Surrogacy in Islam: इस्लामिक देशों में सरोगेसी पर बढ़ता विवाद
सरोगेसी के जरिए बच्चा पैदा करना, अब दुनिया में आम बात है। पर अभी भी इस्लाम में आस्था रखने वाले इस वैज्ञानिक तरीके को खुलेआम अपनाने से परहेज करते हैं। इस्लामिक देशों में सरोगेसी को लेकर बहुत सारी पाबंदियां है। लेकिन अब अमीराती डॉक्टरों ने इस्लाम के विद्वानों से सरोगेसी को अपनाने के लिए फतवा जारी करने का आह्वान किया है। यानि सरोगेसी को इस्लामिक कानून में भी जायज ठहराने का अनुरोध किया है।
यूएई सरकार द्वारा देश में सरोगेसी की अनुमति देने के लिए अपने कानूनों में बदलाव के कुछ ही हफ्तों बाद, एक अमीराती डॉक्टर ने इस्लामी विद्वानों से इस प्रथा को इस्लामी दृष्टिकोण से वैध बनाने के लिए फतवा पारित करने का आह्वान किया है। सरोगेसी वह प्रक्रिया है जिसमें एक महिला किसी जोड़े या व्यक्ति के बच्चे को जन्म देती है।

सरोगेसी को लेकर इस्लाम में कई अवधारणाएं
सरोगेसी को लेकर इस्लाम में कई तरह की अवधारणाएं हैं। सुन्नी मुसलमानों के विद्वानों का कहना है कि इस्लाम में सरोगेसी की अनुमति नहीं है, क्योंकि इसमें बच्चे को गर्भ धारण करने के लिए तीसरे पक्ष का उपयोग शामिल है, जिसे प्रजनन के प्राकृतिक क्रम का उल्लंघन होता है। इसके अतिरिक्त, इससे वंश और विरासत के मुद्दे भी पैदा हो सकते हैं। जबकि शिया मुसलामानों में सरोगेसी के प्रति सकारात्मक नजरिया है। कुछ प्रमुख शिया विद्वानों के अनुसार सरोगेसी स्वीकार्य है, क्योंकि इसमें कोई पापपूर्ण कार्य शामिल नहीं है और यह पारिवारिक नींव को बनाए रखने के लिए किया जाता है।
मुसलमानों से वैज्ञानिक नजरिया अपनाने की अपील
इसी क्रम में 8 नवंबर को यूएई काउंसिल फॉर फतवा के दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए डॉ. महा तैसिर बराकत ने दुनिया भर के 160 से अधिक विद्वानों, वैज्ञानिकों और बौद्धिक हस्तियों के सामने सरोगेसी को एक विज्ञान के रूप में अपनाने का निवेदन किया। उन्होंने कहा कि यह समझना जरूरी है कि सरोगेट मां बच्चे को पौष्टिक और जीवनदायी वातावरण प्रदान करती है।
यह उस महिला के समान है जो किसी अन्य महिला के बच्चे को स्तनपान कराती है जिसका स्तन से दूध नहीं उतरता। उन्होंने बताया कि कैसे अंडे और शुक्राणु को नियंत्रित वातावरण में निषेचित किया जाता है और फिर दूसरी महिला के गर्भ में प्रत्यारोपित किया जाता है। यानि सरोगेट मां बच्चे की आनुवंशिक संरचना को नहीं बदल सकती। इसलिए वंश में किसी बदलाव की गुंजाइश नहीं है।
यूएई ने किया बदलाव
उल्लेखनीय है कि संयुक्त अरब अमीरात ने पिछले दिनों सरोगेट कानून में कई बदलाव किए हैं। संघीय डिक्री कानून संख्या 17 में सात संशोधनों के जरिए कानून ने प्रजनन तकनीकों में बदलाव को मंजूरी दे दी। अब संयुक्त अरब अमीरात में विवाह प्रमाण पत्र के बिना गैर-मुस्लिम पक्षों के लिए चिकित्सकीय सहायता प्राप्त प्रजनन तकनीक (आईवीएफ) का सहयोग लेना, सरोगेसी की अनुमति देना और अविवाहित जोड़ों को निषेचन और प्रत्यारोपण प्रक्रियाओं की अनुमति देना शामिल है।
