मिले।
चम्बा में अवैध कटान करके 1843 पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाई गयी थी। कटान को लेकर फर्जी हस्ताक्षर तक का मामला इसमें उजागर हुआ था। साल 2013 से 2015 के बीच में यह कांड हुआ था। इस दौरान 1339 हरे पेड़ों को काट दिया गया था। जब मामला प्रकाश में आया तो सरकार ने कमेटी का गठन कर जिला चम्बा के एल्हमी बीट में हुए अवैध कटान मामले की निष्पक्ष जांच की जिम्मेदारी सौंप दी।
शिमला, प्रदेश की राजधानी है। बड़े अधिकारी व मंत्री वहीं रहते हैं। वहां मुख्यालय से मात्र दस किलोमीटर दूर तारा देवी में हुए अवैध कटान के घटनाक्रम में 12 अधिकारियों और कर्मचारियों को गिरफ्तार किया गया था। मगर किन प्रभावशाली लोगों की शह पर 477 पेड़ काटे गये, इस मामले में अफसरों की चुप्पी रही।
सड़क-सुरंग बनाने में ब्लास्टिंग
सड़क के लिए पहाड़ों पर खुदाई के लिए ब्लास्टिंग की जाती है। अवैज्ञानिक तरीके से होने वाली ब्लास्टिंग से पहाड़ों को भारी क्षति पहुंचती है। पहाड़ों के अंदर दरारें आ जाती हैं जिसका खामियाजा कुछ वर्षों के बाद पहाड़ पर रहने वाले लोगों को भुगतना पड़ता है। हाल ही में इसके कुछ उदाहरण देखने को भी मिले। कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन निर्माण के दौरान हिमाचल के जिला बिलासपुर में ब्लास्टिंग से वहां के गांवों में घरों में दरारें पड़ने का मामला प्रकाश में आया था। इस बारे में लोगों ने स्थानीय प्रशासन से शिकायत भी की थी।
लोगों के मुताबिक ब्लास्टिंग से भारी कंपन पैदा हो रहा था, जिससे उनकी निजी भूमि में भी बड़ी-बड़ी दरारें आ गई। ये सब कारण भूस्खलन के कारक बनते है। इसके साथ ही मंडी में मनाली-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण कार्य में सुंरग बनाने के क्रम में हुई ब्लास्टिंग के दौरान मंडी जिले के गावों में इंसानों के साथ-साथ घर भी कांप गए थे। ऐसे में कहा जा सकता है कि पहाड़ों पर ब्लास्टिंग से विकास कम और विनाश ज्यादा हो रहा है।












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