African Poetry: कविता के जरिए अफ्रीका में शांति की अपील
African Poetry: इस समय भारतीय संसद में राजद के सांसद मनोज कुमार झा एक कविता के कारण चर्चा और विवाद दोनों में आ गये। "ठाकुर का खेत" नामक यह कविता एक जाति विशेष को शोषक के तौर पर प्रस्तुत करती है। समकालीन भारत में अब ऐसी कविताएं भले ही अप्रासंगिक हो गयी हों लेकिन अफ्रीका में ऐसा नहीं है। श्रम शोषण के विरुद्ध और दलित शोषित वर्ग के उत्थान के लिए भारत ने अनेक कदम उठाए हैं और परिणाम भी प्राप्त किये हैं। लेकिन दूर अफ्रीकी देशों में परिणाम से पहले अभी निर्णायक पहल की ही दरकार है।
अफ्रीकी देश नाइजर में अभी जुलाई में ही तख्तापलट हुआ था। 1950 से लेकर अब तक अफ्रीकी देशों में तख्तापलट की दो सौ से ज्यादा घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें पचास फीसदी सफल हुई हैं। ये आंकड़े अन्य महाद्वीपों के मुकाबले बहुत ज्यादा हैं। वर्ल्ड बैंक का मानना है कि सैन्य तख्तापलट प्राय: वहीं होता है, जहां मानव विकास सूचकांक कम होता है, लोग गरीबी व अराजकता झेल रहे होते हैं। बता दें कि नाइजर संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक में सबसे निचले पायदान पर है। ऐसे ही हाल इस इलाके के अन्य देशों के भी हैं।

इस सूची में इतना पिछड़ने की वजह यह है कि अफ्रीकी जनता दोहरा शोषण झेलती है। एक ओर यूरोप व अमेरिका वहां के संसाधनों पर कब्जा जमाने की होड़ में रहते हैं, वहीं दूसरी ओर अफ्रीकी देशों की सरकारें विदेशी कंपनियों को मुनाफा पहुंचाने में साथ देती हैं और अपनी जनता का हक छीन लेती है। उपनिवेशवाद की प्रवृत्ति और भ्रष्ट प्रशासन से अफ्रीकी देशों को मुक्त कराने की मुहिम अफ्रीका के कवि/कलाकारों ने शुरू की है। सालेए बॉब बालि (Saley Boubé Bali) जैसे कवि इसी मुहिम का हिस्सा हैं। वो अपनी एक कविता में लिखते हैं:
'कौन हूं मैं/ सिवाय/ एक संवेदनशील रूह के/ मेरे अफ्रीका के/ जख्मों की अनुगूंज/आने वाले वक्त की ओर/ देखती है/ और कान धर देती है/ शांति के शब्दों के लिए, कौन हूं मैं/ उस चुप्पी के अलावा/ जो दिन रात/ खुद से बातें करता है/ जिसके निर्जन दिमाग में/ हजारों हजार विचार हैं/ जिंदा रहने के/ साम्राज्यवाद के परजीवी/ लुटेरों के साये में...'
