Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

AFSPA: क्या है अफस्पा कानून, क्यों उठते हैं इस पर विवाद?

AFSPA: गृह मंत्री अमित शाह ने बयान दिया है कि अब जम्मू कश्मीर से भी अफस्पा (AFSPA) यानी सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम को हटा लिया जाएगा। इसके पहले पूर्वोत्तर के राज्यों से भी केंद्र सरकार ने इसे कई चरणों में हटाया था।

जहां से भी इस अफस्पा कानून (एएफएसपीए) को हटाया गया है वहाँ के लोगों ने राहत की सांस ली है और ईश्वर को धन्यवाद दिया है। क्या है यह सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम और क्यों इसे लेकर लोगों में दहशत रहती है, आखिर कब और किन परिस्थितियों में इसे लागू किया जाता है। प्रस्तुत है एक विश्लेषण।

AFSPA

कहां लागू होता है यह कानून

सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम की उत्पति 1958 में हुई जब संयुक्त असम में विद्रोह हुआ था। यह कानून राज्य सरकार के अनुरोध पर किसी अशांत क्षेत्र में लागू किया जाता है। इस कानून के तहत शांति और व्यवस्था बहाल करने के लिए सशस्त्र बलों की तैनाती की जाती है। देखा जाए तो यह हिंसक राजनीतिक आंदोलन से पार पाने के लिए की गई सैन्य व्यवस्था है।

अफस्पा (एएफएसपीए) के तहत सशस्त्र बलों को वहाँ तैनात किया जाता है जहां स्थिति पहले से ही खराब है और इसे नियंत्रित करने के लिए सेना की जरूरत है। इसका मतलब यह भी है कि राष्ट्र विरोधी तत्वों और असामाजिक तत्वों का क्षेत्र पर पहले से ही कब्जा है।

सेना को लेकर भ्रम

सेना को काम करने के लिए अफस्पा के तहत कुछ ऐसी कानूनी सुरक्षा प्रदान की जाती है जो आमतौर पर पुलिस के पास नहीं होती, यानी गिरफ्तार करने और तलाशी लेने की शक्ति। यह एक भ्रांति है कि अफस्पा के तहत सेना को अपनी मनमर्जी करने की खुली छूट दी जाती है। सेना केवल केंद्र सरकार की अनुमति से ही काम करती है। सेना को झूठे आरोपों में गिरफ्तार होने के डर के बिना अपना काम करने के लिए ऐसी सुरक्षा की आवश्यकता होती है।

सेना के खिलाफ राष्ट्रविरोधी तत्व अक्सर यह प्रोपेगेंडा करते हैं कि सेना के जवानों ने किसी के साथ बलात्कार किया है या उसकी हत्या कर दी है। उनका मकसद भीड़ को उत्तेजित करना होता है। ऐसे कई उदाहरण हैं जब सेना पर आरोप लगाकर बड़े पैमाने पर दंगे कराए गए। पुलिस स्टेशन में सेना के खिलाफ दर्ज होने वाले आरोपों में ज्यादातर बेबुनियाद निकलते हैं।

अफस्पा केवल किसी आरोपित सेना के जवान या ऑफिसर को केवल तत्काल गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान करता है, आरोपों की जांच से नहीं। कई बार दोषी पाए जाने पर दोषियों के कोर्ट मार्शल भी हुए हैं। भारतीय सेना मानव अधिकारों के उल्लंघन के दोषियों को किसी आपराधिक अदालत की तुलना में सख्ती से और कहीं अधिक तेजी से दंडित करती है।

असम से शुरू हुआ इस कानून का सफर

सबसे पहले 1948 में सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम लागू किया गया, लेकिन 1957 में इसे निरस्त कर दिया गया था। लेकिन बदली परिस्थतियों में केवल एक वर्ष बाद ही इसे पुनर्जीवित कर दिया गया। 1958 में एकीकृत असम में तेजी से स्थिति बिगड़ी और आंतरिक सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो गया। तब असम और मणिपुर की नागा पहाड़ियों में रहने वाले लोगों ने अपने क्षेत्र के भारत में विलय का विरोध किया था। भारत के विरुद्ध हिंसक विद्रोह शुरू हो गया था।

केंद्र सरकार ने विद्रोह को दबाने और क्षेत्र में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए सेना भेजी और उसी समय भारत के राष्ट्रपति ने सशस्त्र बल (असम और मणिपुर) विशेष अधिकार अध्यादेश पारित किया। 1958 में सशस्त्र बलों को 'विशेष शक्तियां' प्रदान करने के साथ-साथ उन्हें कार्य करने के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करने के लिए 18 अगस्त, 1958 को संसद के मानसून सत्र में एक विधेयक पेश किया गया। 11 सितंबर, 1958 को यह क़ानून लागू हुआ और उसे सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम AFSPA नाम दिया गया।

सशस्त्र बलों को प्राप्त अधिकार

अफस्पा लागू होने वाले क्षेत्र में सेना के आदेशों की अवहेलना करने वाले किसी भी व्यक्ति पर गोली चलाना या अन्य बल प्रयोग करना अधिकार में शामिल है, भले ही किसी की मृत्यु भी हो जाए। सेना एएफएसपीए के तहत गैरकानूनी जमावड़े के खिलाफ बिना किसी पूर्व अनुमति के कारवाई कर सकती है, बिना वारंट के गिरफ़्तारी भी कर सकती है। किसी भी परिसर में घुस कर तलाशी ले सकती है। किसी भी हथियार भंडार को नष्ट कर सकती है। किसी भी वाहन को रोक कर तलाशी ले सकती है और उसे जब्त कर सकती है।

पूर्वोत्तर के सातों राज्यों में अफस्पा लागू किया गया था। यह कानून 1985 से 1994 तक पंजाब राज्य में भी लागू किया गया था। 1990 से जम्मू और कश्मीर राज्य में भी अफस्पा लागू है।

अफस्पा की आलोचना

इसकी आलोचना में कहा जाता है कि इस कानून में मनमाने और अनुचित बल प्रयोग का प्रावधान किया गया है। इस अधिनियम को मानवाधिकारों के उल्लंघन के बारे में भी बदनामी मिलती रही है। इसके लागू होने वाले क्षेत्र में हत्या, यातना, क्रूरता, तथा अमानवीय एवं अपमानजनक व्यवहार किए जाने के भी आरोप लगते हैं। इस अधिनियम को कई बार निरस्त करने की भी मांग की जाती रही है, क्योंकि इसे जीवन के मौलिक अधिकार पर हमला बताया जाता है।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+