FPO: क्यों वापस लिया जाता है एफपीओ, क्या होता है कंपनी पर असर?
भारत के बड़े उद्योगपति गौतम अडानी द्वारा अपनी कंपनी के FPO को वापस लेने से पूरे शेयर मार्केट में हलचल मच गई है।

FPO: अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (AEL) के बोर्ड ने पूरी तरह सब्सक्राइब फॉलो ऑन पब्लिक ऑफरिंग (FPO) को विड्रॉ करने का फैसला लिया। अडानी समूह के चेयरमैन गौतम अडानी ने एक वीडियो जारी कर कहा कि हालिया मार्केट की स्थिति को देखते हुए इस एफपीओ के साथ आगे बढ़ना नैतिक रूप से सही नहीं है। कुछ दिन पहले ही अडानी समूह पर न्यूयॉर्क की हिंडेनबर्ग रिसर्च ने कई गंभीर आरोप लगाए थे, जिनमें अडानी समूह के शेयरों का ओवर वैल्यू होना, अडानी की कंपनियों पर बहुत ज्यादा कर्ज होना शामिल है। हिंडेनबर्ग रिसर्च के इन आरोपों के बाद अडानी समूह की सभी कंपनियों के शेयर्स में भारी गिरावट देखी गई है।
क्या होता है एफपीओ
फॉलो ऑन पब्लिक ऑफर (FPO), पहले से ही IPO द्वारा पब्लिक कंपनी बन चुकी किसी कंपनी द्वारा सिक्योरिटीज की सेकेंडरी ऑफरिंग होती है। एफपीओ का इस्तेमाल आमतौर पर अतिरिक्त पूंजी जुटाने और कंपनी की पूंजी तरलता को बढ़ाने के लिए किया जाता है। एफपीओ की प्रक्रिया भी लगभग आईपीओ जैसी ही होती है।
कंपनी का पहले से उपलब्ध पब्लिक ट्रैक रेकॉर्ड, मार्केट कैपिटलाइजेशन, सिक्योरिटीज की संख्या और उनका मूल्य बाजार की स्थितियों सहित कंपनी की फाइनेंशियल परफॉर्मेंस के आधार पर एफपीओ निर्धारित किया जाता है। कंपनी के मौजूदा शेयरधारकों के पास अक्सर एफपीओ के हिस्से के रूप में अपने शेयर बेचने का मौका होता है।
कितने प्रकार के होते हैं FPO?
डायल्यूटिव FPO: डायल्यूटिव एफपीओ किसी कंपनी द्वारा अतिरिक्त शेयर्स की पेशकश है जिससे मौजूदा शेयरधारकों के ओनरशिप प्रतिशत में कमी आती है। यह तब होता है जब एफपीओ के कारण बकाया शेयरों की संख्या बढ़ जाती है, जिसकी वजह से मौजूदा शेयर का मूल्य कम हो जाता है। डायल्यूटिव एफपीओ में कंपनी लोगों को नए शेयर जारी करके पैसा जुटाती है, जिससे बकाया शेयरों की संख्या बढ़ जाती है। इससे होता यह है कि मौजूदा शेयरधारकों के पास एफपीओ से पहले की तुलना में कंपनी का एक छोटा हिस्सा रह जाता है, जिसकी वजह से मौजूदा शेयरों का मूल्य घट सकता है।
नॉन डायल्यूटिव FPO: नॉन डायल्यूटिव एफपीओ में कंपनी के मौजूदा शेयरधारकों की ओनरशिप में कोई कमी नहीं आती है क्योंकि कोई नया शेयर जारी नहीं किया जाता है। बाजार में जिन शेयरों को लोगों को ऑफर किया जाता है, वे शेयर गैर-सार्वजनिक (नॉन पब्लिक) शेयरधारकों के पास होते हैं और आमतौर पर इन शेयरधारको में कंपनी के प्रमोटर, डायरेक्टर शामिल होते हैं या वो लोग होते हैं जिनके पास पहले से ही कंपनी के शेयर्स होते हैं।
FPO विड्रॉ करना क्या होता है
एफपीओ को विड्रॉ करने का मतलब यह होता है कि एक कंपनी ने अपने पहले से योजनाबद्ध पब्लिक ऑफरिंग को वापस ले लिया है या स्थगित कर दिया है। हालांकि, एफपीओ को विड्रॉ करने वाली कंपनी फिर से एफपीओ को री-फाइल कर सकती है। एफपीओ को विड्रॉ करने का निर्णय आमतौर पर कंपनी के टॉप लेवल मैनेजमेंट द्वारा लिया जाता है। एफपीओ विड्रॉ करने पर कंपनी को शेयरों के लिए आवेदन भरने वाले निवेशकों को आवेदन राशि वापस करनी होती है।
क्या होते हैं FPO को विड्रॉ करने के कारण?
