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Asians in USA: अमेरिका में क्यों निशाने पर हैं एशियाई मूल के नागरिक

भारत और चीन सहित एशियन लोगों के खिलाफ भेदभाव और नस्लीय हिंसा की घटनाएं अमेरिका में लगातार बढ़ती जा रही हैं।

Asians in USA Why are citizens of Asian origin targeted in America?

Asians in USA: अमेरिका के कैलिफोर्निया में 22 जनवरी को चीनी न्यू ईयर का जश्न मना रहे लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग की गयी। मॉन्टेरी पार्क में हुई इस फायरिंग में दस लोगों की मौत हो गयी और कई लोगों की हालत नाजुक हैं। वहीं, इस नरसंहार के जिम्मेदार हमलावर ने भी खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली है।

हमलावर का नाम हू कैन ट्रान (Huu Can Tran) है, उसकी उम्र 72 साल थी। पुलिस पता लगाने की कोशिश कर रही है कि आखिर वारदात को अंजाम देने के पीछे क्या उद्देश्य था? गौरतलब है कि बीते कुछ सालों में अमेरिका में एशियन देशों (खासकर चीन और भारत) सहित अन्य देशों के लोगों के खिलाफ इस तरह की नस्लीय हिंसा की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं।

कोरोना महामारी के बाद से बढ़ी हिंसा

कोरोना महामारी आने के बाद से एशियाई लोगों के खिलाफ नस्लीय हिंसा के मामलों में तेजी दर्ज की गई है। द कन्वर्जन की एक रिपोर्ट के अनुसार, कोरोना महामारी के आने से पहले के 30 सालों में प्रतिवर्ष 7 के औसत से कुल 210 एंटी-एशियन हिंसक हमले हुए थे। वहीं, 2020 और 2021 में ऐसी 163 हिंसक घटनाएं सामने आई। जिनका औसत 81.5 प्रति वर्ष है। गौर करने वाली बात है कि ये नस्लीय हमले अमेरिका के सभी स्टेट्स में होते रहे हैं। जबकि अधिकांश मामले शहरी इलाकों में अधिक दर्ज किये गए हैं।

क्या एशियाई मूल के लोगों का जीवन मुश्किल में है

प्यू रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में रहने वाले एशियन-अमेरिकन लोगों ने माना है कि उनके खिलाफ नस्लीय हिंसा की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई हैं। वहीं, इन घटनाओं की वजह से बहुत से एशियन-अमेरिकन लोगों ने अपना डेली रूटीन तक बदल दिया है। इस रिपोर्ट में एशियाई मूल के लोगों के खिलाफ मौखिक उत्पीड़न, व्यापार करने से मना करने, ऑनलाइन गाली-गलौज, जानलेवा हमले और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने जैसे मामलों का जिक्र किया गया है।

क्यों निशाने पर हैं एशियाई-अमेरिकन?

कोरोना महामारी के प्रकोप से विश्व की महाशक्ति अमेरिका भी बच नहीं सका है। वहां पर भी महंगाई समेत तमाम चीजों ने लोगों में गुस्सा बढ़ाना शुरू कर दिया है और इस गुस्से का शिकार बन रहे हैं एशियाई लोग। दरअसल, कोरोना महामारी के बाद अमेरिका में अब मंदी की आहट सुनाई देने लगी है। अमेजन के मालिक जेफ बेजोस जैसे बड़े उद्योगपतियों ने बीते साल ही मंदी का इशारा कर दिया था। जिसके बाद से माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, अमेजन जैसी कई कंपनियों ने दुनियाभर में अपने कर्मचारियों की छंटनी की है। इन छंटनियों में अमेरिका के श्वेत नागरिक भी शामिल हैं।

दरअसल श्वेत अमेरिकी नागरिकों में एक धारणा घर कर चुकी है कि एशियाई मूल के लोगों की वजह से उनके लिए रोजगार के साधन कम हो रहे हैं। अमेरिका के जनसंख्या ब्यूरो के एक आंकड़े के मुताबिक, भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों की औसत आय एक लाख डॉलर से ज्यादा है। चीनी मूल के अमेरिकी नागरिकों की औसत आय भी करीब 69 हजार डॉलर है। वहीं, श्वेत अमेरिकी नागरिकों की औसत आय 59 हजार डॉलर के करीब है।

अमेरिकी श्वेत नागरिकों में बढ़ती असुरक्षा की भावना

यहां तक कि अमेरिका के श्वेत नागरिकों की तुलना में एशियाई देशों से आकर बसे लोगों की शिक्षा का स्तर भी कहीं ज्यादा है। आसान शब्दों में कहें, तो अमेरिका में कम से कम बैचलर डिग्री वाले भारतीय मूल के 70 फीसदी लोग हैं। वहीं, श्वेत अमेरिकियों में ये आंकड़ा महज 20 फीसदी है। कुल मिलाकर अमेरिकी श्वेत नागरिक अपनी बैचलर डिग्री भी पूरी नहीं कर पाते हैं। जिसका दोष वे एशियाई मूल के छात्रों पर लगाते हैं। इनका मानना है कि शिक्षा से लेकर रोजगार तक पर एशियाई मूल के लोगों का कब्जा होता जा रहा है।

हालांकि, इन तमाम कारणों से इतर जो सबसे बड़ा कारण है, वह है श्वेत वर्चस्व का खत्म होना। अमेरिकी संसद से लेकर बड़ी अमेरिकी कंपनियों के सीईओ जैसे पदों पर एशियाई मूल के लोगों का दबदबा बढ़ा है। जिसने अमेरिका में सैकड़ों सालों से जारी श्वेत वर्चस्व को हिलाकर रख दिया है। वहीं, अमेरिका में एशियाई मूल के लोगों की ओर से खरीदी जा रही प्रॉपर्टी या जमीनें भी एक कारण के तौर पर मानी जाती हैं।

2022 में मास शूटिंग का शिकार बने 762 लोग

गन वॉयलेंस आर्काइव नाम के एक गैर-सरकारी रिसर्च ग्रुप ने वर्ष 2022 में हुई मास शूटिंग का आंकड़ा जारी किया। इस ग्रुप के मुताबिक साल 2022 में मास शूटिंग के 735 मामले सामने आए थे। जिनमें 762 लोगों ने अपनी जान गंवाई और 2902 लोग घायल हुए थे। बीते साल हुई मास शूटिंग की इन घटनाओं में से 5 स्कूल या यूनिवर्सिटी में और 2 धार्मिक स्थानों पर हुई हैं। वहीं, 2021 में मास शूटिंग के 698 मामले सामने आए थे। जिनमें 705 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था।

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