एक वो 13 एक ये 13 : गुजरात ने देश को सौंपा दूसरा ‘सरदार’
अहमदाबाद। 13 का आँकड़ा आते ही अटल बिहारी वाजपेयी बरबस ही याद आ जाते हैं। पहले 13 दिन की सरकार, फिर 13 महीने की सरकार। तेरह के तिकड़म को लेकर तरह-तरह की अटकलबाजियाँ उस समय भी लगाई गई थीं, लेकिन 13 दिन और 13 महीने सरकार चलाने वाले वाजपेयी ने फिर पाँच साल सरकार चलाई और गत 13 सितम्बर को फिर एक बार तेरह के तिकड़म पर लोगों ने अटकलबाजियाँ शुरू कर दीं, जब भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया।
तेरह के अंक की शुभाशुभता पर बहस एक अलग विषय है और यह बहस कई बार कई निर्णयों और निष्कर्षों पर पहुँची भी है और वो निर्णय और निष्कर्ष शुभ और अशुभ दोनों ही थे। इसीलिए तेरह का आँकड़ा नरेन्द्र मोदी को फलेगा या नहीं फलेगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन यह 13 तारीख भारतीय इतिहास, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और अहमदाबाद तथा गुजरात के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण और मायने रखती है।
सभी जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी इस समय गुजरात के मुख्यमंत्री हैं। उनकी जड़ जहाँ उत्तर गुजरात के मेहसाणा जिले के छोटे-से कस्बे वडनगर में है, वहीं तना गांधीनगर तथा अहमदाबाद में है, तो टहनियाँ द्वारका से लेकर गोधरा तक तथा अम्बाजी से लेकर सापुतारा तक फैली हुई हैं। इस प्रकार नरेन्द्र मोदी रूपी पेड़ गुजरात में फला-फूला है। यह गुजरात ही है, जिसने मोदी को तीसरी बार बहुमत दिया और उसी कारण मोदी आज राष्ट्र सेवा के लिए उपलब्ध बनाए गए हैं।
अब जबकि भारतीय जनता पार्टी ने 13 सितम्बर, 2013 को गुजरात के मुख्यमंत्री (कहीं और के नहीं) नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है। मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने का सीधा तात्पर्य यही है कि गुजरात अपने नरेन्द्र मोदी को राष्ट्र की सेवा के लिए राष्ट्र को समर्पित करने जा रहा है। 13 सितम्बर, 2013 के इस घटनाक्रम के चलते जेहन में 85 साल पुरानी एक और 13 तारीख उभर कर सामने आ रही है, जब गुजरात ने देश को वल्लभ के रूप में एक ‘सरदार' सौंपा था। उस दिन भी तारीख 13 ही थी और अब जबकि मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया है, तो उस दिन भी तारीख 13 ही थी और गुजरात ने इस बार नरेन्द्र मोदी के रूप में एक और ‘सरदार' सौंपा है। वल्लभ के रूप में सौंपे जाने के बाद ही वल्लभभाई पटेल देश के सरदार बने और गृह मंत्री के रूप में अखण्ड भारत के निर्माता बने।
चलिए आपको उस 13 तारीख की यात्रा भी कराए ही देते हैं।

सरदार देश को समर्पित
13 अप्रेल का दिन था वह। शायद हमारे इतिहास में इस तारीख को किसी यादगार प्रसंग के लिए याद नहीं किया जाता होगा, लेकिन यदि गुजरात के नजरिए से यह तारीख ऐतिहासिक दिन से कम नहीं है। यह वह इस है, जब बारह दरवाजों वाले अहमदाबाद शहर ने देश को ‘सरदार' सौंपा था। हालांकि इस शहर को भी यह इल्म नहीं था कि उसका ‘पहला नागरिक' वल्लभभाई पटेल यहां से निकल कर देश का ‘सरदार' बन जाएगा। कहना होगा कि यदि पटेल अहमदाबाद से रुखसद न होते, तो ‘सरदार' न होते।

और पटेल सरदार बन गए
जी हां! यहां बात 13 अप्रेल, 1928 की हो रही है। हमारे इतिहास में शायद ही इस तारीख और दिन को इतना महत्व दिया गया होगा, लेकिन अहमदाबाद के नजरिए से यह दिन कोई आम दिन नहीं था। यह वही दिन था, जब वल्लभभाई पटेल ने अहमदाबाद नगरपालिका के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था और बारडोली के लिए रवाना हुए थे। बारडोली सत्याग्रह को पटेल ने जो नेतृत्व प्रदान किया, उसने अंग्रेज सरकार को अचरज में डाल दिया। बारडोली के किसानों ने अपनी जीत का श्रेय अपने ‘सरदार' को दिया और यहीं से वल्लभभाई पटेल ‘सरदार पटेल' बन गए।

सुकून है गुजरात को
हमारे इतिहासकारों ने ज्यादातर शोध ‘सरदार पटेल' पर किए हैं, लेकिन एक आम व्यक्ति यानी ‘वल्लभभाई पटेल' के रूप में उनके योगदान का बहुत ज्यादा बखान नहीं मिलता। शायद इसीलिए 13 अप्रेल को किसी ऐतिहासिक दिन के रूप में याद नहीं किया जाता, लेकिन विचारणीय यह है कि यदि पटेल अहमदाबाद नगरपालिका का अध्यक्ष पद न छोड़ते, तो वे ‘सरदार' भी न होते। बारडोली सत्याग्रह को नेतृत्व देने के लिए जब उनकी जरूरत आन पड़ी, तो पटेल ने 13 अप्रेल, 1928 यानी ठीक पचासी साल पहले अहमदाबाद नगरपालिका का अध्यक्ष पद छोड़ा था। अहमदाबाद को पटेल की कमी शायद आज भी खलती होगी, लेकिन अहमदाबाद ही नहीं, समग्र गुजरात को सुकून इस बात का है कि उसने देश को पटेल नहीं, बल्कि सरदार सौंपा था।

नरेन्द्र मोदी छोटे सरदार
अब चर्चा नरेन्द्र मोदी की करें, तो वे भी गुजरात में छोटे सरदार के रूप में विख्यात हैं। गुजरात की राजनीति में सरदार पटेल का हमेशा दखल रहा है और मोदी के लिए राजनीति में ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत रूप से भी सरदार पटेल तथा स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुष उद्दीपक रहे हैं। सरदार पटेल के नाम पर मोदी अक्सर कांग्रेस को आड़े हाथ लेने से भी नहीं चूकते। अपनी सख्त कार्यशैली के चलते उन्हें सरदार पटेल के पर्याय के रूप में देखा जाता है और इसी कारण उनके समर्थक उन्हें छोटे सरदार के नाम से भी पुकारते हैं।

तो मोदी बनेंगे प्रधानमंत्री?
अहमदाबाद-गुजरात ने 13 तारीख के दिन वल्लभभाई पटेल को राष्ट्र सेवा में समर्पित किया था और वही वल्लभभाई पटेल बारडोली सत्याग्रह के बाद वल्लभ से सरदार बन गए थे। यदि 13 तारीख के उसी संयोग को आज के हालात से जोड़ा जाए, तो स्पष्ट है कि गुजरात ने नरेन्द्र मोदी को राष्ट्र सेवा में समर्पित किया है, तो क्या मोदी प्रधानमंत्री बन सकेंगे। अब यह सवाल सबके जेहन में है, लेकिन इसका उत्तर मई 2014 से पहले शायद नहीं मिलेगा।












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