सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात जवानों की वीरगाथा

नई दिल्ली। देश की सीमा को हर जगह महफूज रखने के लिए हमारे जवान अपनी जान की बाजी लगा देते हैं तब जाकर हम अपने घरों में सुकून की नींद सो पाते हैं। सियाचिन ग्लेशियर धरती पर सबसे उंची जगह है जहां बर्फीले मौसम में जवान देश की सुरक्षा करते हुए अपनी जान दे देते हैं।

सियाचिन ग्लेशियर पर हजारों जवान शारीरिक, मानसिक यातनाओं को झेलते हुए डटे रहकर देश की सुरक्षा करते हैं। सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात जवान किन विकट परिस्थितियों में अपना फर्ज निभाते हैं। ऐसा हमारे देश के जवान सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि जमीन का एक-एक टुकड़ा भारत मां का है। ऐसे में जब भी आप घर जायें या किसी जवान को देखें तो उसे सम्मान दें। आइये जाने इन जवानों सियाचिन में संघर्ष की कहानी जाने

नंगे हाथ ट्रिगर छूने से उंगलियां खराब हो जाती है

नंगे हाथ ट्रिगर छूने से उंगलियां खराब हो जाती है

सियाचीन में पारा इतना कम होता है कि बंदूक का ट्रिगर अगर नंगी उंगली से छू ले तो उंगली उसी पर चिपक सकती है और सुन्न पड़ सकती है।

सबसे बुरे मौसम में भी जवान डटे रहते हैं

सबसे बुरे मौसम में भी जवान डटे रहते हैं

60 डिग्री माइनस के तापमान में जहां ऑक्सीजन भी ठीक से नहीं आती है ऐसी विषम परिस्थितियों में जवान यहां तैनात रहते हैं। समतल स्थान में जितनी ऑक्सीजन उपलब्ध रहती उसकी सिर्फ 10 फीसदी ही सियाचिन में में उपलब्ध होती है।

5400 मीटर से उपर की उंचाई पर रहते हैं जवान

5400 मीटर से उपर की उंचाई पर रहते हैं जवान

सामान्य मानव का शरीर 5400 मीटर की उंचाई से उपर जिंदा नहीं रह सकता है, उसका शरीर इससे उपर की उंचाई को सहन नहीं कर सकता है क्योंकि पारा बहुत नीचे और ऑक्सीजन की कमी होती है। लेकिन देश के जवान 5500 मीटर से भी उपर की उंचाई पर तैनात रहते हैं।

100 मील प्रति घंटा की बर्फीली हवा

100 मील प्रति घंटा की बर्फीली हवा

सियाचिन ग्लेशियर पर कभी भी 100 मील प्रति घंटा की रफ्तार से अधिक की बर्फीली हवायें चलने लगती हैं और पारा जीरो से 60 डिग्री माइनस तक पहुंच जाता है।

36 फीट तक बर्फ जम जाती है

36 फीट तक बर्फ जम जाती है

जिस समय सियाचिन ग्लेशियर पर बर्फबारी शुरु होती है ऐसे में यहां 36 फीट तक बर्फ जम जाती है

खाने को खाना नहीं, सेब बन जाता पत्थर

खाने को खाना नहीं, सेब बन जाता पत्थर

यहां ताजा खाना सपने के जैसा है, पारा इतना कम होता है कि फल यहां पत्थर की तरह हो जाते हैं। यहां सेना के हेलीकॉप्टर खाना टीन में बंद करके भेजते हैं।

30 साल में 846 जवान शहीद हो चुके हैं

30 साल में 846 जवान शहीद हो चुके हैं

घनघोर विपरीत परिस्थितियों में रहने वाले जवानों के लिए यहां जीवन एक संघर्ष हैं। लेकिन मातृभूमि की रक्षा में अब तक 846 जवान शहीद हो चुके हैं।

रास्ते नहीं होते चलने को

रास्ते नहीं होते चलने को

यहां जिस तरह से हमेशा बर्फ जमा होती है ऐसे में जान जोखिम में डालकर जवान बर्फ पर चलते हैं

80 फीसदी समय खर्च जवानों की तैनाती में लगता है

80 फीसदी समय खर्च जवानों की तैनाती में लगता है

प्रतिकूल परिस्थितियों में जवानों को यहां तैनात करने से पहले भारतीय सेना अपना 80 फीसदी समय उनकी तैनाती करने से पहले करती है।

यहां सिर्फ घनिष्ठ मित्र या घनघोर दुश्मन ही आता है

यहां सिर्फ घनिष्ठ मित्र या घनघोर दुश्मन ही आता है

जिस तरह का मौसम सियाचिन में रहता है वहां या तो आपका कोई घनिष्ठ मित्र या फिर आपका सबसे घरनघोर दुश्मन ही आ सकता है क्योंकि यहां की जमीन पूरी तरह से बंजर है।

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