संयुक्त अरब अमीरात में 90 प्रतिशत जनसंख्या सुन्नी मुस्लिमों की है। डॉ. बराकत ने एक मीडिया इंटरव्यू में बताया कि इस्लामी दुनिया को इस विज्ञान के बारे में समझना होगा। उन्होंने दर्शकों को यह भी आगाह किया कि प्राकृतिक और कृत्रिम गर्भ को किराये पर देने की प्रक्रिया एक नया उभरता हुआ मुद्दा है, और इससे संबंधित शरिया के फैसले पर गौर करना जरूरी है, क्योंकि यह एक वास्तविक मुद्दा बन गया है। यह सोचना होगा कि उन महिलाओं के लिए सरोगेसी की सुविधा कैसे दी जाए, जिनके पास सरोगेट मां नहीं होने तक कभी बच्चे नहीं होंगे, इस पर एक समझौते पर पहुंचने के लिए बहस और चर्चा की जरूरत है। सरोगेट मां कभी भी बच्चे का वंश नहीं बदल सकती हैं।
इस्लाम में क्या जायज क्या नाजायज
इस्लामी कानून के अनुसार भी एक वेट-नर्स या वह महिला जिसने किसी ऐसे बच्चे को स्तनपान कराया है जो उससे संबंधित नहीं है, उसे दूसरी मां माना जाता है। फिर भी मुस्लिम देशों में सरोगेसी को लेकर कोई राय नहीं बन पाई है। मुस्लिम वर्ल्ड लीग से सम्बद्ध इस्लामिक फिकह काउंसिल ने पांच प्रकार के आईवीएफ को पूरी तरह से नाजायज घोषित किया है और सिर्फ दो को इस्लामी कानून के तहत जायज माना है।
नाजायज तरीके की आईवीएफ - पति के शुक्राणु और उसकी पत्नी के अलावा किसी अन्य महिला के अंडाणु द्वारा निषेचन। किसी महिला के डिंब का उसके पति के अलावा किसी अन्य पुरुष के शुक्राणु द्वारा निषेचन। पति के शुक्राणु और पत्नी के डिंब का निषेचन, जहां भ्रूण को सरोगेट मां के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है। बच्चे को गर्भ धारण करने का प्रयास करने वाले जोड़े के अलावा दो लोगों के शुक्राणु और डिंब द्वारा निषेचन।
दो प्रकार की कानूनी आईवीएफ प्रक्रियाएं इस प्रकार हैं: शरीर के बाहर पति के शुक्राणु और पत्नी के डिंब का उपयोग करके प्राप्त किया जाता है, जिसमें भ्रूण को पत्नी के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है। जब पति के शुक्राणु को यंत्रवत उसकी पत्नी के गर्भाशय में डाला जाता है, जिससे उसके शरीर के अंदर निषेचन की अनुमति मिलती है।
ईरान में सरोगेसी का है विकल्प
अस्सी के दशक से ही सरोगेसी शरीयत के दृष्टिकोण से एक विवादास्पद मुद्दा रहा है और अब भी बना हुआ है। अधिकांश मुस्लिम विद्वान सरोगेसी को गैरकानूनी यौन संबंध का एक रूप मानते हैं जिसे ज़िना कहा जाता है। 2003 में ईरान में सरोगेसी को एक कानूनी पद्धति के रूप में लागू किया। यदि अदालत ने किसी जोड़े का बांझपन साबित कर दिया है, तो वे अधिकृत क्लीनिकों से दवा और मदद ले सकते हैं।
कानूनों और विनियमों का पालन करते हुए, ये क्लीनिक जोड़े के शुक्राणु और अंडों को गर्भाशय के बाहर निषेचित कर सकते हैं और भ्रूण को दूसरे गर्भाशय में स्थानांतरित कर सकते हैं। इन बांझपन उपचार केंद्रों के पास दोनों पक्षों की लिखित सहमति होनी चाहिए। ईरानी संविधान के अनुसार, यदि कोई विवाहित जोड़ा सरोगेसी के माध्यम से बच्चा पैदा करना चाहता है, तो उन्हें अपना आवेदन तैयार करके अदालत में जमा करना होगा। यदि जोड़े की पात्रता सत्यापित हो जाती है तो न्यायाधीश उन्हें सरोगेसी के माध्यम से बच्चे पैदा करने की अनुमति देंगे। मालूम हो कि ईरान में शिया मुस्लिम बहुमत में हैं।
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