● कम डिमांड: कंपनी FPO को वापस ले सकती है अगर उन्हें यह लगता है कि शेयर मार्केट में उनके FPO की मांग कम है।
● बाजार की स्थिति: बाजार की स्थिति, जैसे कि स्टॉक की कीमतों में गिरावट या अर्थव्यवस्था में मंदी, भी FPO की वापसी का कारण बन सकती है।
● रेगुलेटरी कंसर्न्स: रेगुलेटरी कंसर्न्स, जैसे कि रूल्स और रेगुलेशन में बदलाव या सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ़ इंडिया (SEBI) से अप्रूवल लेने में देरी के कारण भी एफपीओ वापस हो सकता है।
● फंडिंग के सोर्स में बदलाव: कंपनी एफपीओ को वापस ले सकती है अगर वह अन्य माध्यमों जैसे लोन, प्राइवेट इक्विटी, आदि के माध्यम से पैसे जुटा लेती है।
कैसे किया जाता है FPO विड्रॉ
एफपीओ को विड्रॉ करने के लिए सबसे पहले कंपनी के टॉप लेवल मैनेजमेंट की मीटिंग होती है, अगर मीटिंग में कंपनी का टॉप लेवल मैनेजमेंट एफपीओ को वापस लेने की सहमति देता है तो आगे का प्रोसेस किया जाता है। अब कंपनी एफपीओ को वापस लेने के अपने फैसले के बारे में सेबी (SEBI) को सूचित करती है। फिर कंपनी या टॉप लेवल मैनेजमेंट प्रेस रिलीज, वेबसाइट अपडेट जैसे विभिन्न माध्यमों से जनता को एफपीओ की वापसी के बारे में जानकारी देती है। जानकारी देने के बाद कंपनी एफपीओ में शेयरों के लिए आवेदन करने वाले निवेशकों को आवेदन राशि वापस कर देती है। कुछ समय बाद अगर कंपनी को बाजार की स्थिति आदि दूसरी परिस्थितियाँ अनुकूल लगती है तो एफपीओ को फिर से फाइल कर सकते हैं।
क्या होते है FPO को विड्रॉ करने के परिणाम?
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एफपीओ को विड्रॉ करने से कंपनी, उसके शेयरधारकों और निवेशकों पर भारी प्रभाव पड़ता है। कंपनी के लिए एफपीओ वापस लेने से भविष्य की योजनाओं को पूरा करने में देरी हो सकती है, और निवेशकों के बीच छवि को भी नुकसान पहुंच सकता है। कंपनी के मौजूदा शेयरधारकों के लिए एफपीओ वापस होने से उनके शेयरों के मूल्य में कमी आ सकती है, क्योंकि मार्केट में एफपीओ वापस लिए जाने को कंपनी की बिगड़ती फाइनेंशियल हेल्थ का संकेत माना जा सकता है। नये निवेशकों के लिए एफपीओ विड्रॉ होने से उनके दिमाग में कंपनी की छवि बिगड़ सकती है और जिन निवेशकों ने एफपीओ भर दिया है, उनका पैसा कुछ समय के लिए अटक सकता है और समय की बर्बादी का कारण बन सकता है।
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