नाम बदलकर कानपुर में नौकरी करते थे भगत सिंह
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। कनपुरिया यानी कानपुर का रहना वाला इस बात पर फख्र करता है कि उसके शहर का भगत सिंह और महान पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी जी से संबंध है। इसमें कोई शक नहीं कि इन दोनों शख्सियतों के चलते कानपुर वाले जितना चाहें गर्व कर सकते हैं। खास बात यह है कि भगत सिंह इस शहर में नाम बदलकर नौकरी करते थे।
कानपुर में प्रताप
भगत सिंह और विद्यार्थीजी एक दौर में कानपुर शहर के पीलखाना इलाके से छपने वाले ‘प्रताप' अखबार से जुड़े थे। ‘प्रताप' निर्भीक अखबार था।
खास रोल रहा
अंग्रेजों के खिलाफ चलाए जा रहे आंदोलन में उसकी बेहद खास भूमिका थी। ये विद्यार्जी का अखबार था। हालांकि वे उस तरह से अखबार के मालिक नहीं थे। वे तो मूल रूप से पत्रकार थे। उनकी लेखनी में बहुत ताकत थी। उन्हें पढ़ने के लिए सारा कानपुर इंतजार करता था।
1931 में फांसी
‘प्रताप' में भगत सिंह ने काफी समय तक काम किया। वे 1925 में प्रताप में नौकरी करने कानपुर गए थे। 1931 में तो उन्हें फांसी हो गई थी। खास बात यह है कि भगत सिंह ‘प्रताप‘ में नाम बदल कर काम करते थे। अखबार के दस्तावेजों में उनका नाम बलवन्त सिंह था। उसी नाम से उनकी खबरें भी प्रकाशित होती थी। ऐसा इसलिये क्योंकि वे क्रांतिकारी गतिविधियों में भी लिप्त थे।
इधर ही चंद्रशेखर आजाद, विद्यार्थी जी और भगत सिंह के बीच मुलाकातें होती थीं। ‘प्रताप' के दफ्तर के भीतर ही एक छोटे से कमरे में भगत सिंह रहते थे। कहते हैं कि विद्यार्थी जी ने प्रताप प्रेस में ही क्रांतिकारी साहित्य से संबंधित किताबों की एक लाइब्रेयरी भी बनाई।
हैरान-परेशान
भगत सिंह रामनारायण बाजार में भी रहे। जहां तक विद्यार्थी जी का संबंध है तो उनके नाम पर एक मेडिकल कालेज भी चल रहा है। पर भगत सिंह के नाम पर कानपुर में कोई जगह नहीं है। ये बात हैरान-परेशान जरूर करती है।
विद्यार्थी जी जीवन भर अन्याय और असमानता के खिलाफ लड़ते रहे अपनी लेखनी के माध्यम से। पर हैरानी देखिए कि जिस कानपुर शहर को वे अपना मानते थे वहां पर उनकी एक सिरफिऱे इंसान ने हत्या कर दी थी। उनकी मौत से बापू भी हिल गए थे। बहरहाल, कानुपर के इतिहास के पन्नों को जब भी खंगाला जाएगा तब विद्यार्थी जी का जिक्र भगत सिंह के साथ बड़े आदर के साथ होगा।













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