दिल्ली के छावला रेप-हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने तीनों 'दोषियों' को बरी क्यों कर दिया, क्यों छिड़ी है बहस ?

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली में 10 साल पहले हुए रेप और हत्याकांड के एक मामले में तीनों दोषियों को बरी करने का फैसला सुनाया है। इस फैसले को लेकर काफी बहस चल रही है। फास्ट-ट्रैक कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट दोनों ने तीनों अभियुक्तों को फांसी की सजा दी थी। फिर आखिर ट्रायल में ऐसी क्या चूक हो गई कि सर्वोच्च अदालत ने सजा को कम करने के बजाय दोषियों को बरी ही कर दिया ? आइए जानते हैं कि देश की सर्वोच्च अदालत ने किस आधार पर अपना फैसला सुनाया है; और इसकी वजह से देश की न्याय व्यवस्था पर क्यों सवाल खड़े हो रहे हैं ?

रेप-हत्याकांड के तीन दोषियों को सुप्रीम कोर्ट ने किया है बरी

रेप-हत्याकांड के तीन दोषियों को सुप्रीम कोर्ट ने किया है बरी

सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में दिल्ली में 19 साल की एक युवती के अपहरण-रेप-उत्पीड़न और हत्या के दोषियों को सोमवार को रिहा कर दिया। देश की सर्वोच्च अदालत का यह फैसला बहुत बड़ी बहस का मुद्दा बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अभियोजन पक्ष तीनों लोगों के खिलाफ आरोप साबित करने में नाकाम रहा है और उन सबको संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का फैसला सुनाया है। 2014 में ट्रायल कोर्ट ने इस केस में रवि कुमार, राहुल और विनोद तीनों अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले का ना सिर्फ बरकरार रखा था, बल्कि दोषियों की तुलना उन 'शिकारियों' से की थी, जो सड़कों पर 'शिकार की तलाश' में घूमते रहते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने तीनों को क्यों किया है बरी ?

सुप्रीम कोर्ट ने तीनों को क्यों किया है बरी ?

सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस यूयू ललित की अगुवाई वाली जस्टिस रविंद्र भट और जल्टिस बेला एम त्रिवेदी की बेंच ने तीनों को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने में असफल रहा और कोर्ट ने उन्हें दोषी करार देते वक्त 'निष्क्रिय अंपायर' की भूमिका निभाई। सर्वोच्च अदालत ने ट्रायल के तरीके पर सवाल उठाते हुए 'स्पष्ट चूक'की बात कही और कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों की पहचान सुनिश्चित करने भी फेल हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने यह बात उठाई कि ट्रायल के दौरान 49 गवाहों में 10 का क्रॉस एग्जामिनेशन भी नहीं किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'अदालतों को केस की मेरिट के मुताबिक कानून के तहत ही सख्ती से फैसला करना चाहिए। अदालतों को बाहरी नैतिक दबावों या दूसरी चीजों से प्रभावित नहीं होना चाहिए।'

निर्भया से 10 महीने पहले हुई थी वारदात

निर्भया से 10 महीने पहले हुई थी वारदात

यह घटना 23 साल की स्टूटेंड निर्भया की दक्षिणी दिल्ली में चलती बस में हुए गैंगरेप और हत्या की घटना के भी 10 महीने पहले की है, जिसने पूरे देश को आक्रोशित कर दिया था। और आखिरकार उन्हीं दवाबों की वजह से जल्द ट्रायल पूरा हुआ और सारे कानूनी तिकड़मों के बावजूद दोषियों को फांसी के फंदे पर लटकना पड़ा था। लेकिन, इस मामले में उत्तराखंड की पौड़ी की रहने वाली 19 साल की पीड़िता को अबतक न्याय नहीं मिल पाया है। उसके माता-पिता को भरोसा था कि अब उसकी बेटे के गुनहगार भी नहीं बचेंगे तो उन्हें फांसी मिलने की जगह देश की सर्वोच्च अदालत ने ट्रायल पर सवाल उठाते हुए बरी करने का ही फैसला सुना दिया है।