21 सितंबर को विश्व शांति दिवस के अवसर पर वर्ल्ड पोएट्री मूवमेंट के जरिए अफ्रीकी कवियों ने अपने देशों की समस्याओं की ओर पूरी दुनिया का ध्यान खींचने का प्रयास शुरू कर दिया है। इस मूवमेंट की एशिया कॉर्डिनेटर रति सक्सेना ने बताया, हम बड़े स्तर पर विश्व के कवियों/कलाकारों को इस मुहिम से जोड़ रहे हैं, ताकि अफ्रीकी देशों में मानवाधिकारों का जो हनन हो रहा है, उस ओर दुनिया का ध्यान जाए, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीयन यूनियन और अफ्रीकी यूनियन का, ताकि वे मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने की दिशा में काम करें। मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए उठाया गया यह एक रचनात्मक कदम है, जिसके लिए दुनियाभर में 21 सितंबर से कार्यक्रमों की लंबी श्रृंखला शुरू हुई है। भारत के भी विभिन्न शहरों में इसे लेकर आयोजन शुरू हो चुके हैं। हमें यह जानने की जरूरत है कि आखिर अफ्रीकी देशों में लगातार तख्तापलट क्यों हो रहे हैं।
बुर्किना फासो से गैबॉन तक
अगस्त के आखिर में अफ्रीकी देश गैबॉन में तख्तापलट हुआ था। गैबॉन में मानव विकास सूचकांक उच्च है, अफ्रीका कॉन्टिनेंट के अमीर देशों में शुमार होने के बावजूद यहां तख्तापलट हुआ तो इसके पीछे जनता का भारी असंतोष है। गैबॉन के तख्तापलट से करीब एक महीने पहले अर्थात जुलाई में नाइजर में तख्तापलट हुआ था। बीते साल बुर्किनी फासो, चाड और माली की सरकारों को सैन्य ताकत ने सत्ता से उखाड़ फेंका था। इन सभी देशों की माली हालत खराब थी, लेकिन गैबॉन के साथ ऐसा नहीं था।
गैबॉन एक प्रमुख तेल उत्पादक देश है। यह ओपेक अर्थात ऑर्गेनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज का सदस्य है। कम आबादी और प्राकृतिक संसाधन के बावजूद वहां बेरोजगारी बढ़ रही थी। दूसरी ओर वहां के लोग देख रहे थे कि फ्रांस से आजाद होने के बाद भी वे अब तक सही मायने में आजाद नहीं है। कच्चे माल के लिए फ्रांस यहीं रुख करता है। गैबॉन के राष्ट्रपति अली बोंगो जो लगातार तीसरी बार चुनाव में विजय घोषित हुए थे, उन पर आरोप था कि उनके निर्णय देश और जनता के हित में नहीं थे।
यह समझने की जरूरत है कि लंबे समय तक अफ्रीकी देशों पर यूरोप का राज रहा। अब सुरक्षा के नाम पर यूरोपीय देश अपना दबदबा वहां बनाए हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अफ्रीका दुनिया के तीस फीसदी खनिज भंडार, बारह फीसदी तेल और आठ फीसदी प्राकृतिक गैस का घर है। इस महाद्वीप में दुनिया का अस्सी फीसदी सोना और नब्बे फीसदी तक क्रोमियम और प्लैटिनम भी है, अर्थात दुनिया अपने इलेक्ट्रिक सामानों के लिए अफ्रीकी देशों की ओर देखेगी ही। ये देखना अगर खनिजों को खरीदने के लिए होता तो निश्चित रूप से अफ्रीका एक संपन्न महाद्वीप बन चुका होता, पर यह देखना अफ्रीका की खनिज संपदा के अनुचित दोहन करने के रूप में होता है।
दोहन सिर्फ कच्चे माल का नहीं हुआ, बल्कि मानव श्रम का भी हुआ है। इस तरह का दोहन तब आसान होता है, जबकि देश अस्थिर रहे, सत्ताएं पलटती रहें। पर ऐसे में भी ललचाता हुआ एक देश फायदे में आ जाता है, तो दूसरा नुकसान में। कुल मिलाकर विश्व शांति के लिए यह स्थिति किसी भी रूप में सुखद नहीं है।
घाना: व्हेयर द बीड स्पीक्स
