यहां दशहरे को जानते हैं खूनी दशहरे के नाम से

हमीरपुर। बुंदेलखंड के हमीरपुर जिले के सुमेरपुर क्षेत्र के विदोखर गांव में कोई 528 साल पूर्व हुए 'खूनी दशहरा' त्यौहार को लेकर हर साल चौबीस गांवों के ठाकुर राहिल देव मंदिर पर आकर उस अतीत को याद करते हैं, जब दशहरा के मौके पर सवा मन सोना लुटाया जाता था।

Hamirpur Dussehra

सैंकड़ों साल पुराना इतिहास

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के पन्ने पलटें तो विदोखर गांव में सैकड़ों साल पहले जिस तरह दशहरा में खून की होली खेली गई थी, उसे सुनकर हर किसी का दिल कांप उठेगा।

बताया जाता है कि 528 साल पहले उन्नाव के डोंडिया खेड़ा गांव से व्यापार के सिलसिले से ठाकुरों का एक बड़ा जत्था बैल-गाड़ियों व घोड़ों में सवार होकर हमीरपुर जिले के विदोखर से होते हुए आगे जा रहा था, तभी गांव में दक्षिण दिशा की ओर कुआं देख ठाकुरों का जत्था पानी पीने के लिए रुक गया था।

पानी भरने के दौरान घास-फूस गिर जाने से कुएं का पानी गंदा हो गया था। इसी बीच बगरी जाति के क्षत्रियों के बेटे नहाने के लिए पहुंचे तो कुएं के पानी में घास-फूस देख वे भड़क उठे।

उन्नाव के क्षत्रियों ने बहुत समझाया, मगर बगरी जाति के लड़के नहीं माने और उन सभी की जमकर पिटाई कर दी। जवान लड़कों के हाथों पिटने से आहत ठाकुरों ने सबक सिखने की प्रतिज्ञा ले ली और तभी जनसंहार का बीज पड़ गया।

हुई थी ठाकुरों से लड़ाई

व्यापार करने के इरादे से निकले ठाकुरों का जत्था वापस उन्नाव लौट गया। गुप्तचरों से इस गांव की सारी जानकारियां जुटाई गईं और दशहरा से पूर्व उन्नाव से रााहिल देव सिंह के नेतृत्व में वैश्य ठाकुरों की एक सेना हमीरपुर जिले

में प्रवेश कर गई। विदोखर गांव में हमला बोलने से पूर्व ठाकुरों की सेना सुमेरपुर क्षेत्र के इंगोहटा-छानी मार्ग के कल्ला गांव पर रुकी, फिर अगले दिन दशहरा के दिन विदोखर में ठाकुरों ने धावा बोल दिया।

उन्नाव के ठाकुरों ने धावा बोला था तो उस समय विदोखर गांव के ठाकुर दशहरा त्यौहार पर शराब के नशे में चूर थे। कत्लेआम में सैकड़ों क्षत्रिय मारे गए। और तो और, उन्नाव के ठाकुरों की सेना का नेतृत्व कर रहे राहिल देव सिंह भी शहीद हो गए।

आज भी याद है लोगों को वह दिन

बुजुर्ग लोग बताते हैं कि विदोखर गांव में जनसंहार करने के बाद यहां बगरी जाति के क्षत्रियों पर हमला कर ठाकुरों ने चौबीस गांवों पर कब्जा कर लिया था।

विदोखर गांव में खूनी दशहरा का गवाह राहिल देव का मंदिर है जो घमासान युद्ध के बाद बनवाया गया था। कोई पांच दशक पहले हमीरपुर जिले के चौबीस गांवों के क्षत्रिय विदोखर गांव आकर मंदिर में एकत्रित होकर अनोखे ढंग से दशहरा पर्व मनाते थे।

इसी अवसर पर सवा मन सोना लुटाने की परंपरा भी थी, लेकिन समय बीतने के साथ परंपरा भी खत्म होती चली गई।

किसी जमाने में दशहरा पर्व देखने के लिए आसपास के लोगों की भीड़ भी विदोखर गांव में उमड़ती थी, जहां चौबीसी क्षेत्र के क्षत्रिय अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। इतना ही नहीं, नट भी शारीरिक सौष्ठव दिखाकर यहां के लोगों को भाव विभोर किया करते रहे हैं।

अब गुम हो गई परंपरा

बताया जाता है कि दो दशक पूर्व विदोखर गांव में रााहिल देव मंदिर में दशहरा के दिन चौबीसी क्षेत्र के ठाकुर एकत्रित होकर बैठक करते थे और आपसी लड़ाई-झगड़ों को निपटाते थे।

ब्राह्मणों को भी अच्छी भेंट दिए जाने की परंपरा थी, लेकिन अब यह बदलते हालातों में विलुप्त सी हो गई है।

विदोखर के बुजुर्ग गिरधारी लाल नामदेव ने बताया, "इस गांव का अतीत बड़ा ही ऐतिहासिक है। यहां दशहरा पर्व की धूम मचा करती थी। चौबीसी क्षेत्र के ठाकुरों की पूजा और कार्यक्रम को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ उमड़ती रही है लेकिन अब ये परंपराएं अतीत बनकर रह गई हैं।"

इस बुजुर्ग के पुत्र नवल नामदेव ने बताया कि हर साल गांव में राहिल देव मंदिर पर कार्यक्रम तो होते हैं, लेकिन बढ़ती महंगाई और लोगों के रुचि न लेने के कारण कार्यक्रम अब महज औपचारिकता बनकर रह गए हैं।

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