Pakistan को Putin ने दिखाई औकात, चकनाचूर किया Munir का सपना, क्यों कैंसिल की 'JF-17 Jet Engine Deal'?
Pakistan Jet Engine: पाकिस्तान को चीन से मिले JF-17 Thunder फाइटर जेट को लंबे समय से एक किफायती और प्रभावी मल्टीरोल फाइटर जेट बताया जाता रहा है। लेकिन इसके सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक, RD-93 टर्बोफैन इंजन, में बार-बार समस्या सामने आ रही थी। जिसके लिए पहले पाकिस्तान ने हमेशा की तरह चीन का मुंह देखा। लेकिन जिनपिंग ने हाथ खड़े कर दिए। इसके बाद पाक ने रूस से मदद मांगी, रूस पहले घुमाता रहा लेकिन अब ने साफ कर दिया कि वह इस इंजन के लिए खरीदार देशों में मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) सर्विस सेंटर बनाने में मदद नहीं करेगा।
इसका मतलब यह है कि पाकिस्तान समेत वे सभी देश जो JF-17 का इस्तेमाल करते हैं या भविष्य में खरीद सकते हैं, उन्हें इंजन के रखरखाव और मरम्मत के लिए सीधे रूस की बजाय चीन-पाकिस्तान नेटवर्क पर निर्भर रहना होगा।

RD-93 इंजन आखिर है क्या?
RD-93 एक रूसी टर्बोफैन इंजन है, जिसे फेमस RD-33 इंजन के बेस पर बनाया गया था। RD-33 वही इंजन है जिसका इस्तेमाल MIG-29 जैसे फाइटर जेटों में किया जाता है। JF-17 Thunder के सभी प्रमुख वेरिएंट, जिनमें लेटेस्ट Block III वर्जन भी शामिल है, इसी RD-93 इंजन पर निर्भर हैं। यही कारण है कि इंजन सपोर्ट और रखरखाव इस पूरे कार्यक्रम की सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
रूस क्यों नहीं देना चाहता MRO सपोर्ट?
रूस की यह नीति कोई नई नहीं है। मॉस्को लंबे समय से RD-93 इंजन केवल चीन को व्यावसायिक समझौतों के तहत बेचता है। इन समझौतों में एंड-यूजर सर्टिफिकेट (End User Certificate) जैसी शर्तें शामिल होती हैं।
इन शर्तों के तहत चीन या कोई अन्य पक्ष रूस की इजाजत के बिना इंजन की टेक्नोलॉजी को किसी तीसरे देश को ट्रांसफर नहीं कर सकता और न ही स्वतंत्र रूप से उसको बनाकर एक्सपोर्ट कर सकता है। इसी वजह से रूस खरीदार देशों को सीधे OEM (Original Equipment Manufacturer) सपोर्ट या पूर्ण MRO इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध नहीं कराता।
पाक के सालों पुराने अरमानों पर फिरा पानी
पाकिस्तान JF-17 Thunder का सबसे बड़ा ऑपरेटर है। इसके बावजूद वह अपनी जमीन पर पूर्ण RD-93 इंजन ओवरहॉल सुविधा स्थापित करने के लिए रूस का सहयोग हासिल नहीं कर सका है।
कई सालों से इसके लिए कोशिश की, लेकिन रूस ने तकनीकी सहायता और पूरी MRO कैपेसिटी देने से लगातार इनकार किया। नतीजतन पाकिस्तान को इंजन सपोर्ट के लिए चीन और अपनी सीमित घरेलू क्षमताओं पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
सभी खरीदार देशों को भी झेलनी होगी यही समस्या
रूस की यह नीति केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। JF-17 के सभी तरह के इम्पोर्ट करने वाले कस्टमर पर भी यही नियम लागू होंगे। यदि कोई देश JF-17 खरीदता है, तो उसे इंजन रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल के लिए चीन-पाकिस्तान इकोसिस्टम पर निर्भर रहना पड़ेगा। उसे सीधे रूसी OEM सपोर्ट नहीं मिलेगा। इससे लंबी अवधि में लॉजिस्टिक्स और सपोर्ट से जुड़ी चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।
PAC कामरा ने बनाए कुछ घरेलू क्षमता
पाकिस्तान ने पूरी तरह हाथ पर हाथ रखकर इंतजार नहीं किया है। पाकिस्तान एरोनॉटिकल कॉम्प्लेक्स (PAC) कामरा में RD-93 इंजन के रखरखाव और मरम्मत से जुड़ी कुछ क्षमताएं विकसित की गई हैं। हालांकि इससे काम चलना तो दूर काम शुरू भी नहीं हो सकेगा। लिहाजा इतना पैसा खर्च करने के बावजूद पाकिस्तान के सामने चुनौती बनी हुई है।
भारत के साथ रिश्तों का भी हो सकता है असर
कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि रूस का यह रुख केवल व्यावसायिक कारणों से नहीं जुड़ा है, बल्कि इसके पीछे रणनीतिक सोच भी हो सकती है। रूस लंबे समय से भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार रहा है। ऐसे में मॉस्को अपनी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी, सेंसटिव टेक्नोलॉजी और दोस्ती के भरों को दाव पर नहीं लगा सकता। यही वजह है कि वह इंजन सपोर्ट को केवल चीन तक सीमित रखकर तीसरे देशों के कार्यक्रमों में सीधे शामिल होने से बचता है।
पाकिस्तान अब दूसरे रास्ते तलाश रहा है
इस स्थिति ने पाकिस्तान को अन्य विकल्पों पर विचार करने के लिए मजबूर किया है। रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान ने RD-33 और RD-93 इंजन परिवार के लिए यूक्रेनी ओवरहॉल एक्सपर्टीज की तरफ भी देखा है। लेकिन वहां से भी कोई मदद मिलती नहीं दिख रही है। फिलहाल पाकिस्तान बड़ी मुश्किल में है। इस मामले में न तो अमेरिका और न ही चीन उसकी मदद कर सकता है।
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