भारत के फैसले से प्रवासी भारतीयों को आटा-चावल के लाले

जसु काना को ऑस्ट्रेलिया में रहते पांच साल हो गए हैं लेकिन आटा उन्हें एक खास भारतीय ब्रैंड का ही पसंद है. वह कहती हैं कि कोविड के दौरान जब लॉकडाउन हो गया था और सप्लाई कम हो गई थी, तब भी वह उस ब्रैंड के आटे के लिए सौ किलोमीटर दूर वूलनगॉन्ग से सिडनी जाया करती थीं. लेकिन अब उन्हें सिडनी में भी आटा नहीं मिलेगा.
डीडब्ल्यू से बातचीत में काना कहती हैं, "दुकानदार कह रहे हैं कि अब भारत से आटा नहीं आ रहा है. और कब तक आएगा, पता नहीं. कई जगह आटा खत्म हो चुका है."
यह असर है भारत सरकार के उस फैसले का, जिसमें आटा और चावल के निर्यात पर बैन लगाया गया था. जुलाई में आटे के निर्यात पर बैन लगाया गया था और अगस्त में चावल का निर्यात कड़ा कर दिया गया. 7 जुलाई के अपने आदेश में विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने कहा था कि आटा निर्यातकों को अपना उत्पाद देश से बाहर भेजने से पहले सरकार की अनुमति लेनी होगी.
अधिसूचना जारी कर डीजीएफटी ने कहा, "गेहूं और आटे की आपूर्ति में वैश्विक गड़बड़ी ने कई नए खिलाड़ियों को जन्म दिया है जिसकी वजह से दाम ऊपर नीचे हुए हैं और गुणवत्ता से संबंधित भावी सवालों को भी जन्म दिया है. इसलिए भारत से निर्यात होने वाले आटे की गुणवत्ता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है."

ये प्रतिबंध 12 जुलाई से लागू हुए और छह जुलाई से पहले जो माल सीमा शुल्क विभाग के पास पहुंच चुका था या जिसे जहाजों पर भरना शुरू कर दिया गया था, उसे ही निर्यात की अनुमति दी गई. कुछ अनुमान बताते हैं कि भारत ने इस साल अप्रैल में लगभग 96,000 टन आटा निर्यात किया, जो कि एक साल में निर्यात में भारी उछाल है. पिछले साल अप्रैल में सिर्फ 26,000 टन आटा निर्यात किया गया था. लेकिन 2022 में गेहूं निर्यात बढ़ा और उसी के साथ आटे का निर्यात भी बढ़ा. मई में जब भारत ने गेहूं का निर्यात रोक दिया तो निर्यातकों ने जम कर आटा निर्यात करना शुरू कर दिया था.
भारतीय दुकानों में आटा खत्म
उस पाबंदी का असर अब विदेशों में भारतीय माल बेचने वाली दुकानों पर नजर आने लगा है. वूलनगॉन्ग में एक इंडियन स्टोर चलाने वाले फणींद्र बताते हैं, "इस महीने तक तो आटा और चावल मिले हैं लेकिन अब आटा नहीं आ रहा है. मतलब, हमारे पास अब इंडियन आटा ब्रैंड नहीं होंगे." फणींद्र कहते हैं कि अभी उनके पास दो महीने का स्टॉक है क्योंकि जुलाई में जो कंटेनर बैन लागू होने से पहले निकल गए थे, वे पहुंच रहे हैं.
इस कारण दाम भी बढ़ गए हैं. फणींद्र बताते हैं कि आटे और चावल के ही नहीं बल्कि उनसे बनने वाले उत्पादों के दाम भी बढ़ गए हैं. जैसे फ्रोजन नान और रोटी के दाम 2-4 डॉलर (यानी 110 से 220 रुपये) तक बढ़ चुके हैं. आने वाले दिनों में चावल की भी इसी तरह की कमी होने का अंदेशा है, जिसका असर कीमतों पर नजर आएगा.
फणींद्र के मुताबिक चावल के दाम पहले ही 20 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं. ऐसा भारत द्वारा चावल के निर्यात पर 20 फीसदी कर लगाने के बाद हुआ है. दुनिया के सबसे बड़े चावल निर्यातक भारत ने सितंबर में टूटे चावल के निर्यात पर रोक लगा दी थी और अन्य किस्मों पर निर्यात कर 20 प्रतिशत कर दिया. औसत से कम मॉनसून बारिश के कारण स्थानीय बाजारों में चावल की बढ़ती कीमतों पर लगाम कसने के लिए यह फैसला किया गया.
पूरी दुनिया में असर
ऑस्ट्रेलिया की स्थिति थोड़ी अलग है क्योंकि यहां चीजों का आयात यूरोप और अमेरिका से अलग होता है. यूरोप और अमेरिका में आयात ज्यादा बड़े पैमाने पर होता है और वहां आयात करने वाले भी ज्यादा हैं. ऑस्ट्रेलिया में जनसंख्या तुलनात्मक रूप से कम होने के कारण आयात भी कम होता है. लेकिन आटे की समस्या सिर्फ ऑस्ट्रेलिया में नहीं बल्कि बाकी देशों में भी पेश आ रही है.
जर्मन शहर कोलोन में भारतीय खानपान में इस्तेमाल होने वाले चीजों की दुकान 'शालिमार स्टोर' चलाने वाले बाबुराम अरनेजा ने बताया कि यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से ही सामान के सप्लाई की दिक्कत हो रही है और कई चीजों के दाम बढ़ गये हैं लेकिन भारत के गेंहू और चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के बाद स्थिति और बिगड़ गई है.
डीडब्ल्यू से बातचीत में अरनेजा ने कहा, "चावल और आटे की दिक्कत ज्यादा बढ़ गई है. चीजें या तो मिल नहीं रहीं और अगर मिलती हैं तो ऊंची कीमत पर. अलग-अलग किस्मों के चावल के 10 किलो के पैकेट की कीमत 3 से 4 यूरो (250-350 रुपये) तक बढ़ गई है. आटे के लिए दिक्कत और ज्यादा है और प्रति 10 किलो 4-5 यूरो (300-400 रुपये) ज्यादा देने पर भी आटा जल्दी नहीं मिल रहा है."
अरनेजा कहते हैं कि इस कमी का असर मसालों और दालों की सप्लाई पर भी पड़ा है और उनकी आमद भी काफी घट गई है.
इसका फायदा स्थानीय उत्पादकों को हो रहा है क्योंकि लोगों को अब स्थानीय ब्रैंड्स खरीदने होंगे. फणींद्र कहते हैं, "यहां ऑस्ट्रेलिया के ब्रैंड्स को फायदा होगा क्योंकि उनका माल बिकेगा. हमारे ग्राहक इंडियन ब्रैंड्स पसंद करते हैं और वही मांगते हैं लेकिन वे होंगे नहीं तो लोकल ब्रैंड्स ही खरीदने पड़ेंगे. लेकिन डिमांड बढ़ेगी तो उनकी कीमत भी बढ़ जाएगी."
(साथ में, जर्मनी से निखिल रंजन)
Source: DW
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