Bombay Blood Group: क्या है दुनिया के सबसे दुर्लभ ब्लड ग्रुप ‘बॉम्बे’ की पूरी कहानी
Bombay Blood Group: बीते रविवार (10 मार्च) को मुंबई के परेल में एक अनोखी सभा की बैठक हुई। अनोखी इसलिए कि इस सभा में दुर्लभ 'बॉम्बे ब्लड ग्रुप' वाले लगभग 50 लोग एक साथ आए थे।
इसमें न केवल असामान्य रक्त प्रकार वाले लोगों ने भाग लिया बल्कि उनके परिवार के सदस्यों ने भी भाग लिया था। यह जानने के लिए कि क्या उनके शरीर में मौजूद खून भी दुर्लभ 'बॉम्बे ब्लड ग्रुप' है।

अमेरिका की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के जर्नल में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में इस तरह का दुर्लभ ब्लड ग्रुप केवल 0.0004 प्रतिशत आबादी में पाया जाता है। भारत में 10,000 लोगों में से केवल 1 व्यक्ति का ब्लड ग्रुप बॉम्बे होता है। जबकि यूरोप में 1,000,000 में से 1 का होता है। इस रक्त फेनोटाइप की खोज सबसे पहले 1952 में बॉम्बे, भारत में डॉक्टर वाईएम भेंडे ने की थी। इसे एचएच (HH) रक्त प्रकार या दुर्लभ ABO रक्त समूह भी कहा जाता है।
बॉम्बे ब्लड ग्रुप एक दुर्लभ रक्त समूह है जिसमें एच एंटीजन की अनुपस्थिति और एंटी-एच एंटीबॉडी की उपस्थिति होती है। रक्त समूहन के समय, यह रक्त समूह H एंटीजन की अनुपस्थिति के कारण O रक्त समूह की नकल करता है, लेकिन क्रॉस मिलान के दौरान यह O समूह के रक्त के साथ असंगति दिखाता है। निदान की पुष्टि के लिए सीरम ग्रुपिंग या रिवर्स ग्रुपिंग आवश्यक है। इस रक्त समूह वाले मरीज केवल इस रक्त समूह वाले व्यक्ति से ही रक्त ले या दे सकते हैं।
क्यों पड़ा इसका नाम बॉम्बे ब्लड ग्रुप?
दुनिया में जितने भी ब्लड ग्रुप हैं वह अंग्रेजी वर्णमाला के हैं। जैसे- ए, बी, एबी और ओ। लेकिन बॉम्बे ब्लड ग्रुप का नाम बॉम्बे शहर पर रखा गया था जिसे हम वर्तमान समय में मुंबई के नाम से जानते हैं। डॉ. वाईएम भेंडे ने साल 1952 में इस ब्लड ग्रुप की खोज की तब मुंबई को बॉम्बे कहा जाता था। वैसे उस समय बॉम्बे ब्लड ग्रुप के सबसे ज्यादा मरीज तत्कालीन बॉम्बे में ही पाए जाते थे। क्योंकि अनुवांशिक होने के कारण यह एक से दूसरी पीढ़ी में पहुंच रहा है। स्थानांनतरण के कारण अब बॉम्बे ब्लड ग्रुप के लोग देश के अन्य हिस्सों में भी मिलते हैं।
बॉम्बे ब्लड ग्रुप में क्या है खास?
किसी भी इंसान के ब्लड में मौजूद रेड ब्लड सेल्स में शुगर मॉलिक्यूल्स होते हैं। इन शुगर मॉलिक्यूल्स से तय होता है कि व्यक्ति का ब्लड ग्रुप क्या होगा? लेकिन, बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले लोगों में शुगर मॉलिक्यूल्स नहीं बन पाते। इसलिए वे किसी भी ब्लड ग्रुप में नहीं आते हैं। इस ब्लड ग्रुप के लोगों के खून में मौजूद प्लाज्मा के अंदर एंटीबॉडी ए, बी और एच होता है।
इसलिए रेयर ब्लड ग्रुप होने के बावजूद भी यह बिल्कुल सामान्य जीवन जीते हैं। इस ब्लड ग्रुप के लोगों को शारीरिक तौर पर कोई परेशानी नहीं होती है। वैसे अक्सर देखा जाता है कि बॉम्बे ब्लड ग्रुप केवल नजदीकी खून के रिश्ते वाले लोगों में ही पाया जाता है। मुंबई में इस फेनोटाइप को रखने वाले केवल 0.01 प्रतिशत होंगे। यदि माता-पिता का ब्लड ग्रुप बॉम्बे है, तो संभावना है कि बच्चे का ब्लड ग्रुप भी एचएच होगा।
एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 140 करोड़ की जनसंख्या में बॉम्बे ब्लड ग्रुप के मात्र 400 लोग ही रजिस्टर्ड डोनर हैं। इसके ज्यादातर डोनर महाराष्ट्र के ही हैं। जबकि बीबीसी के एक लेख में बताया गया है कि संकल्प इंडिया फाउंडेशन से लगभग 250 डोनर जुड़े हैं जो वॉलंटियर की तरह काम करते हैं। जब किसी को ब्लड बैंक से खून नहीं मिल पाता तो वे उन डोनर से मदद लेते हैं।
कैसे लोगों में पाया जाता है यह ब्लड ग्रुप?
