Guru Nanak Gurpurab: कैसा था गुरु नानकदेव के समय का भारत और विश्व?
Guru Nanak Gurpurab: कैसा था गुरु नानकदेव के समय का भारत और विश्व?
गुरुनानक का जन्म कार्तिक पूर्णिमा संवत 1526 यानि नवम्बर 1462 में लाहौर से 65 किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम में तलवंडी में हुआ था। आज यह स्थान ननकाना साहिब के नाम से प्रसिद्ध है। हालाँकि, चार जन्म सखियों, विलायतवाली, मेहरबानवाली, भाई मनीसिंह वाली और खालसा समाचार में उनकी जन्मतिथि 15 अप्रैल 1469 बताई गयी है। मगर सर्वाधिक रूप से प्रचलित तिथि नवम्बर 1462 ही है। गुरुनानक देव के पिता, मेहता कालूचंद, किसी गांव में पटवारी थे। गुरुनानक देव ने एक ब्राहमण से हिसाब और बही-खाते का काम सीखा और एक मौलवी से फारसी एवं अरबी भाषा सीखी।

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उन्हें अपने पिता की नौकरी अथवा पारिवारिक व्यावसायिक पेशे से अधिक लगाव नहीं था। शादी के बाद, गुरुनानक देव की बहन नानकी उन्हें अपने साथ कपूरथला के पास सुल्तानपुर में अपने घर ले गयी। जहाँ गुरुनानक देव, दौलतखान लोदी के सरकारी मोदीखाने में भंडारी का काम देखने लगे। मोदीखाने का काम उन्होंने ईमानदारी के साथ किया लेकिन उनका मन मानवता की सेवा में अधिक था।
गुरुनानक देव के जीवनकाल को तीन हिस्सों में बाँट सकते है - पहला, शुरूआती 27 वर्षों का गृहस्थ और ज्ञान प्राप्ति का कालखंड; दूसरा, अगले 25 वर्षों तक देश-दुनिया का भ्रमण और अपने विचारों की व्याख्या; और तीसरा, आखिरी 18 वर्षों का जीवन जो उन्होंने रावी नदी के किनारे करतारपुर में बिताया।
गुरुनानक देव के समय देश-दुनिया में क्या हो रहा था
गुरुनानक देव का जीवन काल युगांतरकारी था। इस समय, 1485 में इंग्लैण्ड में ट्यूडर राजवंश की स्थापना हुई और पूरे यूरोप में आधुनिक युग की शुरुआत हुई। वहां इसे पुनर्जागरण अर्थात रेनेसां, समुद्री अभियानों और धार्मिक सुधारों का युग कहा गया है।
इंग्लैण्ड में कोलेट ने 1510 में सैंट पॉल के ग्रामर स्कूल की स्थापना की। 1516 में ऑक्सफोर्ड में कॉर्पस खिस्ती कॉलेज खोला गया जिसमें यूनानी भाषा पढ़ाने के लिए यूनान से शिक्षक बुलाये गए। इसी प्रकार, 1492 में क्रिस्टोफ़र कोलम्बस ने अमेरिका और वास्को डी गामा ने भारत के समुद्री अभियानों का नेतृत्व किया। मार्टिन लूथर ने जर्मनी में 1517 में धार्मिक सुधारों की पहल की, जिससे ईसाईयों में प्रोटेस्टेंट विचारों की शुरुआत हुई।
भारत में भी, गुरुनानक देव के समकालीन कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम एक साथ हो रहे थे। इस दौरान, भारत में भक्ति आन्दोलन अपने उत्कर्ष पर था। उनके समकालीन संतों में चार प्रमुख नाम थे - बल्लभाचार्य (1449 में जन्म) जिनके अनुयायी गुजरात और राजस्थान में थे; चैतन्य महाप्रभु (1486 में जन्म) जिनका प्रभाव बंगाल में था; मीराबाई (1449 में जन्म) जिनके द्वारा रचे गए भगवान कृष्ण के भजन आज भी लोकप्रिय है; और, गोस्वामी तुलसीदास (1532 में जन्म) जिनकी रचना 'रामचरितमानस' आज भी संसार का सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला महाकाव्य है।
उस दौर में दिल्ली की सत्ता में क्या हलचल थी?
