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Rani Lakshmibai: बाबा गंगादास, जिन्होंने किया रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम संस्कार, जानिए क्या हुआ था उस दिन?

साल 1918 में लंदन से प्रकाशित डी.वी. तहमनकर की पुस्तक 'द रानी ऑफ झांसी' के मुताबिक बाबा गंगादास, ग्वालियर के एक नामी संत थे। साल 1980 में श्याम नारायण सिन्हा अपनी पुस्तक 'रानी लक्ष्मीबाई ऑफ झांसी' में लिखते हैं, "घायल अवस्था में रानी लक्ष्मीबाई के सहयोगी उन्हें बाबा गंगादास की एक कुटिया में ले आये। साधू ने उन्हें पहचानकर पवित्र गंगाजल उनके मुंह में डाल दिया। रानी ने 'हर हर महादेव' बोला और अचेत हो गयी। थोड़ी देर बाद उनमें फिर से चेतना आई और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' बोलकर हमेशा के लिए दुनिया को छोड़ कर चली गयी।

Rani Lakshmibai

रानी लक्ष्मी बाई के अंतिम जीवन और बाबा गंगादास से जुड़ा यह किस्सा बहुत ही कम लोगों को पता है। अंग्रेजों ने रानी लक्ष्मीबाई को 'Joan of Arc' कहकर संबोधित किया था। दरअसल, जोन ऑफ आर्क एक फ्रांसीसी वीरांगना था जिन्होंने 15वीं शताब्दी में फ्रांस को बचाने के लिए अंग्रेजों से टक्कर ली थी। इसलिए आपको यह जानना चाहिए कि देश के लिए अपने जीवन का बलिदान करने वाली महान वीरांगना लक्ष्मीबाई के अंतिम समय में क्या हुआ?

क्या हुआ था अंतिम दिन?

उपन्यासकार वृन्दावनलाल वर्मा, साल 1946 में प्रकाशित अपने उपन्यास 'झांसी की रानी लक्ष्मीबाई' में रानी के अंतिम समय के विवरण इस प्रकार देते हैं -

रघुनाथ सिंह और रामचंद्र देशमुख, अंग्रेजों से युद्ध के दौरान रानी लक्ष्मीबाई के सहयोगी थे। रानी के घायल होने पर रघुनाथ सिंह ने देशमुख से कहा, 'एक क्षण का भी विलम्ब नहीं होना चाहिए। अपने घोड़े पर इनको होशियारी के साथ रखो और बाबा गंगादास की कुटी पर चलो। सूर्यास्त होने लगा है।'

रामचंद्र देशमुख का गला रुंधा हुआ था। बालक दामोदरराव अपनी माता के लिए चुपचाप रो रहा था। रामचंद्र ने पुचकार कर कहा, 'इनको दवा करेंगे, अच्छी हो जाएगी, रोओ मत।'

रघुनाथ ने रानी के एक विश्वस्त सैनिक से कहा, 'कमजोरी से काम और बिगड़ेगा। अंग्रेज अब भी मारते काटते दौड़-धूप कर रहे हैं। यदि आ गए तो रानी साहब की देह का क्या होगा?' इसके बाद उन्होंने आगे बढ़ने का इशारा किया। वे सब द्रुतगति से बाबा गंगादास की कुटी पर पहुंचे।

बिसूरते हुए बालक दामोदर को एक ओर बिठलाकर रामचंद्र ने अपनी वर्दी पर रानी को लिटाया और बचे हुए साफे के टुकड़े से उनके सिर के घाव को बांधा। युद्ध में वीरगति प्राप्त हो चुकी रानी की सहयोगी मुंदरबाई का शव भी वहीं रख दिया गया।

बाबा गंगादास ने पहचान लिया। बोले, 'सीता सावित्री के देश की पुत्री है ये।' रानी ने पानी के लिए मुंह खोला। बाबा गंगादास तुरंत गंगाजल ले आये। रानी को पिलाया। उनको कुछ चेत आया। मुंह से पीड़ित स्वर में धीरे से निकला, 'हर हर महादेव'। उनका चेहरा कष्ट के मारे बिलकुल पीला पड़ गया। अचेत हो गयी। बाबा ने मुंदर के मुंह में भी गंगाजल डाला।

बाबा गंगादास ने पश्चिम की ओर देखकर कहा, 'अभी कुछ प्रकाश है। परन्तु अधिक विलम्ब नहीं। थोड़ी दूर घास की गड्डी लगी हुई है। उसी पर चिता बनाओ।'

रानी फिर थोड़े चेत में आई। कम से कम रघुनाथ सिंह इत्यादि को तो यही जान पड़ा। दामोदरराव पास आ गया। उसको अवगत हुआ कि मां बच गयी और फिर खड़ी हो जायगी। उत्सुकता के साथ उनकी ओर टकटकी लगायी। रानी के मुंह से बहुत टूटे स्वर में निकला, 'ॐ वासुदेवायनमः'।

