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Emergency Review: कंगना रनौत ने पर्दे पर फिर बिखेरी अभिनय की अदा, खोला लोकतंत्र की हत्या का काला पन्ना

डायरेक्टर: कंगना रनौत
एक्टर्स: कंगना रनौत, अनुपम खेर, श्रेयस तलपड़े, महिमा चौधरी और सतीश कौशिक
रेटिंग्स: 3 स्टार्स

Emergency Review: इन दिनों सिनेमा के जरिए पॉलिटिकल आइडियोलॉजी टारगेट करने की कोशिश हो रही है। या यूं कहें कि सॉफ्ट पॉलिटिकल फिल्में भी बन रही हैं। इस फेहरिस्त में एक और फिल्म का नाम शामिल हो रहा है। इमरजेंसी। इसे कंगना रनौत ने बनाया है। इस फिल्म से शिकायत यही है कि फिल्म का नाम ही गलत लिखा है। ईमर्जन्सी लिखा हुआ दिखता है। बाकी फिल्म कैसी है और क्या है। इस पर विस्तार से बात करते हैं। पढ़िए ये रिव्यू।

Emergency Review

इमरजेंसी कंगना रनौत की एक ऐसी फिल्म है, जो 1975-1977 के आपातकाल के विवादित दौर को पर्दे पर पेश करती है। इसमें इंदिरा गांधी के शासन की कड़वी सच्चाई और उस वक्त के राजनीतिक संघर्ष को उजागर किया गया है। कहानी का केंद्र इंदिरा गांधी के शासन का आपातकालीन दौर है, जिसमें 21 महीने तक सरकार ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया और जनता की स्वतंत्रता को कुचल दिया। बांग्लादेश की आज़ादी, ऑपरेशन ब्लू स्टार, खालिस्तानी आंदोलन का उदय और इंदिरा गांधी की 1984 में हत्या जैसी ऐतिहासिक घटनाएं भी फिल्म का हिस्सा हैं।

कंगना का निर्देशन निडरता और आत्मविश्वास से भरा है। उन्होंने ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मानवीय संवेदनाओं के बीच कमाल का तालमेल बनाया है। फिल्म निष्पक्ष रहते हुए भारतीय राजनीति की जटिलता को साफ तौर पर दिखाती है।

परफॉर्मेंस की चर्चा करें तो कंगना रनौत ने एक बार फिर अपने अभिनय की जादूगरी पेश की है। उन्होंने इंदिरा के हाव भाव को पूरी तरह से कॉपी कर सजीव किया है। कंगना की ये परफॉर्मेंस भी यादगार बन सकती है। वहीं, सपोर्टिंग एक्टर्स ने अपने अभिनय से किरदारों में जान डाल दी है। विषाक नायर ने संजय गांधी के व्यक्तित्व को पर्दे पर सजीव कर दिया है, जबकि अनुपम खेर ने जयप्रकाश नारायण के रूप में अपनी अद्भुत अदाकारी से गहरी छाप छोड़ी है। इंदिरा गांधी की करीबी दोस्त पूपुल जयकर के किरदार में महिमा चौधरी ने शानदार अभिनय किया है। मिलिंद सोमन फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के रूप में पूरी तरह प्रभावित करते हैं, जबकि सतीश कौशिक ने जगजीवन राम की भूमिका को बेहद खूबसूरती से निभाया है। अटल बिहारी के किरदार में श्रेयस तलपड़े ने भी अपनी छाप छोड़ने की कोशिश की है। कुल मिलाकर फिल्म की कास्टिंग जबरदस्त हुई है।

डायरेक्शन कंगना रनौत ने ही किया है। इसमें डायरेक्शन तो ठीक है, लेकिन अगर फिल्म की लंबाई और छोटी हो सकती तो मजा आता है। कहानी भी खुद कंगना ने लिखी, इसमें उनके पास गुंजाइश थी कि इसे कसी हुई रखें। ढीली कहानी की वजह से फिल्म का पहला हाफ थोड़ा बोर करता है। डायरेक्शन के लिहाज से इस फिल्म में बहुत ज्यादा गुंजाइश थी नहीं। फिल्म का प्रोडक्शन बहुत रिच था। इसमें प्रोडक्शन डिजाइनर की मेहनत साफ नजर आती है।

फिल्म में 1970 के दशक के भारत को सिनेमेटोग्राफी के जरिये जीवंत रूप दिया गया है। सीन्स इतने असल हैं कि वह दर्शकों को उस दौर में ले जाते हैं। बैकग्राउंड स्कोर और गानों ने कहानी की गहराई को और बढ़ाया है। "सिंहासन खाली करो" और "सरकार को सलाम है" जैसे गाने फिल्म की थीम को साफ तौर से सशक्त बनाते हैं। इमरजेंसी का बैकग्राउंड स्कोर संचित-अंकित बल्हारा ने कंपोज किया है। जो फिल्म के लेवल को और ऊपर लेकर जाता है।

"इमरजेंसी" भारतीय इतिहास के उस पहलू को दर्शाती है, जिसे समझना और देखना चाहिए। कंगना का अभिनय इसे देखने के लिए प्रेरित करती है। यह फिल्म न केवल इतिहास का आईना है, बल्कि एक भावनात्मक सफर भी है। अगर आप राजनीति और इतिहास के शौकीन हैं, तो इसे जरूर देखें।

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