उत्तराखंड की 'निर्भया' के साथ भी दरिंदगी की सारी हदें पार हुई थीं

उत्तराखंड की 'निर्भया' के साथ भी दरिंदगी की सारी हदें पार हुई थीं

निर्भया कांड के बाद देश इसलिए उबला था और केंद्र की तत्कालीन सरकार हिल गई थी, क्योंकि दरिंदों ने उसके साथ दरिंदगी की सारी हदें पार कर दी थीं। लेकिन, छावला कांड की पीड़िता के साथ दरिंदों ने उससे जरा भी कम बर्बरता नहीं दिखाई थी। उसका पहले अपहरण किया, रेप किया और फिर ना जाने कितने घंटों तक उसके साथ दरिंदगी की। क्योंकि, उसका शव बहुत ही खराब हालत में कुछ दिनों बाद हरियाणा के रेवाड़ी में एक खेत से बरामद हुआ था। उसकी आंखों में तेजाब डाल दिए गए थे। शरीर को सिगरेट से जलाया गया था। सबसे जघन्य बात ये कि प्राइवेट पार्ट्स में शराब की टूटी बोतलें घुसा दी गई थीं।

यह न्याय व्यवस्था अंधी है- पीड़िता के परिजन

यह न्याय व्यवस्था अंधी है- पीड़िता के परिजन

इस मामले में निचली अदालत से दोषी ठहराए गए तीनों लोगों ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में सजा घटाने के लिए चुनौती दी थी। उनके वकीलों ने इसके लिए उनकी उम्र, पारिवारिक बैकग्राउंड और पिछले आपराधिक रिकॉर्ड का हवाला दिया और गुहार लगाई की सजा कम होनी चाहिए। जबकि, दिल्ली पुलिस ने फांसी की सजा घटाने का सख्त विरोध किया। उसका तर्क था कि इन्होंने सिर्फ पीड़िता के खिलाफ ही नहीं, बल्कि समाज के खिलाफ अपराध किया है। लेकिन, देश के सर्वोच्च अदालत के फैसले ने पीड़िता के माता-पिता को तोड़ दिया है। उनका कहना है, 'हम यहां न्याय के लिए आए थे। यह न्याय व्यवस्था अंधी है।'

छावला रेप-हत्याकांड में पहले फांसी की सजा मिली, फिर हुए बरी

छावला रेप-हत्याकांड में पहले फांसी की सजा मिली, फिर हुए बरी

9 फरवरी, 2012) 19 साल की युवती का दिल्ली के कुतुब विहार इलाके से अपहरण हुआ। वह अपने दफ्तर से लौट रही थी। पश्चिमी दिल्ली के छावला थाने में मामला दर्ज।

13 फरवरी, 2012) पुलिस ने तीन आरोपियों को पकड़ा, उनकी कार जब्त की। युवती का शव बहुत ही बुरी अवस्था में हरियाणा के रेवाड़ी के रोधाई गांव की खेत से बरामद किया।

14 फरवरी, 2012) युवती के माता-पिता ने उसके शव की शिनाख्त की।

13 फरवरी, 2014) फास्ट-ट्रैक कोर्ट ने तीनों आरोपियों को रेप और हत्या का दोषी करार दिया।

19 फरवरी, 2014) अदालत ने दोषियों पर कोई रहम नहीं दिखाते हुए, तीनों को फांसी की सजा सुनाई।

अगस्त, 2014) दिल्ली हाई कोर्ट ने फांसी की सजा पर मुहर लगाई।

7 नवंबर, 2022) सुप्रीम कोर्ट ने तीनों को बरी कर दिया।

देश की न्याय व्यवस्था पर क्यों उठ रहे हैं सवाल ?

देश की न्याय व्यवस्था पर क्यों उठ रहे हैं सवाल ?

सुप्रीम कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए तीनों आरोपियों को बरी कर दिया है। वन इंडिया का विचार है कि दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के विचारों में मामूली असहमति की बात तो समझी जा सकती है। लेकिन, जिन्हें दोषी मानते हुए उच्च न्यायालय ने फांसी की सजा की पुष्टि की थी, उनकी सजा कम करने के बजाय सर्वोच्च अदालत बरी कर दे, तो इससे देश की न्याय व्यवस्था निश्चित रूप से सवालों के घेरे में आती है। बरी हुए तीनों लोगों को यदि सिर्फ संदेह का लाभ मिला है तो यह भी खतरनाक है और अगर उन्हें गलत ढंग से ट्रायल की वजह से फांसी की सजा दी गई थी तो वह और भी ज्यादा खतरनाक है। दोनों ही स्थिति अच्छी नहीं लग रही है। (अंतिम तस्वीर सौजन्य: टीओआई अखबार)

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