Governor Review: दिमाग के साथ देखनी होगी मनोज बाजपेयी की फिल्म 'गवर्नर', भारत के आर्थिक इतिहास की अनसुनी कहानी
फिल्म: गवर्नर (Governor)
स्टारकास्ट: मनोज बाजपेयी, अदा शर्मा, नौशाद मोहम्मद कुंजू, मधु
डायरेक्टर: चिन्मय डी. मांडलेकर
रनटाइम: 2 घंटे 2 मिनट
स्टार: 3 (***)
Governor Review: आज के दौर में जहां बड़े पर्दे पर अक्सर मसाला, एक्शन और तर्क से परे कहानियां देखने को मिलती हैं, वहीं ये फिल्म दर्शकों को एक बिल्कुल अलग अनुभव देती है। ये ऐसी फिल्म है जो केवल मनोरंजन नहीं करती बल्कि सोचने और समझने के लिए भी मजबूर करती है। फिल्म गवर्नर की कहानी भारत के उस कठिन दौर की है जब देश आर्थिक संकट की गिरफ्त में था और भविष्य को लेकर अनिश्चितता का माहौल था। ऐसे समय में एक व्यक्ति ने हालात को बदलने की जिम्मेदारी उठाई और इतिहास में अपनी अहम छाप छोड़ दी।

क्या है फिल्म गवर्नर की कहानी?
फिल्म की कहानी 1990 के दशक के शुरुआती सालों में ले जाती है, जब भारत गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा था। राजनीतिक अस्थिरता अपने चरम पर थी और देश की अर्थव्यवस्था लगभग टूटने की कगार पर पहुंच चुकी थी। इसी मुश्किल समय में एस. वेंकटरमणन को भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर नियुक्त किया जाता है। फिल्म इसी बात को केंद्र में रखती है कि किस तरह उन्होंने कठिन परिस्थितियों में फैसले लेकर देश को आर्थिक अंधेरे से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है इसका यथार्थवादी प्रस्तुतिकरण
-फिल्म के निर्देशक चिन्मय डी. मांडलेकर ने उस दौर को बड़े ही ईमानदार और प्रभावशाली तरीके से बड़े पर्दे पर उतारा है। फिल्म देखते समय महसूस होता है कि भारतीय इतिहास में ऐसे कई नायक रहे हैं जिनकी उपलब्धियां आम लोगों तक कभी ठीक से नहीं पहुंच सकीं। ये कहानी उन्हीं में से एक अनदेखे और अनसुने नायक को सामने लाती है।
-चूंकि फिल्म का विषय अर्थव्यवस्था और वित्तीय नीतियों से जुड़ा है, इसलिए इसमें तकनीकी पहलू भी मौजूद हैं। यह पारंपरिक बॉलीवुड मनोरंजन वाली फिल्म नहीं है। यहां न बड़े-बड़े एक्शन सीक्वेंस हैं और न ही मसालेदार ड्रामा। इसकी गंभीरता ही इसकी पहचान है। कई जगह फिल्म डॉक्यू-ड्रामा जैसी प्रतीत होती है, लेकिन यही इसकी प्रामाणिकता को मजबूत बनाता है।
हर दर्शक के लिए नहीं है ये फिल्म
-ये फिल्म उन दर्शकों को ज्यादा पसंद आएगी जो कंटेंट-ड्रिवन और विचारोत्तेजक (Thought Provoking) सिनेमा पसंद करते हैं। यदि आप केवल हल्का-फुल्का मनोरंजन या मसाला फिल्मों की तलाश में हैं, तो संभव है कि इसकी गंभीरता आपको धीमी लगे। हालांकि जिन लोगों को राजनीति, इतिहास और अर्थव्यवस्था जैसे विषयों में रुचि है, उनके लिए ये फिल्म बेहद रोचक साबित हो सकती है।
-फिल्म की एकमात्र कमजोरी यही कही जा सकती है कि कुछ हिस्सों में इसकी प्रस्तुति डॉक्यूमेंट्री जैसी महसूस होती है, जिससे आम दर्शकों के लिए कुछ घटनाएं थोड़ी जटिल लग सकती हैं। हालांकि विषय की गंभीरता को देखते हुए ये एक जरूरी पहलू भी बन जाता है।
फिल्म की स्टारकास्ट और उनकी दमदार एक्टिंग
-फिल्म की सबसे बड़ी ताकत मनोज बाजपेयी का अभिनय है। उन्होंने एस. वेंकटरमणन के किरदार को केवल निभाया नहीं बल्कि उसे पूरी तरह आत्मसात कर लिया है। उनकी बॉडी लैंग्वेज, चलने का अंदाज, बोलने का तरीका और किरदार की उम्र के अनुरूप व्यवहार इस बात का प्रमाण हैं कि वह हर भूमिका के लिए कितनी गहराई से तैयारी करते हैं।
-मनोज बाजपेयी एक बार फिर ये साबित करते हैं कि वह भारतीय सिनेमा के सबसे बहुमुखी और प्रतिभाशाली अभिनेताओं में क्यों गिने जाते हैं। उनका प्रदर्शन फिल्म को एक अलग स्तर पर ले जाता है।
-फिल्म में पत्रकार की भूमिका निभाने वाली अदा शर्मा अपने सीमित स्क्रीन टाइम में भी प्रभाव छोड़ने में सफल रहती हैं। वहीं नौशाद मोहम्मद कुंजू ने डिप्टी गवर्नर के किरदार में शानदार अभिनय किया है। मधू ने मनोज बाजपेयी की पत्नी के रूप में सहज और प्रभावी प्रदर्शन दिया है।
-इसके अलावा परितोष संध का काम भी उल्लेखनीय है। उन्होंने आरबीआई टीम के एक अहम सदस्य की भूमिका को बेहद मजबूती से निभाया है। फिल्म की कास्टिंग भी इसकी बड़ी उपलब्धि है। कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा ने हर किरदार के लिए ऐसे कलाकार चुने हैं जो अपने रोल में पूरी तरह फिट बैठते हैं।
क्यों देखें ये फिल्म?
अगर आप ऐसी फिल्मों के दर्शक हैं जो केवल मनोरंजन नहीं बल्कि ज्ञान, इतिहास और प्रेरणा भी देती हैं, तो ये फिल्म आपके लिए है। ये एक ऐसे नायक की कहानी है जिसने पर्दे के पीछे रहकर देश के भविष्य को दिशा दी। मजबूत लेखन, शानदार अभिनय और वास्तविक घटनाओं पर आधारित कथानक इसे एक यादगार सिनेमाई अनुभव बनाते हैं।












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