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Black Turmeric: स्वास्थ्य और कमाई दोनों के लिए लाभदायक है काली हल्दी

हम सभी पीली हल्दी के गुणों के बारे में अच्छी तरह परिचित हैं। लेकिन काली हल्दी, उसकी खेती व उसके औषधीय गुणों के बारे में कम लोग ही जानते है।

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Black Turmeric: हल्दी सिर्फ पीली नहीं बल्कि काले रंग की भी होती है। इस काली हल्दी में पीली हल्दी से ज्यादा औषधीय गुण पाये जाते है। सूखी काली हल्दी में 1.6 प्रतिशत तेल (जिसमें 76.6 प्रतिशत डी-कपूर) 8.2 प्रतिशत कैम्फीन व बोर्निलीन तथा 10.5 प्रतिशत सेसक्वीटरपीन, करक्यूमिन, आयोनोन व टरमेरोन पाया जाता है। उसके ये गुण उसे एंटी-फंगल, एंटी-अस्थमा, एंटी-ऑक्सिडेंट, एनाल्जेसिक, लोकोमोटर डिप्रेसेंट, एंटीकॉन्वेलसेंट, एंटी-बैक्टीरियल व एंटी-अल्सर के लिए लाभकारी बनाते हैं। इसका इस्तेमाल सांप और बिच्छू के काटने पर भी किया जाता है।

कैसे होती है काली हल्दी की खेती

काली हल्दी का वानस्पतिक नाम करक्यूमा केसिया है। इसकी खेती के लिए भुरभुरी दोमट मिट्टी उपुयक्त होती है और जून का महीना अच्छा होता है। खेती करते समय ध्यान रखना चाहिए कि खेत में बारिश का पानी न रुके, क्योंकि इसको ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं रहती। अधिकांशतः इसमें किसी भी प्रकार के कीटनाशक की भी जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि इसके औषधीय गुणों के कारण इसमें कीट नहीं लगते। अच्छी पैदावार लेने के लिए काली हल्दी की खेती करने से पहले मिट्टी में गोबर की खाद डालनी चाहिए। इसकी फसल 250 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी खुदाई जनवरी से मार्च में की जाती है।

कितनी होती है पैदावार

काली हल्दी का उत्पादन एक एकड़ में करीब 50-60 क्विंटल अर्थात 1 हेक्टेयर में 120-150 क्विंटल (अर्थात 10 से 15 टन) होता हैं। जो सुखाने के बाद लगभग 12-15 क्विंटल प्रति एकड यानि 30-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रह जाती हैं। इंडियामार्ट पर काली हल्दी फिलहाल 500 से 4000 रुपये प्रति किलो तक में बिक रही है। इस हिसाब से एक एकड़ में किसानों को काली हल्दी से अच्छी-खासी कमाई हो सकती हैं। काली हल्दी अपने मूल रूप के अलावा, तेल और पाउडर दोनों में बेची जा सकती हैं।

काली हल्दी से किसान हो रहे मालामाल

मध्य प्रदेश के सागर जिले के युवा किसान आकाश चौरसिया (जिन्हें मल्टीलेयर फॉर्मिंग किसान के रूप में जाना जाता है।) काली हल्दी उगाकर काफी मुनाफा कमा रहे है। अब वे मध्य प्रदेश व बुंदेलखंड के किसानों को हल्दी की खेती भी सिखाते है। ऐसे ही पूर्णिया जिले (बिहार) में काली हल्दी की खेती कर रहे हिमकर मिश्रा अन्य किसानों को भी इसके लिए प्रेरित कर रहे है। उनका कहना है कि काली हल्दी में करक्यूमिन 14 प्रतिशत होता है, जबकि पीली हल्दी में सिर्फ 2 प्रतिशत। इसलिए काली हल्दी, पीली हल्दी के मुकाबले अधिक गुणकारी है। वे आजकल 5 एकड़ में काली हल्दी की खेती करके लाखों रूपये कमा रहे है। वहीं पूर्णिया जिले के समर सेल नेचुरल फार्म में 25 एकड़ में काली हल्दी की खेती की जा रही है।

बीमारियों में भी गुणकारी है काली हल्दी

चिकित्सकों के अनुसार काली हल्दी को पीली हल्दी से ज्यादा फायदेमंद और गुणकारी माना जाता है। इसके एंटी बायोटिक गुणों के कारण एक जड़ी बूटी माना गया है। काली हल्दी का इम्यूनिटी बुस्टर, मिर्गी, अस्थमा, सर्दी, खांसी, ब्लड प्रेशर, माइग्रेन, और सिरदर्द जैसी बीमारियों में उपयोग होता है। काली हल्दी की मांग कैंसर अस्पतालों में भी होती हैं। चिकित्सकों के अनुसार काली हल्दी में करक्यूमिन नामक तत्व पाया जाता है, जो एंटी-कैंसर होता है। इसी कारण शरीर में कैंसर के सेल्स बढ़ते या पनपते नहीं है।

इस हल्दी में इनुप्रोकेन पाया जाता है, जो जोड़ों का दर्द में ठीक करने में सहायक है। काली हल्दी का चूर्ण ताजे दूध में भिगोकर चेहरे और शरीर पर लेप करने से सौंदर्य निखरता है व त्वचा की खुजली ठीक हो जाती है। इसके अलावा, लीवर में जमा टॉक्सिक को बाहर निकालने में काली हल्दी मदद करती है। इस हल्दी का तेल भी बनाया जाता है जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में काम आता है।

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