Gustaakh Ishq Review: गुस्ताखी इश्क में चलती है मियां, लेकिन आपने तो...
Gustaakh Ishq Movie Review in Hindi: ऊल जलूल इश्क के नाम से बन रही फिल्म आखिर में गुस्ताख इश्क से पहचानी जा रही है। जो आज यानी 28 नवंबर को रिलीज हुई, इसमें विजय वर्मा, फातिमा सना शेख और नसीरुद्दीन शाह हैं। फिल्म में सबकुछ ओल्ड स्कूल है। इश्क से लेकर रोमांस यहां तक की कविताएं भी। फिल्म कैसी है और क्या है इसकी कहानी?

नवाबुद्दीन (विजय) दिल्ली में रहता है और अपने पिता की आखिरी निशानी, यानी उनके प्रिंटिंग प्रेस को बचाना चाहता है। एक दिन उसे अज़ीज़ नाम के एक महान कवि के बारे में पता चलता है। जो अपने पिता की जवानी के दिनों में काफी लोकप्रिय था और एक दिन अचानक शोहरत से दूर चला गया। अपने पिता के लेखन को पढ़ने के बाद, वह अंततः अज़ीज़ को ढूंढने का फैसला करता है। जिससे वह अपने पिता के प्रेस को बचाने के लिए उसकी शायरी छाप सके। आखिरकार उसे अजीज का फोन नंबर मिल जाता है और अजीज की बेटी उससे पंजाब में मिलने के लिए कहती है। मन्नत उर्फ मिनी (फातिमा)पहली मुलाक़ात में, वह नवाबुद्दीन को बताती है कि अज़ीज़ अब पत्र नहीं लिखता और उसे जाने के लिए कहती है। लेकिन, उसे उसकी दुकान का पता मिल जाता है और वह उससे सीधे मिलने का फ़ैसला करता है। इसके बाद वो अजीज से शायरी सीखने की इच्छा जाहिर करता है। इसके बाद कहानी क्या मोड़ लेती है, फिल्म में देखना उचित होगा।
नवाबुद्दीन के किरदार में विजय वर्मा ने बेहतरीन काम किया है। वो अपनी एक्टिंग के लिए जाने जाते हैं, ऐसे में उन्होंने यहां भी उसकी छाप छोड़ी है। उनकी फातिमा सना शेख के साथ केमेस्ट्री भी अच्छी है। वहीं, फातिमा ने भी अपने काम से चौंकाया है। फिल्म की कहानी जिस दशक में सेट है, उसे उन्होंने बखूबी समझा है। शेरो-शायरी के टोन को भी उन्होंने ठीक ढंग से पकड़ा है। जितना भी स्क्रीन स्पेस फातिमा को मिला है, उन्होंने उसे एक्टिंग से जस्टीफाई किया है। नसीरुद्दीन शाह के स्क्रीन पर आने से लेकर अंत तक फिल्म में एक अलग रंगत रहती है। पूरी फिल्म को उन्होंने बांधे रखा है। वहीं, शारिब हाशमी को मेकर्स ने इस फिल्म में कास्ट क्यों किया है, पूरी फिल्म में समझ नहीं आता है। शारिब को मेकर्स यूज ही नहीं कर पाए हैं।
विभु पुरी ने इस फिल्म को लिखा और डायरेक्ट किया है। लेखन के मामले में विभु विफल होते हैं। फिल्म का फर्स्ट हाफ ठीक ठाक है, इसमें कुछ भी एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी नहीं है। विभु की स्टोरीटेलिंग बहुत फीखी है। हालांकि कहानी भले ही साधारण हो, लेकिन इसमें वो पुरानी यादें और मिठास है जो हाल की दूसरी फिल्मों में नहीं रही। मेकर्स ने 90 के दशक का माहौल दिखाने में कामयाबी हासिल की है, जो इसे एक गर्मजोशी और दिल को छू लेने वाला एहसास देता है। फिल्म के डायलॉग्स और शायरी अहम हिस्सा हैं। संगीत ठीक-ठाक और भूलने लायक है। वहीं, फिल्म का सेकेंड हाफ धीमा और कमजोर लगता है। बस, क्लाइमेक्स आपको थोड़ा भावुक कर देता है। डायरेक्शन के लिहाज से विभु का काम अच्छा है।
कुल मिलाकर, मेकर्स का यह एक अच्छा प्रयास था। लेकिन यह गुस्ताख इश्क में थोड़ी बहुत गुस्ताखी रही, जिसकी वजह से फिल्म उस स्तर तक नहीं पहुंच सकी और एक औसत फिल्म बनकर रह गई।












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