मेडिकल जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया में इस ग्रुप के लोग ज्यादा पाए जाते हैं। इसके पीछे वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट में तर्क दिया है कि यहां के कुछ इलाकों में सजातीय प्रजनन और करीबी समुदायों में विवाह से इस ग्रुप के रक्त वाले बच्चे होने की आशंका रहती है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका आदि के भी उन इलाकों में ऐसे रक्त वाले बच्चों का जन्म ज्यादा होता है, जहां एक ही वंश की किसी पीढ़ी या उसी पीढ़ी के दो युगल विवाह करते हैं।
आखिर यह ब्लड ग्रुप इतना दुर्लभ क्यों है?
इसका मुख्य कारण है कि यह ब्लड ग्रुप हजारों-लाखों लोगों में से किसी एक के पास होता है। वैसे इस ग्रुप के लोग खोजने में समस्या ये भी है कि ब्लड ग्रुप की सामान्य जांच में भी बॉम्बे ग्रुप का पता नहीं चल पाता। 'ओ' ब्लड ग्रुप से जुड़ा होने के कारण ज्यादातर लोग इसे ओ पॉजिटिव या निगेटिव मान लेते हैं। ऐसे में कई लोगों को पता ही नहीं होता कि वे बॉम्बे ग्रुप के हैं। खून चढ़ाने की जरूरत पड़ने पर ही इसका पता चलता है जब उनका ओ ब्लड ग्रुप मरीज के खून से मैच नहीं करता है। ऐसे हालात में इस ग्रुप के खून के लिए दूसरे देशों से भी संपर्क करना पड़ता है। क्योंकि, सामान्य ब्लड का ब्लड बैंक में या आसपास ही कोई डोनर मिल जाता है। जबकि बॉम्बे ब्लड ग्रुप में ऐसा नहीं होता है।
जब वियतनाम और म्यांमार पहुंचा 'भारतीय खून'
इसकी दुर्लभता के बारे में एक दो उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक नवंबर, 2018 में बॉम्बे ब्लड ग्रुप तब प्रकाश में आया था जब इसकी दो यूनिट भारत से म्यांमार भेजी गईं थी। दरअसल म्यांमार में एक महिला के दिल की सर्जरी होनी थी लेकिन उन्हें अपने देश में यह खून नहीं मिल पाया। तब म्यांमार के यांगून जनरल अस्पताल ने भारत में संकल्प इंडिया फाउंडेशन से संपर्क किया। यह फाउंडेशन बॉम्बे ब्लड रखने वाले ब्लड बैंक, डोनर्स और जरूरमंदों के बीच संपर्क बनाने का काम करता है। इस फाउंडेशन के जरिए दो यूनिट खून कूरियर से म्यांमार भेजी गईं। तब उस महिला की सफल सर्जरी हुई।
इसी तरह फरवरी, 2023 में मुंबई के दो लोग 28 दिन के वियतनामी बच्चे की मदद के लिए विमान से हजारों किलोमीटर दूर हनोई पहुंचे थे। हनोई के एक अस्पताल में भर्ती गंभीर रूप से बीमार बच्चे को दुर्लभ 'बॉम्बे रक्त समूह' की जरूरत थी, जो कि उस बच्चे का ब्लड ग्रुप था। इस नेक काम के लिए बच्चे के माता-पिता, अस्पताल और भारतीय दूतावास ने दोनों डोनर्स की बहुत तारीफ की थी।
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