गुरुनानक देव के कालखंड में भारतीय इतिहास एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा था। इस दौरान दिल्ली की सल्तनत में एक बड़ा परिवर्तन भी देखने को मिलता है। दरअसल, गुरुनानक देव के जन्म के समय उत्तर भारत में बहलोल लोदी (1451 से 1489 तक) का शासन था। जब गुरुनानक देव 20 वर्ष के थे, तब सिकंदर लोदी (1489 से 1517 तक) को दिल्ली सल्तनत की कमान मिली। इसके बाद इब्राहीम लोदी (1517 से 1526 तक) इस वंश का आखिरी उत्तराधिकारी बना। गुरु नानक के जीवन में ही 1526 में बाबर ने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी और उन्ही के समय हुमायूँ, मुगल वंश का दूसरा शासक बना।
समकालीन स्थितियों पर गुरुनानक देव की वाणी
गुरुनानक देव के दौरान, इस्लाम धर्म में अवनति का क्रम शुरू हो गया था। वहीं हिन्दुओं में भी धार्मिक रूप से चेतना की कमी आने लगी। जाति व्यवस्था ने जोर पकड़ना शुरू किया और कई उपजातियां बनने लगी थी। इन बदलावों पर गुरुनानक देव ने दुख प्रकट करते हुए कहा था, जिसका हिंदी भावार्थ इस प्रकार है, "हिन्दू का पुत्र हिन्दू कहलाया, धारण किया पवित्र जनेऊ। धारण किया पर पाप न रोका, फिर क्यों हुआ पवित्र। मुसलमान, धर्म पर गर्व करे, बिना गुरु सद्मार्ग न पावे, भटके घुप्प अँधेरे में, बिना किये सतकार्य वही, क्यों जाए फिर जन्नत में?"
भारत की तत्कालीन राजनैतिक व्यवस्था को भी गुरुनानक देव ने उजागर करते हुए लिखा है, "कोई ऐसा नहीं है जो घूस लेता या देता न हो। बादशाह की जब तक मुट्ठी गर्म न हो, वह न्याय नहीं सुनता।"
1521 में मुगल आक्रमणकारियों ने आम जनता के साथ जो व्यवहार किया उसे भी गुरुनानक देव ने अपनी आँखों से स्वयं देखा था। जब बाबर, हिंदुस्तान पर हमलें की तैयारी में था, तब गुरुनानक देव अफगानिस्तान में थे और मुस्लिम देशों की यात्रा से लौट रहे थे। रास्ते में उन्होंने जो कुछ देखा उसका वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है (हिंदी भावार्थ), "खुरासान की तुमने रक्षा की और हिंदुस्तान का दिल भयभीत कर दिया, पर हे परम निर्माता, फिर भी तुम निर्लिप्त क्यों हो? मुगल बाबर के रूप में तुमने स्वयं यम को भेजा है। भयानक कत्लेआम ने, लोगों के शोकाकुल ऊँचे स्वरों ने, क्या तेरे मन में किंचितमात्र दया नहीं उपजायी, मेरे दाता?"
इस दौरान महिलाओं की दुर्दशा का वर्णन गुरु नानक देव ने इस प्रकार किया है (हिंदी भावार्थ), "प्रिय सिरों को आच्छादित करने वाले केश जिनके बीचोंबीच सिंदूर रेखा होती थी, अब निर्मम कैंची से कतर दिए गए। महलों में सुख से रहने वाली बहुएं, सड़कों पर भीख मांग रही है, उनका कोई शरणस्थल आज नहीं. हे महिमामय, धन्य हो तुम, कौन जान सका तुम्हारी लीलाओं को? तुम्हारी माया अपरम्पार है प्रभो!"
