Bhagyaraj Passes Away: नहीं रहे तमिल सुपरस्टार के. भाग्यराज, चश्मा पहनने वाला आदमी कैसे बना 'स्क्रीनप्ले किंग'

K. Bhagyaraj Passes Away: 70 और 80 के दशक में जब तमिल सिनेमा पर बड़े-बड़े एक्शन हीरो, स्टंट्स और भारी-भरकम डायलॉग्स बोलने वाले सुपरस्टार्स का राज था, तब एक ऐसे शख्स की एंट्री हुई जिसने इंडस्ट्री में स्टारडम की पूरी परिभाषा ही बदल दी। आंखों पर चश्मा, शर्ट की जेब में एक पेन, हाथ में डायरी और चेहरे पर एक बेहद मासूम मुस्कान-ये पहचान थी के. भाग्यराज (K. Bhagyaraj) की।

तमिल फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज अभिनेता, निर्देशक, लेखक और पटकथा लेखक के. भाग्यराज का शनिवार,27 जून को निधन हो गया है। इस खबर से फिल्म जगत और उनके करोड़ों प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई है।

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भाग्यराज ने साबित कर दिया कि बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर फिल्में देने के लिए किसी कड़क बॉडी या मस्कुलर फिजिक की जरूरत नहीं होती। बल्कि अगर आपके पास कलम की ताकत और बेहतरीन कहानी है, तो आप दर्शकों के दिलों पर राज कर सकते हैं। आज भी उन्हें तमिल सिनेमा का "किंग ऑफ स्क्रीनप्ले" (King of Screenplay) यानी पटकथा का राजा कहा जाता है। आइए जानते हैं उनकी इस दिलचस्प और प्रेरणादायक यात्रा के बारे में।

आम आदमी की छवि से बने सुपरस्टार

जब तमिल सिनेमा में बड़े-बड़े एक्शन हीरो का दौर था, तब के. भाग्यराज ने एक अलग रास्ता चुना। वह पर्दे पर किसी सुपरहीरो की तरह नहीं बल्कि एक साधारण मध्यमवर्गीय इंसान के रूप में नजर आते थे। चश्मा लगाए, शर्ट की जेब में पेन और हाथ में डायरी लिए उनका अंदाज दर्शकों को बेहद पसंद आता था। उनकी सादगी ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई। लोग उनके किरदारों में खुद को देखते थे और यही वजह थी कि वे जल्द ही दर्शकों के चहेते बन गए।

कहानी और स्क्रीनप्ले के बादशाह थे भाग्यराज

के. भाग्यराज की सबसे बड़ी पहचान उनकी लेखनी थी। वह ऐसी कहानियां लिखते थे जो सीधे आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी होती थीं। उनकी फिल्मों में परिवार, रिश्ते, प्यार, संघर्ष और समाज की सच्चाइयों को बेहद सरल और प्रभावी तरीके से दिखाया जाता था।

भाग्यराज की फिल्मों की एक और खासियत यह थी कि उनमें हास्य और मनोरंजन तो भरपूर होता था, लेकिन अश्लीलता नहीं होती थी। उन्होंने पति-पत्नी के रिश्तों और पारिवारिक मुद्दों को बहुत ही संवेदनशील और समझदारी भरे तरीके से पर्दे पर पेश किया। उनकी फिल्मों में हल्की-फुल्की कॉमेडी के साथ गहरे सामाजिक संदेश भी होते थे। यही वजह थी कि उनकी फिल्में पूरे परिवार के साथ बैठकर देखी जाती थीं।

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बॉलीवुड से नाता: अमिताभ की 'आखरी रास्ता' से लेकर अनिल कपूर की 'बेटा' तक

के. भाग्यराज की लोकप्रियता केवल तमिल सिनेमा तक ही सीमित नहीं रही। उनकी लिखी कहानियों और स्क्रीनप्ले का जादू हिंदी (बॉलीवुड), तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम सिनेमा पर भी खूब चला। बॉलीवुड की कई ऐसी ब्लॉकबस्टर फिल्में हैं, जो असल में भाग्यराज के दिमाग की उपज थीं।

आखरी रास्ता (1986): महानायक अमिताभ बच्चन की इस आइकॉनिक फिल्म को भला कौन भूल सकता है, जिसमें उन्होंने बाप और बेटे का डबल रोल निभाया था। यह सुपरहिट फिल्म असल में भाग्यराज की तमिल फिल्म 'ओरु कैधियिन डायरी' की कहानी पर आधारित थी।

वो सात दिन (1983): अनिल कपूर के करियर को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाली इस बेहतरीन फिल्म की मूल कहानी भाग्यराज की तमिल सुपरहिट फिल्म 'अंधा 7 नाटकाली' थी।

बेटा (1992): अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित की ब्लॉकबस्टर फिल्म 'बेटा' (जिसका गाना 'धक-धक करने लगा' आज भी मशहूर है), भाग्यराज की तमिल फिल्म 'एंगा चिन्ना रासा' का ही ऑफिशियल रीमेक थी।

मिस्टर बेचारा (1996): अनिल कपूर, श्रीदेवी और नागार्जुन स्टारर यह रोमांटिक ड्रामा फिल्म भाग्यराज की अपनी ही तमिल हिट फिल्म 'वीटला विशेशंगा' की रीमेक थी।

पापा द ग्रेट (2000): भाग्यराज ने इस हिंदी एक्शन-कॉमेडी फिल्म का खुद निर्देशन (Direction) किया था, जो उनकी तमिल फिल्म 'वैत्तिया मदिचू कट्टू' का रूपांतरण थी।

हमेशा याद किए जाएंगे भाग्यराज

के. भाग्यराज ने भारतीय और तमिल सिनेमा को सिर्फ सफल फिल्में ही नहीं दीं, बल्कि यह भी सिखाया कि एक साधारण इंसान की कहानी भी दर्शकों के दिलों तक पहुंच सकती है। उन्होंने अपनी फिल्मों के जरिए आम लोगों की भावनाओं, संघर्षों और रिश्तों को बेहद खूबसूरती से पर्दे पर उतारा। उनका निधन भारतीय सिनेमा के लिए एक बड़ी क्षति है। भले ही वह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में, उनकी कहानियां और उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा।

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