अफ्रीका की जब बात आती है तो हमारे जेहन में जिस देश की छवि सबसे पहले उभरती है वो साउथ अफ्रीका है। वही देश जहां महात्मा गांधी को ट्रेन के फर्स्ट क्लास डिब्बे से नीचे जबरन उतार दिया गया था। सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत वहीं से हुई थी। हमारा देश आजाद हो गया, लेकिन साउथ अफ्रीका को रंगभेद से मुक्त होने में बरसों लग गए थे। 1994 में दक्षिण अफ्रीका में देश का पहला लोकतांत्रिक चुनाव हुआ और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नेल्सन मंडेला पहले अश्वेत राष्ट्रपति चुने गए।
लेकिन सदियों के घावों को भरने में वक्त लगता है। पोएट्री मूवमेंट के जयपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में जानी-मानी साहित्यकार मनीषा कुलश्रेष्ठ अपनी साउथ अफ्रीका की यात्रा को याद करते हुए बताती हैं, 'मैं 2012 में साउथ अफ्रीका गई थीं। नस्लभेद से मुकम्मल आजादी के दशक-दो दशक ही हुए थे, देश आत्मसंघर्ष और आर्थिक परेशानी से गुजर रहा था। युवा दिशाहीन थे, अपराधों का शहर था जोहान्सबर्ग। शहर के बीचों बीच पाट दी गयी सोने की खान, हीरों और प्लेटिनम खदानें और एस्बेस्टस की चद्दरों की दीवार-छत बनाकर जीवन बिताते मजदूर। मुझे इतिहास याद आता था कि कैसे यूरोपीय आक्रांताओं ने इनके पशुधन को नष्ट किया, खेत जंगल खरीदे और उन्हीं में इन्हें गुलाम बनाकर जोत दिया। इन्हें जमीनों में धंसे सोने हीरे से जरा लगाव न था। ये तो लकड़ी के मोतियों और पशुओं की हड्डियों से बनाई जूड़ा पिनों से खुश थे।
इसी संदर्भ में घाना की प्रतिष्ठित लेखक अमा अता ऐदु (Ama Ata Aidoo) की एक कविता है, 'घाना: व्हेयर द बीड स्पीक्स।' कविता दिल को छू गई जिसका अनुवाद है:
सुंदर और मनमोहक मनका,
फूलदार, त्रुटिपूर्ण, मुड़ा हुआ, गूंथा हुआ,
गले में लिपटा या भूमि पर रखा हुआ
हर जगह मनुष्य के होने का प्रतीक मनका
तुम हमारे अस्तित्व पर लगा एक फ्रेम हो
हमारी सामूहिक दावतों का उल्लास हो
तुमसे गूंथे हैं- हमारे उत्सव और आनंद
मुझे एक मनका दो जो आनंद में लिपटा हो;
मेरे दु:ख को दूर करने के लिए एक मोती ढूंढो।
हम मोतियों से गाते हैं, और मोतियों को गाते हैं...'
बता दें कि घाना पश्चिम अफ्रीका का एक देश है। हिंसक घटनाएं यहां नहीं होतीं, लेकिन विश्व शांति दिवस पर वहां से खबर आती है कि अज्ञात बंदूकधारियों ने गोलीबारी की, नौ लोग मारे गए, कई घायल हो गए। हमला पड़ोसी देश बुर्किना फासो की सीमा के पास हुआ। यह इलाका आतंकवादियों की पनाहगाह बना हुआ है। लगातार यहां से ऐसी घटनाएं आती रहती हैं। तख्तापलट के बाद से अशांति बनी हुई है।
जहां तक अफ्रीकी देशों के आम लोगों की बात है तो वे कृषि पर निर्भर हैं। वे अपने अधिकारों के लिए लड़ते हुए नहीं, खेती करते हुए ही मारे जा रहे हैं। इसी साल मई की घटना है, जब खेती करते लोगों पर आतंकवादियों ने हमला किया। बीते बरस दो बार वहां तख्तापलट हुआ। एक एनजीओ की रिपोर्ट के मुताबिक दस हजार लोग इस संघर्ष में मारे गए और करीब बीस लाख विस्थापित हुए।
समस्याएं कई हैं अफ्रीकी देशों के पास लेकिन अपील बस एक है, शांति की। इस शांति की अपील के लिए कविता और साहित्य से बेहतर माध्यम भला और क्या हो सकता है? इस समय अफ्रीका के कवि अपने साहित्य के जरिए उसी शांति और स्थायित्व को पाने का प्रयास कर रहे हैं।
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