उसके उपरांत उनके मुंह से जो निकला वह अस्पष्ट था। होठ हिल रहे थे। वे कान लगाकर सुनने लगे। उनकी समझ में केवल तीन टूटे शब्द आये। '..द...ह..ति..नै...यं..पावकः.' मुख मंडल प्रदीप्त हो गया।

सूर्यास्त हुआ। प्रकाश का अरुण पुज्ज दिशा की भाल पर था। उसकी अनगिनत रेखाएं गगन में फैली हुई थी। देखमुख ने बिलख कर कहा, 'झाँसी का सूर्य अस्त हो गया।' रघुनाथ बिलख-बिलखकर रोने लगा। दामोदरराव ने चीत्कार किया।

बाबा गंगादास ने कहा, 'प्रकाश अनंत है। वह कण-कण को भासमान कर रहा है। फिर उदय होगा। फिर प्रत्यक कण मुखरित हो उठेगा।' बाबा गंगादास ने सचेत किया, 'झांसी की रानी के सिधार जाने को अस्त होना कहते हो? यह तुम्हारा मोह है! वह अस्त नहीं हुई है! वह अमर हो गयी। कायरता का त्याग करो। उस घास की गंजी पर इन दोनों देवियों के शवों का दाह-संस्कार करो। अंग्रेज इन लोगों की खोज में आते ही होंगे। शीघ्रता करो।'

वे दोनों संभले। देशमुख ने कहा, 'घास की गंजी बड़ी है?' बाबा गंगादास ने उत्तर दिया, 'गंजी तो छोटी सी है।' देशमुख कष्टपूर्ण स्वर में बोला, 'झांसी की रानी के दाह के लिए आज लकड़ी भी सुलभ नहीं! घास की अग्नि तो इन दोनों शवों को केवल झोंस देगी। सवेरे शत्रु इनके अर्धदग्ध शरीर देखेंगे, हसेंगे और शायद कही फेंक देंगे।'

बाबा ने सिर उठाकर अपनी कुटिया को देखा। बोले, 'इस कुटिया में काफी लकड़ी है। उधेड़ डालो, अंतेष्टि का आरम्भ करो।' रघुनाथ सिंह ने प्रार्थना की, 'आपकी कुटी की लकड़ी! आप एक कृपा करें तो!' बाबा ने पूछा, 'क्या?'
रघुनाथ सिंह ने उत्तर दिया, 'फिर से कुटी बनाने में आपको असुविधा होगी, इसलिए कुछ भेंट ग्रहण करली जावे।' बाबा मुस्कुराए बोले, 'यह लकड़ी मेरी नहीं है। जिन्होंने पहले दी थी वे फिर दे देंगे। देर मत करो। कुटिया को उधेड़ो।'

देखमुख ने कहा, 'उसमें रखा सामान बाहर निकाल लिया जाए।' बाबा भीतर से एक कम्बल, तुम्बी, चटाई और लंगीटी उठा लाये। बोले, 'बस और कुछ नहीं है। जल्दी करो।'

रानी लक्ष्मीबाई और मुंदर के शवों को बाहर रखकर, दामोदरदास को एक और बिठलाया। और वे तीनों सिपाही कुटी को उधेड़ने लग गए। बात की बात में कुटी को तोड़कर लकड़ी इकट्ठी कर ली।

गंजी की कुछ घास घोड़ों को डाल दी और कुछ से चिता का काम लिया। रानी का कंठा उतारकर दामोदरदास के पास रख दिया। मोतियों की छोटी कंठी उनके गले में रहने दी। उनका कवच और तवे भी। चिता चुनने के पश्चात् रानी लक्ष्मीबाई और मुन्दरबाई के शवों को देशमुख ने चिता पर रख दिया और अग्नि संस्कार कर दिया। अपनी और रघुनाथ की वर्दियां भी चिता पर रख दी। आधी घड़ी में चिता प्रज्वलित हो गयी। उस कुटी की भूमि पर रक्त बह गया था। उसको देखमुख ने धो डाला। परन्तु उन रक्तों की बूंदों ने पृथ्वी पर जो इतिहास लिखा था वह अमिट रहा।

समाधि का निर्माण और अंग्रेजों का टेलीग्राम
वृन्दावनलाल के अनुसार रानी का सिपाही गुलमोहम्मद वहीं रुका रहा और अन्य लोग वहां से चले गये। सुबह गुलमोहम्मद ने अंग्रेजों के आने से पहले वहां एक समाधि का निर्माण कर दिया उस पर कुछ फूल भी डाल दिए थे। साल 1865 में 1857 से जुड़े कुछ दस्तावेजों 'Extracts from Returnes of Papers Relative to the Mutiny in India' का अंग्रेजों ने प्रकाशन किया था। रानी के मरने की खबर ईस्ट इंडिया कंपनी ने अगले दिन यानी 18 जून को गवर्नरजनरल को भेजी।

jhanshi
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