Municipal Corporation of Delhi: क्या है दिल्ली में नगरीय प्रशासन का इतिहास, कब से हो रहे हैं नगर निगम चुनाव?
Municipal Corporation of Delhi: नए परिसीमन के बाद भारत की राजधानी दिल्ली में दुनिया की तीसरे सबसे बड़े शहरी निकाय का गठन होने जा रहा हैं। 4 नवंबर 2022 को दिल्ली के चुनाव आयुक्त ने नए एकीकृत 250 सीटों वाली दिल्ली नगर निगम के लिए मतदान की तारीख 4 दिसंबर तय की है तथा चुनावों के परिणाम 7 दिसंबर को आएंगे।

दिल्ली नगरीय प्रशासन का इतिहास 1862 के बाद से ही अस्तित्व में आया। जब नगरीय प्रशासन के ढांचे की शुरुआत हुई, तब दिल्ली की जनसँख्या 1.21 लाख थी और शहर 520 हेक्टेयर तक फैला हुआ था। 1863 में दिल्ली के सदर बाज़ार से पहली बार जन्म और मृत्यु का पंजीकरण शुरू हुआ। जिसके लिए 1866 में नगरीय शासन के लिए 1.80 लाख रूपये से टाउन हॉल बनाया गया। 19वीं सदी के निगम में 21 मनोनीत सदस्य (5 सरकारी अधिकारी, 3 यूरोपीय, 5 हिंदू, 5 मुस्लिम और बाकि गैर सरकारी) थे।
1885 में हुआ पहला निगम चुनाव
1885 में दिल्ली नगर निगम चुनाव में व्यस्कों को प्रथम बार शामिल किया गया। 12 वार्डों के लिए 12 निर्वाचित, 4 सरकारी, 5 मनोनीत सदस्य थे।
दिल्ली में पहली बार कब लगा हाउस टैक्स
सफाई, सड़क निर्माण, पुलिस व्यवस्था व जल आपूर्ति हेतु धन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 1902 में पहली बार हाउस टैक्स लेने का प्रावधान रखा गया। 46 हज़ार संपत्तियों से कुल 85 हज़ार के आस-पास कर लिया गया। अन्य आय स्त्रोतों में चुंगी आदि कर थे।
दिल्ली बनी देश की राजधानी, निगम में हुआ बदलाव
वायसराय का महल व देश की राजधानी दिल्ली बनने की घोषणा 12 दिसंबर 1911 को हुई। जिसके बाद अंग्रेजी अधिकारियों ने आज के समय की नई दिल्ली के क्षेत्र को चुना। जहां वायसराय, अधिकारियों के लिए बंगले, संसद भवन, नॉर्थ ब्लाक, साउथ ब्लाक, उद्यान आदि का निर्माण किया गया।
अंग्रेज अधिकारियों की यह सोच रही कि नए व आधुनिक शहर में मौजूदा निगम की बजाए नए केन्द्र सरकार के अधीन निगम की आवश्यकता है, जिसके परिणामस्वरुप 25 मार्च 1913 को रायसीना नगर समिति (नई दिल्ली नगर निगम) का गठन हुआ।
स्वतंत्रता के बाद आया दिल्ली नगर निगम अस्तित्व में
स्वतंत्रता के तुरंत बाद विभाजन जैसी आपदा ने दिल्ली की आबादी को बढ़ा दिया था। जिसमें कई नई कॉलोनी बनी, जिसमें कई लोकल प्रशासन इकाईयों का गठन हुआ। जिसमें प्रमुख थे - वेस्ट दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी और साउथ म्युनिसिपल कमेटी।
इन कमेटियों का पहला चुनाव 1951 में हुआ, जिनमें 50 सदस्य निर्वाचित हुए। इसके बाद दिल्ली का एकीकृत नगर निगम अधिनियम संसद में पारित हुआ। दिल्ली नगर निगम अधिनियम 1957, आज से 64 साल पूर्व 7 अप्रैल 1958 को अस्तित्व में आया। दिल्ली की पहली महापौर अरुणा आसफ अली बनीं, जो स्वतंत्रता सेनानी थीं।
पहले नगर आयुक्त के रूप में पी.आर. नायक ने 7 अप्रैल, 1958 को अपना कार्यभार चांदनी चौक में स्थित ऐतिहासिक टाउन हॉल में संभाला। जिसके अधिकार में पानी, बिजली और परिवहन के उपक्रमों को रखा गया।
प्रथम पालिका चुनावों में कुल 80 पार्षद रहे, जिसमें 12 सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रही। आगे चलकर पार्षदों की संख्या 134 हुई और 2007 में 272 तक पहुचं गई।
दिल्ली नगर निगम अधिनियम 1957 को 17 सितंबर 1993 में संसद में पारित कर दिल्ली नगर निगम संशोधित अधिनियम 1993 द्वारा संशोधित किया गया।
निगम को शीला दीक्षित सरकार ने तीन टुकड़ों में किया विभाजित
2011 में शीला दीक्षित सरकार के समय नगरीय निकाय को तीन भागों (उत्तरी दिल्ली, दक्षिणी दिल्ली और पूर्वी दिल्ली नगर निगम) में विभाजित कर उत्तरी दिल्ली में 6 जोन, पूर्वी दिल्ली में 2 जोन और दक्षिणी दिल्ली में 4 जोन बनाये गये।
निगम विभाजन के समय उत्तरी नगर निगम में कुल जनसंख्या 53 लाख, पूर्वी नगर निगम में 32 लाख और दक्षिणी नगर निगम में 49 लाख थी।
निगम का अधिकार क्षेत्र
गृह कर, अंदरूनी सड़कें, स्ट्रीट लाइट, पार्कों का रखरखाव, सफाई, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, डिस्पेंसरी, कुछ अस्पताल, प्राइमरी स्कूल, शमशान घाट, कब्रिस्तान, होटल रेस्तरों को लाइसेंस आदि पर निगम का अधिकार है। अगर कोई घर या निर्माण होना है तो उसकी मंजूरी निगम से ही लेनी होती है, अगर किसी अवैध निर्माण या किसी सडक से अवैध अतिक्रमण हटाना है तो वह भी निगम की ही जिम्मेदारी होती है।
वहीं सड़क किनारे दुकानें आदि खोलने की मंजूरी, स्ट्रीट वेंडर को लाइसेंस, लावारिस पशु-पक्षी आदि विषय भी निगम के अधीन माने गए है। इसके अलावा बड़ी सड़कें, जो राज्य सरकार के अधीन हैं, उन पर सफाई कार्य आदि भी निगम ही करता है। जिसका भुगतान राज्य सरकार निगम को करती है।
गत पन्द्रह साल से दिल्ली नगर निगम में भाजपा सत्ता में है। 23 अप्रैल 2017 को हुए निगम चुनाव में 272 वार्डों में से 181 वार्डों में भाजपा पार्षदों का कब्ज़ा रहा, जबकि 48 आम आदमी पार्टी व 27 कांग्रेसी पार्षद रहें।
1 लाख 60 हजार कर्मचारियों वाले निगम में दिल्ली सरकार से फंड की समस्या और निगमों की खराब आर्थिक हालात के चलते 9 मार्च 2022 को केंद्र सरकार ने उपराज्यपाल को पत्र भेजकर मई 2022 को तीनों निगमों (उत्तरी, दक्षिणी और पूर्वी) का विलय कर एक कर दिया और वार्डों की संख्या 272 से कम करके 250 कर दी।
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