ECI Appointments: चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले विधेयक पर क्यों उठा विवाद, जानिए विस्तार से
ECI Appointments: बीते 10 अगस्त को केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) विधेयक, 2023 राज्यसभा में पेश किया। इस विधेयक के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों का चयन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय कमेटी करेगी। इस कमेटी में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत एक कैबिनेट मंत्री होंगे।

अगर लोकसभा में कोई नेता प्रतिपक्ष नहीं है, तो सदन में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता को नेता प्रतिपक्ष माना जाएगा। राज्यसभा में पेश इस विधेयक का विपक्षी पार्टियों ने विरोध किया है। अब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती थी।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, साल 2015 में सर्वोच्च न्यायालय में एक वकील अनूप बरनवाल द्वारा जनहित याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में यह कहा गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का अधिकार केंद्र सरकार के पास है, जो कि संविधान के अनुच्छेद 14 व अनुच्छेद 324 (2) का उल्लंघन है। इसी संबंध में एक अन्य याचिका भी सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र कमेटी बनाई जाए।
सर्वोच्च न्यायालय ने अक्टूबर 2018 में इस संबंध में दाखिल सभी याचिकाओं को इकट्ठा करते हुए इस मामले को संविधान पीठ को भेज दिया था। नवंबर 2022 में इन याचिकाओं पर सुनवाई पूरी की गई और फैसले को सुरक्षित रख लिया गया। मार्च 2023 में जस्टिस के.एम. जोसफ, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस सी.टी. रवि कुमार की संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों का चयन एक कमेटी द्वारा किया जाएगा।
इस कमेटी में प्रधानमंत्री, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष रहेंगे। इसके बाद, इन नामों पर अंतिम मुहर राष्ट्रपति लगाएंगे। अब केंद्र सरकार ने चुनाव आयुक्तों की चयन समिति में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल करने का फैसला किया है।
अदालत ने यह भी कहा था कि साल 2004 के बाद से किसी भी चुनाव आयुक्त ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है। यूपीए सरकार के 10 साल के कार्यकाल में छह मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए गये थे। जबकि मौजूदा एनडीए सरकार के कार्यकाल में भी सात मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए जा चुके हैं, जो कि चिंताजनक है। अदालत ने कहा कि जब तक संसद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित कोई कानून नहीं बना लेती, तब तक अदालत के फैसले के तहत ही नियुक्ति की जाएगी।
सरकार के नये विधेयक में क्या है?
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति के विचार हेतु पांच लोगों का एक पैनल सर्च कमेटी के रूप में तैयार किया जाएगा। सर्च कमेटी की अध्यक्षता कैबिनेट सचिव करेंगे। इस कमेटी में सचिव स्तर के दो सदस्य होंगे, जिन्हें चुनावी प्रक्रिया का अनुभव होगा। चयन समिति उन नामों पर भी विचार कर सकती है, जिन्हें सर्च समिति द्वारा तैयार पैनल में शामिल नहीं किया गया है।
इस विधेयक में यह प्रावधान किया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों का वेतन व भत्ता कैबिनेट सचिव के बराबर होगा और उनका पद भी कैबिनेट सचिव के स्तर का होगा। पहले चुनाव आयुक्तों का पद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर होता था।
1991 के अधिनियम के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य चुनाव आयुक्त छह साल की अवधि के लिए या 65 वर्ष की उम्र तक (जो भी पहले पूरा हो) पद पर बने रहेंगे। यदि किसी चुनाव आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया जाता है, तो उसका कुल कार्यकाल छह वर्ष से अधिक का नहीं हो सकता। यह विधेयक भी उसी कार्यकाल को बरकरार रखता है। साथ ही, इस विधेयक में यह भी कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य चुनाव आयुक्त पुनर्नियुक्ति के पात्र नहीं होंगे।
विधेयक में कहा गया है कि चुनाव आयोग का कामकाज सर्वसम्मति से संचालित किया जाएगा। अगर किसी भी मामले पर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद की स्थिति उत्पन्न होती है, तो इसका निर्णय बहुमत के आधार पर होगा। साथ ही, जो व्यक्ति केंद्र सरकार के सचिव के पद के बराबर होंगे, वे मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्त होने के पात्र होंगे। ऐसे व्यक्तियों की विशेषज्ञता चुनाव प्रबंधन और संचालन में होनी चाहिए।
चुनाव आयुक्तों की संख्या
संविधान में चुनाव आयुक्तों की संख्या की कोई सीमा निर्धारित नहीं की गई है। संविधान के अनुच्छेद 324 (2) के अनुसार चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त हो सकते हैं। यह पूरी तरह राष्ट्रपति पर निर्भर करता है कि चुनाव आयुक्तों की संख्या कितनी रखी जाएगी। चुनाव आयोग की स्थापना से लेकर 1989 तक इसमें सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त हुआ करते थे। 1989 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने दो अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को मंजूरी दे दी। इससे चुनाव आयोग बहु-सदस्यीय निकाय बन गया।
फिर 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने नियमों में संशोधन करके चुनाव आयोग को फिर से एक सदस्यीय निकाय बना दिया। अक्टूबर 1993 में नरसिम्हा राव की सरकार ने अध्यादेश लाकर दो और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को मंजूरी दे दी। तब से चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ-साथ दो अन्य चुनाव आयुक्त होते हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्तों की राजनीति में दिलचस्पी
देश के 11वें मुख्य चुनाव आयुक्त (1996-2001) डॉ. मनोहर सिंह गिल साल 2004 में कांग्रेस में शामिल हो गए और पार्टी ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य बना दिया। इसके बाद, 2010 में दूसरी बार वह राज्यसभा के लिए चुने गए और 2016 तक वह इस पद पर रहे। साल 2008 में गिल को खेल एवं युवा मामलों का मंत्री बनाया गया। 2010 में कॉमन वेल्थ गेम्स में भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के चलते साल 2011 में गिल को मंत्री पद से हटा दिया गया। इसी तरह देश के 16वें मुख्य चुनाव आयुक्त (2009-2010) नवीन चावला भी कांग्रेस पार्टी के करीबी ब्यूरोक्रेट थे और आपातकाल के दौरान उनकी जन विरोधी भूमिका पर जस्टिस जे.सी. शाह कमीशन ने गंभीर सवाल उठाए थे।
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