वे आगे कहते है, "अब गलों में रस्सी बांधे, इन्हें (महिलाओं को) पशुवत खींचा जा रहा आज। गले की माला टूट गयी, बिखरे मोती; सौंदर्य, धन इनका सबसे कटु शत्रु; बर्बर सैनिकों ने बनाया बंदी इन्हें, और अस्मत लूटी।"
धार्मिक कुरीतियों पर गुरु नानकदेव के विचार
गुरुनानक देव ने न सिर्फ हिन्दुओं को बल्कि मुसलमानों को भी अपनी वाणियों से प्रभावित किया था। उन्होंने मुसलमानों की नमाज का महत्व इस प्रकार वर्णित किया है, "पहली नमाज सच के नाम से पढ़ों; दूसरी पढ़ों कि रोटी तेरी नेकी की हो; तीसरी नमाज अल्लाह के नाम पर दान के लिए; चौथी दिल की साफगोई के लिए; पांचवी खुदा की याद और इबादत के लिए। नेक कामों का कलमा पढ़ों; नानक कहते है, पाखंड झूठा बनाता इंसान को, याद रखो।"
गुरुनानक देव ने हिन्दुओं में सामाजिक समरसता को भी बढ़ावा दिया। उन्होंने निम्न वर्ग समझे जाने वाले लोगों के साथ भोजन किया। सैय्यदपुर में वे एक गरीब बढई लालो के साथ ठहरे और खाना खाया। मुफ्त भोजनालय यानि लंगर चलाने की शुरुआत भी उन्होंने की, जहाँ जाति, धर्म, विश्वास और ओहदे का ध्यान न रखकर सभी को भोजन मिल सके।
देश-दुनिया का भ्रमण
गुरुनानक देव ने पांच व्यवस्थाओं पर अधिक बल दिया - (1) नाम स्मरण, (2) दान, (3) स्नान, (4) सेवा, और (5) भजन अथवा स्तुति। ज्ञान की प्राप्ति के बाद गुरुनानक देव ने भंडारी की अपनी नौकरी छोड़ दी और अपने पवित्र उद्देश्य के लिए देश-दुनिया की यात्रायें शुरू कर दी। उन्होंने चार मुख्य यात्राएँ की।
सबसे पहले 1497 से 1509 तक पूर्वी भारत में रहे। इस काल में उन्होंने हिन्दू तीर्थस्थानों का भ्रमण किया। फिर 1510 से 1515 तक श्रीलंका सहित दक्षिण भारत की यात्रा की। वर्ष 1515 से 1517 तक की अवधि में उन्होंने हिमालय की ओर रुख किया। वे योगियों और सिद्धों के केंद्र, तिब्बत में मानसरोवर तक गए। इस दौरान उनका शैव मत के गुरु गोरखनाथ और गुरु मछेंद्रनाथ के कई अनुयायियों से संपर्क हुआ। वर्ष 1517 से 1521 तक गुरुनानक देव ने पश्चिम में मुस्लिम देशों का दौरा किया। इस बार उनके साथ भाई मर्दाना भी साथ थे। अपनी इस यात्रा में वे तत्कालीन मुस्लिम खलीफा की राजधानी बगदाद तक गए थे।
करतारपुर में निधन
अपनी मृत्यु से पहले गुरुनानक देव ने अपने अनुयायी, भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया। एक समारोह में उन्होंने, भाई लहना के सामने एक नारियल और पांच पैसे रखे, अपना सर उसके पैरों से छुवाया और उन्हें अंगद के नाम से संबोधित किया. इस प्रकार उन्होंने गुरुपद की स्थापना की।
गुरुनानक देव का देहावसान 22 सितम्बर 1539 को करतारपुर में हुआ। हिन्दू और मुसलमानों ने उनसे इतना प्रेम किया कि उनके बारे में कहा गया, "गुरुनानक शाह फकीर, हिन्दू का गुरु, मुसलमान का पीर।"
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